79,000 करोड़ का भारत का संकल्प
राष्ट्र भारत आज एक अभूतपूर्व सुरक्षा परिस्थिति का सामना कर रहा है। उत्तर में हिमालय की सर्वोच्च चोटियों से लेकर बांग्लादेश की समतल सीमाओं तक, और पश्चिमी मरुस्थलों से पूर्वी वनक्षेत्रों तक – भारत की 15,106 किलोमीटर की सीमाएँ अनेक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रही हैं। पाकिस्तान से आतंकवादी घुसपैठ, चीन के साथ एलएसी पर निरंतर सैन्य तनाव, बांग्लादेश से अवैध प्रवास, और नारको-आतंकवाद – ये सब मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक जटिल परिदृश्य बनाते हैं। जून 2020 के गलवान घाटी संघर्ष में 20 से अधिक भारतीय सैनिकों की शहादत, मई 2025 में पाकिस्तान सीमा पर हुई सैन्य कार्रवाइयाँ, और अगस्त 2025 में घुसपैठियों द्वारा सीमांत क्षेत्रों में की गई नृशंशता – ये सभी इस बात को प्रमाणित करते हैं कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था को तकनीकी रूप से सशक्त किए बिना राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा संभव नहीं है। ऐसी परिस्थिति में, सीमांत सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अत्याधुनिक सैन्य तकनीकें, स्वदेशी हथियार-प्रणालियाँ और सुदृढ़ रक्षा-अवसंरचना की आवश्यकता एक राष्ट्रीय अनिवार्यता बन गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रक्षा अधिग्रहण परिषद् द्वारा 79,000 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक प्रस्तावों को स्वीकृत करना भारत के भविष्य की सुरक्षा के प्रति एक दृढ़ संकल्प की अभिव्यक्ति है।
भारतीय राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा करना हर भारतीय का परम कर्तव्य है। यह हमारे संविधान के मूल स्तम्भों में निहित है। गत दिसंबर के अंतिम सप्ताह में राष्ट्र के रक्षा अधिग्रहण परिषद् ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिसकी परिव्यापना हमें भारतीय सभ्यता के उस दार्शनिक आधार की याद दिलाती है, जहाँ कहा गया है – ‘शान्तिः परमा भद्रम्’ अर्थात् शांति परम कल्याण है। किंतु यह शांति तभी संभव है, जब हमारी रक्षा-व्यवस्था समर्थ, सशक्त और भविष्य के चुनौतियों के लिये सदैव सक्षम हो।
विगत 29 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में जो परिषद् सभा आयोजित हुई, उसमें 79,000 करोड़ रुपये से अधिक की रक्षा-अधिग्रहण योजनाएँ स्वीकृत की गईं। यह निर्णय मात्र एक बजटीय प्रबंध नहीं है; यह भारत के राष्ट्रीय संकल्प की गहन अभिव्यक्ति है। थल-सेना, जल-सेना और वायु-सेना – तीनों का समन्वित विकास परम आवश्यक है। यह निर्णय इस बात का साक्षी है कि भारत आत्मनिर्भरता के पथ पर दृढ़ संकल्प के साथ अग्रसर है।
युद्धक-क्षमता का संवर्धन
तकनीकी दृष्टि से यदि विचार करें तो T-90 भीष्म टैंकों के अपग्रेड का प्रस्ताव अत्यंत महत्वपूर्ण है। चार सैनिक दलों की इन प्रमुख युद्ध-टैंकों के इंजन, तोप-नलों और यांत्रिक प्रणालियों का पुनर्निर्माण किया जाएगा। ये टैंक भारत की सीमांत सुरक्षा का प्रथम पहरेदार हैं। ये टैंक बीस वर्षों तक अधिक सक्रिय रह सकेंगी। विशेषतः हिमालयीन क्षेत्रों में, जहाँ पृथ्वी की सर्वोच्च चोटियों के समीप हमारी सीमाएँ हैं, वहाँ यह प्रौद्योगिकीय उन्नयन अत्यावश्यक है। मिल-17 हेलिकॉप्टरों का मध्य-काल सुधार भी इसी रणनीति का अंग है। ये बहुउद्देश्यीय विमान दूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों में सेना के संचालन को सक्षम बनाते हैं। अब ये और भी दीर्घस्थायी होंगे।
दूसरी बात, लौइटरिंग म्यूनिशन के अधिग्रहण से संबंधित है। यह एक नई सोच को प्रतिबिंबित करता है। इन ‘आत्मनिर्भर
प्रहार-तंत्रों’ को हम “दूरवर्ती-ड्रोन” भी कह सकते हैं। ये उपकरण, पारंपरिक मिसाइलों से भिन्न, लक्ष्य पर पहुँचने से पूर्व लंबे समय तक आकाश में भ्रमण कर सकते हैं। ये सर्वाधिक प्रभावकारी पल में अपना प्रहार करते हैं। यह प्रौद्योगिकी न केवल सटीकता के लिये, अपितु “सर्वाधिक न्यून क्षति” (कलेटेरल डैमेज की न्यूनता) के सिद्धांत के लिये भी उफयुक्त है। भारतीय सेना जब प्रमाण-संचालन में इनका प्रयोग करेगी, तब नागरिकों को सर्वाधिक सुरक्षा मिलेगी।
आकाशीय बढ़त और सामरिक संतुलन
तीसरी बात, आधुनिक वायु-संघर्ष में, ए-वैक्स (AWACS – आकाश-निगरानी-नियंत्रण-तंत्र) का महत्व अपरिसीम है। भारतीय वायु-सेना वर्तमान में केवल छह AWACS विमानों से सुसज्जित है, किंतु अब नेत्र-द्वितीय प्रणालियों द्वारा इसे सशक्त किया जाएगा। ये विमान हज़ारों किलोमीटर दूर से शत्रु-विमानों का पता लगा सकते हैं और भारतीय सेनानियों को तुरंत उसके संकेत भेज सकते हैं। ये आधुनिक युद्ध-नीति के प्राण हैं। एम-आर-सैम (MRSAM) मिसाइलें 70 किलोमीटर की दूरी से अंतरिक्ष-लक्ष्यों को भेद सकती हैं। वे जल-सेना और वायु-सेना दोनों की ढाल बनेंगी। वायु-से-वायु मिसाइलें अस्त्र द्वितीय की परिधि अब 200 किलोमीटर से अधिक है। अब वे इंद्र की बिजली की तरह शत्रु-विमानों पर वज्र-प्रहार कर सकेंगी।
आत्मनिर्भरता
चौथी बड़ी बात, इस संपूर्ण प्रकल्प का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिकांश तकनीकें भारतीय प्रतिभा द्वारा विकसित की गई हैं। भारत की वैज्ञानिक-सशक्तता का प्रतीक अनुसंधान एवं विकास संगठन DRDO इन सभी योजनाओं का केंद्रीय आधार है। भारतीय रक्षा-निर्माण में निजी उद्योग की भागीदारी भी बढ़ रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि हम आर्थिक-शक्ति और सैन्य-शक्ति को समन्वित रूप से विकसित कर रहे हैं।

फोटो: भारत चीन सीमा विवाद
विगत एक दशक में भारत ने अपने रक्षा-दर्शन को विदेशी निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर परिवर्तित किया है। यह 79,000 करोड़ रुपये का विनिवेश मात्र सैन्य खरीद नहीं है; यह भारत की सीमाओं की रक्षा का एक समग्र कार्यक्रम है। T-90 टैंकों का अपग्रेड, हिमालय की ऊँचाइयों पर भारत की सथल-शक्ति को सुदृढ़ करेगा। Mi-17 हेलिकॉप्टर, दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में भारतीय सेना की पहुँच को विस्तारित करेंगे। लौइटरिंग म्यूनिशन, पाकिस्तानी आतंकवादियों के लिए एक नई चुनौती सृजित करेंगी। ए-वैक्स (AWACS) विमान, हज़ारों किलोमीटर दूर से शत्रु की गतिविधियों को ट्रैक करेंगे, जबकि एम-आर-सैम (MRSAM) और अस्त्र मार्क द्वितीय (Astra Mark II) मिसाइलें, भारतीय वायु-सेना को आकाश में पूर्ण आधिपत्य प्रदान करेंगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी प्रणालियाँ भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा से निर्मित हैं। यह दर्शाती है कि भारत अब अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर नहीं है। जब हम अपनी सीमाओं को सशक्त करते हैं, तब हम न केवल सेना को मजबूत करते हैं, बल्कि सीमांत गाँवों के लाखों नागरिकों को भी सुरक्षा और सम्मान प्रदान करते हैं। सारे राष्ट्र के लिए, इन सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले भाई-बहनों के लिए, और भारत की भविष्य पीढ़ियों के लिए – यह निर्णय एक अमूल्य है। आज, जब भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र बन गया है, तब यह सीमा सुरक्षा का प्रश्न केवल सैन्य-शक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व, सार्वभौमिकता, और सभ्यतागत अस्तित्व का भी प्रश्न है। ‘अपराजितस्य न परीषहः’—जो अपराजित होता है, उसे कोई कठिनाई नहीं सताती। 79,000 करोड़ रुपये के निवेश का यह संकल्प भारत को उस अपराजेय स्थिति की ओर ले जाएगा जहाँ सीमाएँ अभेद्य होंगी, आकाश सुरक्षित होगा, और पृथ्वी पर भारत की प्रभुता अटूट रहेगी।








