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1.एक रणनीतिक पहेली और बौद्धिक बेईमानी का पर्दाफाश

भारत की समुद्री सुरक्षा और विकास के बीच का द्वंद्व महज एक पर्यावरणीय बहस नहीं है, बल्कि यह भारत के संप्रभु अधिकारों के विरुद्ध रचा गया एक ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को अक्सर ‘पर्यावरण बनाम प्रगति’ के चश्मे से दिखाया जाता है, लेकिन एक रणनीतिक विशेषज्ञ के तौर पर मेरा सवाल यह है: क्या ये चिंताएं वास्तविक हैं या इन्हें भारत की वैश्विक बढ़त को रोकने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? जब वैश्विक ताकतें भारत को एक ‘जैविक संग्रहालय’ (Biological Museum) बनाए रखने का दबाव डालती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके पीछे रणनीतिक प्रगति को बाधित करने का एक सुव्यवस्थित एजेंडा काम कर रहा है।



2. मलक्का की चाबी: हॉर्मुज से भी अधिक महत्वपूर्ण ‘एनर्जी लाइफलाइन’

वर्ष 2025 के नवीनतम रणनीतिक डेटा ने वैश्विक व्यापार की धुरी को बदलकर रख दिया है। जहाँ कभी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) दुनिया की नब्ज हुआ करती थी, आज स्ट्रेट ऑफ मलक्का (Strait of Malacca) प्रतिदिन 23.2 मिलियन बैरल तेल के प्रवाह के साथ सबसे बड़ी एनर्जी लाइफलाइन बन चुकी है, जबकि हॉर्मुज से यह आंकड़ा 20.9 मिलियन बैरल है।

“ग्रेट निकोबार भारत के लिए वह ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट करियर’ है, जो हिंद महासागर में हमारे सामरिक प्रभुत्व को सुनिश्चित करता है। यह चीन के लिए सबसे बड़ा ‘मलक्का डिलेमा’ (Malacca Dilemma) है, क्योंकि उसके 80% तेल आयात और भारी औद्योगिक निर्यात का भाग्य इसी संकरे मार्ग पर टिका है। निकोबार प्रोजेक्ट इसी डिलेमा को चीन के लिए एक स्थायी सिरदर्द बनाने की तैयारी है।”


3. ‘फॉस्टियन बार्गेन’ या वैज्ञानिक सुरक्षा? पर्यावरण मंजूरी का कठोर सच

आलोचक इसे ‘फॉस्टियन बार्गेन’ (आत्मा बेचकर किया गया सौदा) कहकर प्रचारित कर रहे हैं, लेकिन यह सरासर झूठ है। MoEF&CC द्वारा 11 नवंबर, 2022 को दी गई 30 पन्नों की पर्यावरण मंजूरी में 42 कड़ी शर्तें शामिल हैं, जो किसी भी ‘जल्दबाजी’ के दावे को खारिज करती हैं।

वैज्ञानिक सुरक्षा और जनजातीय कल्याण के ठोस कदम:

संस्थानों की चौकड़ी: वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII), जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI), बॉटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (BSI) के साथ-साथ SACON (Salim Ali Centre) जैसी संस्थाएं 2052 तक इस प्रोजेक्ट की निगरानी करेंगी।
जनजातीय सुरक्षा: ‘जेनोसाइड’ जैसे नैरेटिव को ध्वस्त करते हुए, सरकार ने शोम्पेन (Shompen) जनजाति के लिए ₹100 करोड़ की स्पेशल मेडिकल यूनिट स्थापित की है ताकि उन्हें बाहरी बीमारियों से बचाया जा सके।
पर्यावरण क्षतिपूर्ति: 150 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में ‘ऑफसेट प्लांटेशन’ और लेदरबैक कछुओं के लिए 150 सैटेलाइट टैग्स के साथ विशेष संरक्षण योजना।
न्यायिक वैधता: फरवरी 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रक्रिया में कोई कोताही नहीं बरती गई है।



4. कोरल रीफ और ‘ग्रीन कॉलोनियलिज्म’ का पाखंड

पर्यावरण कार्यकर्ता अक्सर कोरल रीफ के विनाश का भावनात्मक कार्ड खेलते हैं, लेकिन ZSI की वैज्ञानिक जांच बताती है कि बंदरगाह क्षेत्र में कोई मुख्य कोरल रीफ नहीं है। केवल 16,150 छिटपुट कोरल कॉलोनियां हैं, जिनके रिलोकेशन की योजना है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ZSI के पास कच्छ की खाड़ी जैसे क्षेत्रों में कोरल ट्रांसलोकेशन का 90% से अधिक सफलता दर का रिकॉर्ड है। असली सवाल यह है कि जो लोग भारत में एक पेड़ कटने पर ‘इकोसाइड’ का शोर मचाते हैं, वे चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर में कोरल रीफ को कंक्रीट के टापुओं में तब्दील करने पर मौन क्यों रहते हैं? यह ‘हरित उपनिवेशवाद’ (Green Colonialism) नहीं तो और क्या है?


5. ESG का शस्त्रीकरण और अर्थव्यवस्था पर ‘विदेशी प्रहार’

आज के दौर में ‘पर्यावरण, सामाजिक और शासन’ (ESG) मानकों का इस्तेमाल एक सामरिक वीटो की तरह किया जा रहा है। IB की 2014 की रिपोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि Greenpeace और Amnesty जैसे संगठन विदेशी सरकारों के हितों के लिए भारत के विकास को बाधित करते हैं।

इस ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ की आर्थिक कीमत भयावह है:

स्टरलाइट कॉपर का उदाहरण: प्रदूषण के नाम पर प्लांट बंद करवाकर भारत को तांबे के निर्यातक से आयातक बना दिया गया। नतीजा? भारत को आज तांबा खरीदने के लिए हर साल ₹14,000 करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है, जिसका सीधा लाभ चीन को हुआ।
जीडीपी को चोट: विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि विदेशी फंडिंग से प्रेरित ये विरोध प्रदर्शन भारत की जीडीपी को हर साल 2% से 3% तक का नुकसान पहुँचाते हैं। यह भारत को सुपरपावर बनने से रोकने की एक सोची-समझी साजिश है।


6. चीन का घेरा: कंबोडिया और कोको द्वीप की आक्रामकता

जब भारत में निकोबार प्रोजेक्ट को रोकने की रीलबाजी हो रही है, तब चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को मजबूत कर रहा है।

रिम नेवल बेस (कंबोडिया): चीन ने यहाँ अमेरिकी फंडिंग से बने इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट कर दिया है। घाट की लंबाई 650 मीटर और पानी की गहराई 8 से 11 मीटर तक बढ़ा दी गई है ताकि विशाल विमानवाहक पोत खड़े हो सकें। एक गुप्त MOU के तहत चीन को यहाँ 30 साल के लिए ‘एक्सक्लूसिव एक्सेस’ मिला है।
कोको द्वीप (म्यांमार): यहाँ चीनी जासूसी उपकरण सीधे तौर पर भारत की निगरानी कर रहे हैं।

भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति में ग्रेट निकोबार का ट्रांसशिपमेंट पोर्ट वह सबसे धारदार हथियार है, जो चीन के इस समुद्री शिकंजे को काटने की क्षमता रखता है।


7. निष्कर्ष: स्वाभिमान बनाम समझौता

सस्टेनेबल डेवलपमेंट महत्वपूर्ण है, लेकिन वह राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं हो सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की संप्रभुता का उद्घोष है। हमें यह तय करना होगा कि हम एक ऐसा राष्ट्र बनना चाहते हैं जो अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहे, या वह जो वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर चले।

एक विचारोत्तेजक प्रश्न: क्या हम कछुओं के घर की चिंता में अपने बच्चों के लिए एक असुरक्षित और आर्थिक रूप से पंगु भविष्य छोड़ देंगे, या हम मलक्का की चाबी अपने हाथ में लेकर एक सशक्त भारत की नींव रखेंगे?

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