‘धुरंधर’: नैरेटिव के मोर्चे पर भारत की सांस्कृतिक स्वाधीनता
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, एक वैचारिक अस्त्र है। जिसे हम ‘सॉफ्ट पावर’ कहते हैं, उसका सबसे प्रभावी माध्यम है सिनेमा। लेकिन दशकों तक भारतीय सिनेमा ने इस शक्ति का उपयोग भारत की ही जड़ों को खोदने में किया। महर्षि अरविन्द ने जिसे ‘चिन्मय शक्ति’ कहा था, बॉलीवुड ने उसे ‘मृण्मय’ यानी जड़ और उपहास का पात्र बना दिया। वस्तुतः “राष्ट्र केवल मृण्मय भू-खंड नहीं, अपितु एक चिन्मय शक्ति है।” महर्षि अरविन्द का यह कालजयी उद्घोष कि राष्ट्र केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि एक जाग्रत दैवीय शक्ति है, आज यकायक भारतीय रजत-पट पर साकार हो उठी है। युगों की तन्द्रा टूटी है और बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचने वाली फिल्म ‘धुरंधर’ मात्र एक चलचित्र नहीं, अपितु उसी ‘चिन्मय शक्ति’ का सिनेमाई विग्रह बनकर उभरी है। यह उस सांस्कृतिक स्वाधीनता के ‘अमृत-काल’ का शंखनाद है, जिसकी प्रतीक्षा में भारत की चेतना सदियों से आकुल थी। फिल्म ‘धुरंधर’ आज के संदर्भ में भारतीय सिनेमा की दिशा और दशा को परखने की कसौटी बन गई है। इस आलोक में, बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच रही फिल्म ‘धुरंधर’ की राष्ट्रीय और सुरक्षात्मक उपादेयता पर विमर्श आवश्यक हो गया है, क्योंकि नैरेटिव-स्थापना की दृष्टि से यह फिल्म भारत की ‘सांस्कृतिक स्वाधीनता’ के अमृत कालखण्ड का शंखनाद कर रही है।
अब तक, कला के नाम पर हम जिस विमर्श को ढो रहे थे, वह राष्ट्र को केवल मिट्टी का एक पिण्ड मानता था। भारत को एक ऐसा भूगोल समझा जाता रहा जिसे मानचित्रों पर लकीरें खींचकर बाँटा जा सकता था। किन्तु, ‘धुरंधर’ ने सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र भूगोल से नहीं, भाव से बनता है; वह कँटीले तारों से नहीं, अपितु कोटि-कोटि हृदयों में स्पंदित होने वाले स्वाभिमान से सुरक्षित होता है। जब रूपहले पर्दे पर यह फिल्म भारत के शौर्य और सनातन मूल्यों का जयघोष करती है, तो वह मनोरंजन की परिधि लांघकर ‘राष्ट्र-आराधन’ का अनुष्ठान बन जाती है। जिस देश का नागरिक अपनी संस्कृति को ‘हीन’ और अपनी परंपरा को ‘जड़’ मानता हो, उस देश की सीमाएँ तो स्वयं ही असुरक्षित हो जाती हैं। ‘धुरंधर’ जैसी कृतियाँ उस हीनता-ग्रंथि का उच्छेदन कर रही हैं। यह फिल्म उस नैरेटिव को ध्वस्त करती है जो हमें अपनी ही जड़ों से काटने का कुचक्र रचता था। यह फिल्म उद्घोष करती है कि भारत की सीमाएँ केवल सैनिकों के पहरे से नहीं, अपितु उस ‘सांस्कृतिक कवच’ से सुरक्षित रहेंगी, जिसे अब देश का युवा अपने मस्तक पर धारण कर रहा है; क्योंकि सीमा-सुरक्षा का प्रश्न केवल तोपों और टैंकों का प्रश्न नहीं है। सच्चा प्रहरी वह नहीं जो केवल सीमा पर जागता है, सच्चा प्रहरी वह भी है जो सिनेमा के अन्धकार में बैठकर जब राष्ट्र-गौरव के दृश्य देखता है तो उसकी शिराओं में पूर्वजों का रक्त हुंकार भरता है। ‘धुरंधर’ का नैरेटिव-स्थापना की दृष्टि से यह महत्व युगान्तकारी है। यह भारत की ‘सांस्कृतिक स्वाधीनता’ का सूर्योदय है। अब कला राष्ट्र-विरोधी विलाप का स्वर नहीं, अपितु राष्ट्र-देवता की आरती का स्वर है। अस्तु, यह फिल्म उस ‘चिन्मय शक्ति’ का जागरण है जो मिट्टी के कण-कण को ‘देवत्व’ प्रदान करती है और प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र की सीमा का सजग प्रहरी बना देती है।
एक समय था जब भारतीय चलचित्र-जगत ‘बॉलीवुड’ अपने पुनीत दायित्व से विमुख होकर एक गहन सांस्कृतिक विडंबना का संवाहक बन बैठा था। कला, जो लोकचेतना की शुचिता की रक्षक होनी चाहिए थी, वही कला उस दौर में सनातन जीवन-मूल्यों के उपहास और राष्ट्रीय स्वाभिमान के क्षरण का माध्यम बन गई थी। यह पतन आकस्मिक नहीं था; यह एक सुसंयोजित, दीर्घकालिक वैचारिक प्रवृत्ति का परिणाम था।
‘पीके’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ के उदाहरण हमारे सामने हैं। जहाँ तिलकधारी और शिखाधारी चरित्रों को धूर्त, बलात्कारी या पाखंडी सिद्ध करना, और टोपीधारी चरित्रों को नैतिकता और ईश्वरीय भय का प्रतिमान बनाना यही उस युग का अघोषित संविधान बन गया था। ‘डर’ और ‘बाजीगर’ जैसे चलचित्रों ने भले ही सीधे धर्म पर प्रहार न किया हो, किन्तु उन्होंने भारतीय नायकत्व की उस मर्यादा को भंग कर दिया जहाँ नायक ‘राम’ का अनुगामी होता था। इन फिल्मों ने अपराधी और विक्षिप्त चरित्रों को ‘हीरो’ बनाकर पीढ़ियों के नैतिक बोध को ही विकृत कर दिया। इस प्रवृत्ति की सबसे घातक परिणति यह हुई कि वह भारतीय जनमानस के अवचेतन में चुपचाप प्रवेश कर गई – प्रश्न बनकर नहीं, स्वीकृति बनकर। दर्शक धीरे-धीरे अपने ही सांस्कृतिक प्रतीकों से विमुख होते गए। यह ठीक वही स्थिति थी जिसके प्रति गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सचेत किया था। यद्यपि गुरुदेव अन्ध-राष्ट्रीयता के आलोचक थे, किन्तु उन्होंने स्पष्ट किया था कि यदि किसी देश की राष्ट्र-चेतना उसकी “सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक जड़ों” से कट जाए, तो वह समाज ‘आत्महीनता’ का शिकार हो जाता है। बॉलीवुड के उस दौर ने भारतीयों के मन में इसी आत्महीनता का बीज बोया, जिससे स्वाभिमान और सृजनशीलता कुंठित होने लगी। जब अपनी ही संस्कृति के प्रति हीनता का भाव हो, तो राष्ट्र की रक्षा और सतत अस्तित्व की शक्ति स्वतः क्षीण हो जाती है।
स्मरण कीजिये उस दौर को जब ‘शोले’ जैसी कालजयी कही जाने वाली फिल्म में भी सनातन संस्कृति के मानमर्दन का एक सूक्ष्म किन्तु गहरा षड्यंत्र रचा गया था। उस कथा-संसार में जहाँ गाँव के मन्दिर का पुजारी एक निस्तेज, भीरु और प्रभावहीन छाया मात्र बनकर रह गया था, वहीं नैतिकता, त्याग और पवित्रता का सर्वोच्च शिखर एक ‘इमाम’ को घोषित किया गया। क्षत्रियत्व का प्रतीक ‘ठाकुर’ भुजाहीन और लाचार था, जिसे अपनी रक्षा के लिए भी अपराधियों का आश्रय लेना पड़ा, किन्तु गाँव की सामूहिक चेतना को दिशा देने और धर्म का मर्म समझाने का दैवीय कार्य केवल इमाम की तकरीरों और अजान की स्वर-लहरियों को सौंपा गया। यह अनायास नहीं था; यह एक सोची-समझी दृष्टि थी जिसमें सनातन प्रतीकों को अधूरा, अपंग और शक्तिहीन दिखाया गया, जबकि इस्लाम को एक परिपूर्ण, दोषमुक्त और आदर्श जीवन-दर्शन के रूप में स्थापित किया गया। ‘पीके’ जैसी फिल्मों ने तो मानो सनातन आस्थाओं के मानमर्दन को ही अपनी सफलता का सोपान मान लिया था। जिस ‘रोंग नंबर’ के तर्क से भगवान शिव के रूप को एक डरे हुए, भागते हुए और हास्यास्पद पात्र की भांति चित्रित किया गया, क्या वही साहस किसी अन्य पंथ के प्रतीकों के लिए दिखाया जा सकता था? यह एक सुविचारित कुचक्र था जहाँ ‘दीवार’ का नायक विजय मन्दिर की सीढ़ियों पर चढ़ने से तो इनकार करता है, किन्तु उसकी रक्षा मन्दिर का विग्रह नहीं, अपितु एक कुली का ‘786’ अंकित बिल्ला करता है। संदेश स्पष्ट था – सनातन का देव मौन और असमर्थ है, जबकि दूसरे पंथ के प्रतीक में प्राणरक्षक शक्ति है।
‘पठान’ जैसी फिल्मों ने इस विकृति को एक नए स्तर पर पहुँचाया। जहाँ एक ओर भगवा रंग, जो त्याग और तपस्या का प्रतीक है, उसे अश्लील संदर्भों में ‘बेशरम रंग’ के रूप में प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया गया, वहीं दूसरी ओर शत्रु देश की गुप्तचर संस्था आईएसआई की एक एजेंट को मानवीयता, प्रेम और कर्तव्य की प्रतिमूर्ति बनाकर पेश किया गया। एक भारतीय सैनिक ‘जिम’ को तो क्रूर, देशद्रोही और आतंकवादी के रूप में चित्रित किया गया, किन्तु पाकिस्तानी जासूस रुबीना मोहसिन को एक नेक दिल और वफादार सहयोगी के रूप में स्थापित किया गया। यह विडंबना ही तो है कि नायक ‘पठान’ अपने देश के प्रति वफादारी सिद्ध करने के लिए एक पाकिस्तानी एजेंट का सहारा लेता है, मानो भारतीय शौर्य स्वयं में अपूर्ण हो!

फिल्म धुरंधर के कलाकार
इतना ही नहीं, फिल्म ‘मैं हूँ ना’ से लेकर ‘बजरंगी भाईजान’ तक में पाकिस्तान के प्रति एक कृत्रिम सहानुभूति का वातावरण सृजित किया गया। ‘प्रोजेक्ट मिलाप’ जैसे काल्पनिक अभियानों के माध्यम से यह भ्रम फैलाया गया कि सीमा पार से आने वाला बारूद और रक्तपात मात्र कुछ ‘भटके हुए लोगों’ का काम है, जबकि वहां की अवाम तो प्रेम की प्यासी है। शत्रु के हाथ में थमे शस्त्र को ‘खिलौना’ और उसकी क्रूरता को ‘गलतफहमी’ बताकर भारत की सुरक्षा-चेतना को सुलाने का जो उपक्रम इन फिल्मों ने किया, वह किसी भी सांस्कृतिक राष्ट्रघात से कम नहीं था।
‘धुरंधर’ का महत्व इसलिए नहीं है कि इसने करोड़ों का व्यवसाय किया, बल्कि इसलिए है क्योंकि इसने उस ‘हीनता बोध’ को चुनौती दी है जो दशकों से हमारी सुरक्षा-पंक्ति को भीतर से खोखला कर रहा था। यह फिल्म मात्र मनोरंजन नहीं, यह सीमा-जागरण का एक सशक्त सांस्कृतिक दस्तावेज है। भारत अब अपनी शर्तें तय कर रहा है – राजनीति में भी, रणभूमि में भी, और रूपहले पर्दे पर भी। यही सच्ची स्वाधीनता है। यह मात्र फिल्मों का बदलना नहीं है; यह उस सत्य का साक्षात्कार है जिसे महर्षि अरविन्द ने ‘इंडिया’ज रीबर्थ’ में रेखांकित किया है। श्री अरविन्द की मान्यता है कि “भारत कोई मात्र भू-भाग नहीं, यह करोड़ों आत्माओं की संचित शक्ति से बनी एक महान शक्ति है; जब यह शक्ति अपने गहनतम स्वरूप में जागती है तो वही उसके लिए प्रकाश, बल और धर्म का स्रोत बनती है।”
आज जब ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ जैसी कृतियाँ सामने आती हैं, तो यह उसी सुप्त ‘शक्ति’ का जागरण है। ये फिल्में मनोरंजन नहीं, अपितु एक ‘सांस्कृतिक सत्याग्रह’ हैं। अब, ‘छावा’ जैसा भव्य निर्माण! यह केवल छत्रपति संभाजी महाराज की शौर्य गाथा नहीं है, अपितु यह उस आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति का गर्जन है जिसे अरविन्द ने राष्ट्र के लिए अनिवार्य बताया था। जब पर्दे पर महापराक्रमी संभाजी ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष करते हैं, तो वह ध्वनि केवल सिनेमाघरों में नहीं, अपितु प्रत्येक राष्ट्रभक्त के हृदय में प्रतिनादित होती है। वर्ष 2025 के क्षितिज पर ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का आगमन और आदित्य धर जैसे निर्देशकों की सक्रियता यह संकेत देती है कि अब भारत रक्षात्मक मुद्रा में नहीं है। अब हम अपना यथार्थ अपने दृष्टिकोण से कह रहे हैं।

साभार: इंस्टाग्राम (रणवीर सिंह एव सारा अर्जुन)
परन्तु, इस परिवर्तन का मर्म केवल सिनेमाई सफलता तक सीमित नहीं है। इसका सम्बन्ध भारत की ‘सीमा सुरक्षा’ और ‘सीमा जागरण’ के उस वृहत्तर दर्शन से है जिसे समझना आज अनिवार्य है। यहाँ वीर सावरकर का चिंतन अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। अभिनव भारत के दर्शन के अनुरूप, सावरकर ने राष्ट्र को एक ‘अखंड सांस्कृतिक-एकता’ के रूप में देखा है। उनका स्पष्ट मत था कि “सुदृढ़ राष्ट्रत्व की नींव साझा सांस्कृतिक मूल्यों और आत्मगौरव पर ही टिकती है, जो सैन्य, वैज्ञानिक और तकनीकी सामर्थ्य की प्रेरक शक्ति बनते हैं।” ‘धुरंधर’ और ‘उरी’ जैसी फिल्में इसी ‘सभ्यतागत गौरव’ को पुनर्स्थापित कर रही हैं। सावरकर के अनुसार, यदि राष्ट्रत्व साझा सांस्कृतिक-चेतना पर आधारित न हो तो राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा दोनों दुर्बल हो जाते हैं।
अतः, सच्ची सीमा-सुरक्षा का प्रारम्भ सीमा की चौकियों से नहीं, अपितु देश के जनमानस की चेतना से होता है। सीमाएँ राष्ट्र के पुरुषार्थ की परिधि होती हैं। किसी भी देश की सीमा उतनी ही सशक्त होती है, जितना सशक्त उस देश के नागरिक का स्वाभिमान होता है। यदि देश के भीतर अपनी संस्कृति के प्रति हीनता का भाव हो, यदि हम अपने ही पूर्वजों को लांछित होते देख मौन रहें, तो सीमा पर खड़ा सैनिक भी अपने मनोबल को कब तक अक्षुण्ण रख पाएगा? सावरकर का यह कथन ध्रुव सत्य है कि ‘आत्मिक सम्बद्धता’ ही राष्ट्र-निर्माण की मुख्य शर्त है। सीमा जागरण का मूल मंत्र ही यही है कि सीमा पर बसने वाला वनवासी हो या महानगर में बैठा युवा—जब तक उसके हृदय में ‘स्व’ का अभिमान नहीं जागेगा, तब तक राष्ट्र की सुरक्षा अधूरी है।
आज बन रही ये फिल्में इसी ‘राष्ट्रीय चरित्र’ का निर्माण कर रही हैं। वे पीढ़ियों को यह स्मरण करा रही हैं कि वे किन ऋषियों और वीरों की संतानें हैं। जब एक युवा ‘उरी’ या ‘शेरशाह’ देखकर निकलता है, तो उसके भीतर का रक्त केवल उबाल नहीं मारता, अपितु वह यह संकल्प लेता है कि इस देश की माटी का ऋण उसे चुकाना है। यह भाव ही वह अदृश्य दीवार है जिसे कोई शत्रु लांघ नहीं सकता।
अतः, यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की भौतिक सीमाओं की सुरक्षा के लिए सांस्कृतिक सीमाओं का सुदृढ़ होना अपरिहार्य है। अपनी संस्कृति का ध्वज अपने हाथों में थामना ही सुरक्षा की पहली शर्त है। जिस देश का साहित्य और सिनेमा अपने राष्ट्र को ‘देवता’ मानता है, उस देश की सीमाएँ सदैव अजेय रहती हैं। राष्ट्रीयता का यह बोलवाला और सनातनता का यह पुनरागमन, वास्तव में भारत के ‘आत्म-बोध’ और ‘आत्म-रक्षा’ का ही एक समन्वित महायज्ञ है। अस्तु, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि हम एक स्वर्णिम संक्रमण काल के साक्षी बन रहे हैं, जहाँ फिल्म-कला अब राष्ट्र-विरोधी विमर्श का साधन नहीं, अपितु राष्ट्र-आराधन और सीमा-वंदन का मंत्र बन रही है।








