देश में पिछले महीने पांच राज्यों- असम, केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधान सभा के चुनाव हुए।
इन पांच राज्यों में पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे अधिक चर्चा में रहा। चर्चा में इसलिए क्योंकि वामपंथ और लाल आतंक की जननी पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। चुनाव के सुर्खियों में रहने का दूसरा कारण यह था कि पश्चिम बंगाल उत्तर-पूर्व का प्रवेश द्वार है, बंगाल पर विजय यानि उत्तर पूर्व की जीत के लिए आधार तैयार। तीसरा और महत्वपूर्ण कारण यह कि पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में सत्ता मिलने के देश की राजनीति में भी बड़े मायने हैं। इसीलिए पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ रही क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी पार्टियों ने चुनावी समर में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। तमाम स्टार प्रचारकों ने अपनी पार्टी के लिए जोरदार प्रचार किया। पार्टियों ने मतदाताओं को रिझाने के लिए दिन-रात एक कर दिया।

लेकिन इस चुनाव प्रचार के शोर के दौरान एक उल्लेखनीय घटना यह हुई कि नेता विपक्ष श्री राहुल गांधी पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य के चुनाव प्रचार को बीच में, अपने कार्यकर्ताओं को निराश-हताश, उनके हाल पर छोड़कर अंडमान- निकोबार द्वीप समूह पहुंच गए। अप्रैल 2026 के अंत में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना’ का कड़ा विरोध किया। इस परियोजना को उन्होंने देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ एक गंभीर अपराध और “विकास की भाषा में छिपा हुआ विनाश” करार दिया।
राहुल गांधी के विरोध का कारण समझने से पहले आइये ‘ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना’ को विस्तार से समझ लेते हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी और विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना है। इसे नीति आयोग द्वारा परिकल्पित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणतम बिंदु, ग्रेट निकोबार द्वीप को एक प्रमुख रणनीतिक, समुद्री और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करना है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 72,000 से 92,000 करोड़ रुपये के बीच है जो 30 वर्षों में चरणबद्ध रूप से पूरी होगी।

इस परियोजना के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:
1. अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलेथिया खाड़ी में एक अत्याधुनिक गहरे पानी वाला बंदरगाह विकसित किया जा रहा है, ताकि यह मलक्का जलडमरूमध्य (विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक) के पास एक प्रमुख लॉजिस्टिक्स हब बन सके।
2. ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: नागरिकों और रक्षा दोनों उद्देश्यों (Dual-use) के लिए एक बड़े हवाई अड्डे का निर्माण किया जाएगा ।
3. टाउनशिप और स्मार्ट सिटी: श्रमिकों, निवासियों और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए एक आधुनिक शहर बसाया जाएगा ।
4. ऊर्जा संयंत्र: द्वीप की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए गैस और सौर ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र स्थापित किए जाएंगे ।
परियोजना का सामरिक महत्व: मलक्का जलडमरूमध्य से निकटता के कारण यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की समुद्री उपस्थिति और सुरक्षा को नई मजबूती प्रदान करेगी। इस परियोजना के माध्यम से भारत के सबसे बड़े दुश्मन चीन पर भी नजर रखी जा सकेगी।
आर्थिक महत्व: यह परियोजना विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम करेगी और वैश्विक व्यापार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
स्थानीय महत्व:- परियोजना के फलस्वरूप स्थानीय क्षेत्र का विकास होगा। अवसंरचना में वृद्धि होगी, कनेक्टिविटी में सुधार होगा। लोकल लोगों को रोजगार भी मिलेगा, उनकी आय बढ़ेगी तथा जीवन स्तर सुधरेगा।

परियोजना के विरोध के मुख्य कारण : उक्त महत्वाकांक्षी परियोजना का निम्नलिखित कारणों से विरोध किया जा रहा है:-
1. पर्यावरणीय प्रभाव: इस परियोजना में लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का उपयोग और लाखों पेड़ों की कटाई होने की बात कही जा रही है, जो स्थानीय जैव विविधता और कोरल रीफ को नुकसान पहुँचा सकती है।
2. सामाजिक कारण : शोमपेन (Shompen) और निकोबारी जनजाति के लोगों के पारंपरिक अधिकारों और उनके विस्थापन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
3. प्राकृतिक कारण : यह क्षेत्र उच्च भूकंपीय संवेदनशीलता वाला क्षेत्र (Seismic zone) है, जिससे बड़े निर्माण कार्यों की सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं।
यहां पर यह बताना समीचीन रहेगा कि उक्त परियोजना को फरवरी 2026 में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है।
भारत सरकार उक्त पर्यावरणीय, सामाजिक और प्राकृतिक मुद्दों के बावजूद यदि इस परियोजना पर आगे बढ़ना चाहती है तो इसका कारण वर्तमान और भविष्य में समुद्र विशेषकर किसी भी जलडमरूमध्य का सामरिक, आर्थिक महत्व है। वर्तमान ईरान-अमरीका युद्ध के दौरान पूरी दुनिया जलडमरूमध्य के महत्व को भलीभांति समझ चुकी है। भारत को अगर अर्थिक महाशक्ति बनना है, पांच ट्रिलियन डॉलर वाली इकोनॉमी का लक्ष्य प्राप्त करना है तो अपने सीमावर्ती समुद्र तटों और जलडमरूमध्य पर प्रभुत्व स्थापित करना ही होगा।
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी इस परियोजना का विरोध करने वालों को आड़े हाथ ले चुके हैं। उन्होंने कहा कि कुछ विदेशी शक्तियां नहीं चाहती हैं कि यह परियोजना सफल हो और भारत में बैठे उन शक्तियों के एजेंट उनके इशारे पर इसका विरोध कर रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञ और भारत के पूर्व वायुसेना प्रमुख श्री राकेश कुमार सिंह भदौरिया भी इस परियोजना का विरोध करने वालों को आइना दिखा चुके हैं। उनका मानना है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना से भारत की नौसेना और अधिक मजबूत होगी तथा दुनिया मे जो महत्व होर्मुज जलडमरूमध्य का है, भविष्य में वैसा ही महत्व हमारे लिए निकोबार का हो सकता है।
हमारे देश के पहले सीडीएस स्वर्गीय विपिन रावत जी हमेशा ही देशवासियों को 2.5 खतरे से आगाह करते रहे । इस 2.5 में से एक खतरा पाकिस्तान अब घुटनों पर है, आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है। दूसरा और अधिक बड़ा खतरा चीन है। उसकी विस्तारवादी नीतियां न सिर्फ भारतवर्ष बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए चिंता का विषय है। इस बड़े खतरे से निपटने के लिए भारत दीर्घकालिक तैयारियां कर रहा है
। ‘ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना’ भारत की इसी दीर्घकालिक योजना का प्रमुख भाग है।
सीडीएस विपिन रावत के अनुसार 2.5 में से 0.5 खतरा भारत में बैठे पाकिस्तान और चीन के वे एजेंट, स्वार्थी तत्व हैं जो भारत की किसी भी बड़ी सामरिक और रणनीतिक तैयारी को पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों के नाम पर अटकाना, भटकाना और लटकाना चाहते हैं। ऐसे लोग देश के सामान्य नागरिक हो सकते हैं, मीडिया से जुड़े व्यक्ति हो सकते हैं, सिविल सेवक भी हो सकते हैं और राजनेता भी।
चीन और पाकिस्तान जैसी बाहरी शक्तियों से तो देश की सेना निपट लेगी लेकिन इन दुश्मन देशों के स्लीपर सेल और देश विरोधी तत्वों से निपटने की जिम्मेदारी आम नागरिकों की है। इसलिए हमें खुद सावधान रहते हुए इस विषय पर देशवासियों को जागरूक करते रहना होगा।
जय हिंद।
(आशा विनय सिंह बैस)



