अशोक कुमार (आईपीएस)
‘घेरा’ भारत की आतंक-रोधी रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, लेकिन इसकी सफलता इसके अमल पर निर्भर करेगी
भारत दशकों से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आतंकवाद का सामना करता आया है। यह लड़ाई हमारे लिए नई नहीं है। आतंकवाद कितना व्यापक हो सकता है, इसका एक उदाहरण मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला था, जिसमें लोगों को उनका मजहब पूछकर मारा गया था। हालिया पहलगाम हमले की तरह, इस्लामी आतंकवाद के खतरे को लेकर सतर्क रहना होगा। पहले जहां आतंकवाद सीमावर्ती क्षेत्रों और पारंपरिक तरीकों तक सीमित था, अब यह इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के सहारे तेजी से फैलने वाला वैश्विक खतरा बन गया है। आज आतंकवाद केवल हथियारों तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों, वित्तीय नेटवर्कों और वैचारिक प्रचार के जरिए भी काम कर रहा है। इस बदलते स्वरूप में केवल सैन्य बल के जरिए प्रभावी ढंग से निपटना संभव नहीं है।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने एक समयबद्ध पहल की है, जिसे नाम दिया है ‘घेरा’ (नेशनल प्रोजेक्ट फॉर रिस्पांस अगेंस्ट टेररिस्ट एक्सपैंशन)। यह कदम आतंकवाद से निपटने में बाजी पलटने वाला दांव सिद्ध हो सकता है। भारत ने आतंकवाद से लड़ते हुए कई अनुभव हासिल किए हैं। इस क्रम में माओवादी हिंसा से निपटने में अपनाई गई ‘समाधान’ रणनीति एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें खुफिया, स्मार्ट रणनीति, बेहतर समन्वय और जमीनी स्तर पर मजबूत सूचना तंत्र के माध्यम से उग्रवाद को काफी हद तक नियंत्रित किया गया।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यदि नीति स्पष्ट हो और एजेंसियों के बीच तालमेल मजबूत हो, तो जमीनी स्तर पर असर दिखाई पड़ सकता है। हालांकि आतंक से निपटने में अभी कई चुनौतियां कायम हैं। आतंकवाद मुख्यतः बाहरी ताकतों द्वारा पोषित है। अब विचार कुछ छोटे-छोटे समूहों, अकेले कार्य करने वाले व्यक्तियों और ऑनलाइन नेटवर्क के रूप में भी फैल रहा है। इसे इस तरह एक सघन जाल, इंटरनेट और वित्तीय तंत्र तीनों स्तरों पर काम करता है। ऐसे में अलग-अलग और असंगठित प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।
‘घेरा’ जैसी अवधारणा खतरों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह तकनीक, खुफिया जानकारी, कानून व्यवस्था, वित्तीय निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से समन्वित एक प्रणाली बनाती है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—खतरों को चिन्हित करना, उन्हें बढ़ने से पहले रोकना और सही समय पर सही कार्रवाई करना। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका समयबद्ध दृष्टिकोण है।
आतंकवाद बंदूक या बम का मामला नहीं है, बल्कि यह एक सोच, एक बड़े नेटवर्क और दुश्मन के सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है। इसलिए इसका मुकाबला भी बहुआयामी होना चाहिए। ‘घेरा’ सतत प्रयास छह मुख्य स्तंभों पर आधारित है, जो इसे एक संतुलित और प्रभावी नीति बनाते हैं।
पहला स्तंभ है—खुफिया जानकारी के आधार पर समय रहते कार्रवाई।
दूसरा स्तंभ है—प्रतिक्रिया, जिसमें किसी घटना पर त्वरित एवं सटीक कार्रवाई।
तीसरा स्तंभ है—विश्लेषण, जिसमें सटीक जानकारी एवं आंकड़ों के आधार पर निर्णय।
चौथा स्तंभ है—कानून एवं विधायन के दायरे में रहकर कार्रवाई।
पांचवां स्तंभ है—आतंकी वित्तीय तंत्र को तोड़ना, ताकि उन्हें संसाधन न मिल सकें।
छठा स्तंभ है—सामाजिक भागीदारी एवं पुनर्वास, जिससे समाज को साथ लेकर चलना और उग्रवाद के कारणों को समाप्त करना।

ये सभी स्तंभ ऐसी रणनीति बनाते हैं, जो न केवल आतंक को रोकने में सक्षम है, बल्कि समाज को भी मजबूत बनाती है।
आज आतंकी नई तकनीकों की तेजी से उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में पारंपरिक पुलिसिंग पर्याप्त नहीं रह गई है। इस कमी को दूर करते हुए साइबर क्षमता, आधुनिक तकनीक और वित्तीय निगरानी को भी अपने ढांचे में शामिल करना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आतंक के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट किया है। बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेकर ऑपरेशन सिंदूर और देश के भीतर आतंकी नेटवर्क पर लगातार कार्रवाई यह दिखाती है कि भारत अब केवल बचाव की नीति तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर उसके पास निर्णायक और पूर्व-निवारक कदम उठाने की क्षमता है।
यह स्पष्ट करता है कि ऐसी कार्रवाइयां केवल परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि एक स्पष्ट नीति के तहत की जाएंगी। इस नीति का केंद्रीय आधार आतंक की रोकथाम है। इसके लिए खतरों को प्रारंभिक स्तर पर ही चिन्हित कर उसे निष्प्रभावी करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए खुफिया-आधारित पुलिसिंग को सुदृढ़ करना, एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझाकरण सुनिश्चित करना, नई तकनीक का समुचित उपयोग करना और आतंकी समर्थन तंत्र को समाप्त करना अनिवार्य है।
साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय कट्टरपंथी गतिविधियों की निगरानी और आतंकी विचारधारा के प्रसार पर नियंत्रण इस ढांचे के प्रमुख घटक हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान, सीमा पर कड़ी निगरानी और साइबर फॉरेंसिक के माध्यम से डिजिटल सबूतों को एकत्र करना भी महत्वपूर्ण है।
आज आतंकवाद का डिजिटल स्वरूप तेजी से बढ़ रहा है। इसे देखते हुए साइबर क्षमताओं का विस्तार आवश्यक हो गया है। व्यक्ति विशेष, क्रिप्टोकरेंसी और अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। यह भी समझना होगा कि आतंकवाद केवल सुरक्षा बलों के माध्यम से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज, शिक्षा, धार्मिक नेतृत्व और नागरिक संगठनों की भागीदारी भी आवश्यक है।
‘घेरा’ भारत की आतंक-रोधी रणनीति में बड़े बदलाव का प्रतीक है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।
(लेखक उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)








