प्रस्तावना: जासूसी के चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश, जिसने अपनी जासूसी के लिए अरबों रुपये के उपग्रह अंतरिक्ष में तैनात कर रखे हों, उसकी आँखों के ठीक नीचे एक परमाणु धमाका हो जाए और उसे खबर तक न लगे? 1998 में भारत ने न केवल यह दुस्साहस किया, बल्कि दुनिया के सामरिक मानचित्र को हमेशा के लिए बदल दिया। चीन के परमाणु खतरे और पाकिस्तान की बढ़ती अकड़ के बीच, भारत का परमाणु संपन्न होना एक ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व की रक्षा’ का सवाल था। यह कहानी है प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के फौलादी इरादों और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के ‘सामरिक कौशल’ की, जिन्होंने मिलकर वाशिंगटन की सबसे सुरक्षित जासूसी प्रणाली को एक ‘कूटनीतिक बिसात’ पर मात दी।

जासूस वैज्ञानिक: जब फौज की वर्दी में छिपे थे ‘मिसाइल मैन’
पोखरण के तपते रेगिस्तान में जब परमाणु परीक्षण की बिसात बिछाई जा रही थी, तब गोपनीयता सबसे बड़ा हथियार था। इस ‘अभेद्य रणनीति’ के तहत डॉ. कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम जैसे चोटी के वैज्ञानिकों ने अपनी पहचान पूरी तरह मिटा दी। पोखरण में 10,000 भारतीय सैनिकों का विशाल जमावड़ा था, और उन्हीं के बीच फौजी वर्दी और टोपियों में भारत के शीर्ष वैज्ञानिक ‘मेजर’ और ‘कर्नल’ बनकर घूम रहे थे।
हैरानी की बात यह है कि उन 10,000 सैनिकों को भी यह भनक नहीं थी कि उनके बीच सादे कपड़ों में भारत का ‘मिसाइल मैन’ मौजूद है। सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि खुद भारतीय सेना के जवान अनजाने में अपने ही देश के सबसे बड़े वैज्ञानिकों की सुरक्षा कर रहे थे, बिना यह जाने कि वे किस महान मिशन का हिस्सा हैं।

उपग्रहों से लुका-छिपी: अमेरिकी सैटेलाइट की 10 मिनट की ‘अंधी खिड़की’
अमेरिका ने भारत पर नजर रखने के लिए 700 करोड़ रुपये खर्च कर ऐसे उपग्रह तैनात किए थे, जो पोखरण में तैनात किसी सैनिक की घड़ी का समय भी स्पष्ट देख सकते थे। लेकिन यहाँ डॉ. कलाम का पुराना अनुभव काम आया। सालों पहले जब नासा (NASA) ने उन्हें नौकरी का प्रस्ताव देकर अपने नियंत्रण कक्ष में घुमाया था, तब कलाम साहब वहाँ नौकरी ढूंढने नहीं, बल्कि उनकी तकनीक की ‘टोह’ लेने गए थे। उन्होंने सूक्ष्मता से भांप लिया था कि अमेरिकी सैटेलाइट्स के गुजरने और दोबारा आने के बीच 7 से 10 मिनट का एक निश्चित अंतराल (Gap) होता है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने सारा काम उसी ’10 मिनट की कमजोरी’ के दौरान किया। जैसे ही सैटेलाइट का फोकस हटता, मशीनों की गड़गड़ाहट शुरू होती और सैटेलाइट के वापस आने से पहले सब कुछ वापस सामान्य कर दिया जाता।
“एक राष्ट्र की सुरक्षा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह दुनिया से अनुमति मांगे, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए कितना तैयार और आत्मनिर्भर है।”

युद्ध का ढोंग: सामरिक भटकाव का मास्टरस्ट्रोक
दुनिया को गुमराह करने के लिए भारत ने इसे एक ‘विशाल सैन्य अभ्यास’ का नाम दिया। यह वैसी ही ‘Strategic Deception’ (रणनीतिक धोखा) की कला थी, जैसा हम आज के दौर में देखते हैं—जैसे यूक्रेन विवाद के समय दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए किसी अन्य मोर्चे पर हलचल पैदा की जाए (जैसा हाल ही में ‘ब्रह्मोस’ के अचानक चलने के संदर्भ में कूटनीतिक हलकों में चर्चा हुई थी)।
परीक्षण स्थल पर नकली घर, नहरें और कुएं खोदे गए ताकि उपग्रहों को लगे कि सेना केवल युद्ध के दौरान इन संरचनाओं को नष्ट करने का अभ्यास कर रही है।
हजारों टैंकों की आवाजाही ने वास्तविक परमाणु तैयारियों को ‘धूल’ के पीछे छुपा दिया।
इन नकली निर्माणों का असली उद्देश्य धमाके के प्रभाव और उसकी मारक क्षमता का सटीक आकलन करना था।

“रेगिस्तानी तूफान” का झांसा और मौसम विभाग का ‘अलर्ट’
जब परीक्षण का समय आया, तो सबसे बड़ी चुनौती धमाके के बाद उठने वाले धूल के विशाल गुबार को छुपाना था। डॉ. कलाम ने यहाँ एक और दांव खेला। उन्होंने मौसम विभाग से पूरे राजस्थान में ‘भयानक रेतीले तूफान’ का अलर्ट जारी करवा दिया। आम जनता और किसानों को उस क्षेत्र से दूर रहने को कहा गया।
जब 11 मई को धमाका हुआ और राजस्थान की धरती फटी, तो धूल का जो गुबार उठा, उसे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने अपने कंट्रोल रूम में बैठकर केवल एक ‘कुदरती तूफान’ समझा। धमाके की तीव्रता इतनी थी कि पाकिस्तान में भूकंप के झटके महसूस किए गए, लेकिन अमेरिका को लगा कि यह केवल मौसम की मार है। 700 करोड़ के सैटेलाइट्स को भारतीय बुद्धिमत्ता ने धूल चटा दी थी।
सीटीबीटी (CTBT) का कानूनी ‘छेद’: वकीलों जैसा दिमाग
अंतरराष्ट्रीय कानून (CTBT) कहता था कि कोई भी देश हवा में, पानी में या जमीन के ऊपर परमाणु परीक्षण नहीं कर सकता। लेकिन भारतीय ‘वकीलों वाले दिमाग’ ने इसमें एक बारीक रास्ता ढूंढ निकाला। कानून में कहीं यह नहीं लिखा था कि आप ‘जमीन के नीचे’ परीक्षण नहीं कर सकते। भारत ने धमाका जमीन के अंदर (Underground) किया और तर्क दिया कि हमने किसी अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन नहीं किया है। अमेरिका अपनी ही कानून की किताबों में उलझकर रह गया।

13 मई: “मैदानी जंग में देख लेंगे“
11 मई को 3 सफल परीक्षणों के बाद जब वाजपेयी जी ने डॉ. कलाम से पूछा कि क्या हम और धमाके कर सकते हैं, तो कलाम साहब ने 10 दिन का समय माँगा। वाजपेयी जी का साहसी जवाब था—”अब दिनदहाड़े फोड़ो।” 13 मई को भारत ने दो और परीक्षण किए और दुनिया को परमाणु संपन्न राष्ट्र होने का खुला ऐलान कर दिया। जब अमेरिका ने धमकियाँ दीं, तो वाजपेयी जी ने गरजकर कहा:
“यदि दुनिया को यह भ्रम है कि हमारे पास परमाणु बम नहीं है, तो आ जाना मैदानी जंग में, तुम्हारा यह भ्रम भी दूर कर देंगे।”
आर्थिक योद्धा: जब अनिवासी भारतीयों (NRIs) ने संभाला मोर्चा
परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए। लेकिन भारत की ढाल बने वे ‘गुमनाम नायक’ जो विदेशों में काम करते थे। विशेषकर केरल और बिहार (सिवान, छपरा, गोपालगंज) के लाखों कामगारों ने अपनी मेहनत की कमाई भारी मात्रा में भारत भेजी।
इन NRIs के ‘भारतीय संस्कारों’ और देश के प्रति वफादारी ने अर्थव्यवस्था को टूटने नहीं दिया।
इसके विपरीत, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई क्योंकि उनके विदेशी कामगारों की साख भारत जैसी नहीं थी और वहां गृहक्लेश और अनुशासन की कमी थी।
विरासत: क्या आज के दौर में मुमकिन है ऐसा दुस्साहस?
पोखरण-II केवल तकनीक की जीत नहीं थी, बल्कि यह भारतीय कूटनीति का वो शिखर था जहाँ हमने दुनिया की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी CIA को मात दी थी। आज जब हम इस गौरव को याद करते हैं, तो एक टीस भी उठती है:
“क्या आज के इस डिजिटल युग में, जहाँ हर जेब में कैमरा और हर छत पर सेंसर है, ऐसी गोपनीयता दोबारा संभव होगी? और क्या हमें उन लाखों प्रवासी भारतीयों (NRIs) के बारे में गंभीरता से नहीं सोचना चाहिए, जिन्होंने संकट के समय देश की रीढ़ बचाई, लेकिन आज भी उनके पास अपने देश में वोट देने का अधिकार नहीं है?”








