माड़ धरा जैसलमेर: रेगिस्तान और भारत की रणनीतिक शक्ति का सामरिक महत्व
डॉ ममता भाटी
प्राचीन साहित्य में थार प्रदेश को मरू , मरुमंडल , मरूदेश , मरूस्थल , मरुधन्व , मरूकान्तार आदि शब्दों से सम्बोधित किया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ निर्जल प्रदेश से है। इस मरुधरा की ऐतिहासिकता इस प्रदेश में उपलब्ध पैलियोजोइक, मिसोजोइक एवम् सीनोजोइक कालीन अवशेष से ज्ञात होती है, जो इसकी प्रागेतिहासिक कालीन स्थिति को प्रमाणित करती है। बाप क्षेत्र में उपलब्ध बालुआ पाषाण में इस क्षेत्र को तालचिर युगीन कहा जा सकता है। ज्यूरासिक चट्टानों के अवशेष यहां पर ज्यूरासिक सागर के अवस्थित होने के संकेत देते हैं। इसी प्रकार बीकानेर, कच्छ और जैसलमेर क्षेत्र में उपलब्ध चट्टानों से अनुमान लगाया जाता है कि ईओसिन युग में यह सम्पूर्ण प्रदेश सागर के गर्भ में रहा। यहां की मरुभूमि से प्राप्त शंख, सीप, कोड़ी के अर्धपाषाण रूपों में भी इस प्रदेश के किसी समय जलमग्न रहने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।

जैसलमेर स्थित कुलधरा पुरातात्विक स्थल
भूवैज्ञानिक साक्ष्यों से पहले ही सिद्ध हो चुका है कि यहां पहले समुद्र लहराता था। परन्तु भूकम्प या अन्य प्राकृतिक कारणों से भूमि ऊंची उठने के कारण समुद्री जल दक्षिण की ओर हट गया और उसका स्थान रेत के टीलों ने ले लिया। इसके प्रमाण हमें वैदिक साहित्य में भी मिलते है। ऋग्वेद के पहले मण्डल में उल्लेख है कि समुद्र के दक्षिण दिशा पर एक विस्तृत बालूका प्रदेश है। जो अपने आसपास की उपजाऊ भूमि को अनुर्वर बना रहा है। इस प्रदेश में ऋग्वेदिक आर्यों की एक शाखा मारुत निवास करने हेतु आई थी। मारुतों के निवास तथा कालान्तर में ‘त‘ के लोप से यह प्रदेश मारु प्रदेश कहलाया। ऋग्वेद के दसवें मण्डल व शतपथ ब्राह्मण के साक्ष्य अनुसार समुद्रों से मरूस्थल में परिवर्तन की घटना ऋग्वेद काल में घटित हुई है। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरी शंकर हीरा–चंद ओझा ने अनुमान लगाया है कि वैदिक नदियां सरस्वती, दृषद्वती आदि भी इस प्रदेश के कुछ भाग को आप्लावित करती थी , समुद्र समाप्ति के पश्चात भी इन नदियों ने कुछ समय तक जैसलमेर राज्य को समृद्ध बनाए रखा। धीरे–धीरे होने वाले भौगोलिक अवसादों ने इस प्रदेश को शुष्क और जलविहीन बना दिया।

जैसलमेर का किला
थार मरुस्थल के मध्य अवस्थित जैसलमेर क्षेत्र प्राचीन इतिहास को अपने अन्दर समेटे है। वर्तमान जैसलमेर के आस–पास का प्रदेश माड कहलाता रहा है। प्रतिहार शासक कक्कुक के घटियाला अभिलेख में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। आज भी इस प्रदेश को माड के नाम से जाना जाता है। इस प्रदेश में एक विशेष राग गाई जाती है जो “माण्ड” के नाम से जानी जाती है। इस प्रदेश के निवासियों को माड के आधार पर “माडा“, “माडेचा “और “माडेची” के विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।
कक्कुक के घटियाला अभिलेख में इस क्षेत्र के लिए “त्रवण“तथा “वल्ल” शब्द का प्रयोग भी हुआ। कहीं–कहीं वल्लपुरम या वल्लमण्डल भी पढ़ने को मिलता है। नवीं शताब्दी में राजशेखर द्वारा रचित ग्रन्थ “काव्य मीमांसा” में भी इस प्रदेश को त्रवण के नाम से पुकारा गया है। इस ग्रन्थ में त्रवण प्रदेश की गणना पश्चिमी देशों में सौराष्ट्र के साथ की है।

1965 का भारत-पाक युद्ध (एआई फोटो)
जैसलमेर राज्य की भूपटलीय संरचना का परिचय प्राप्त करना भी समीचीन होगा। जैसलमेर प्रदेश थार के रेगिस्तान का ही एक भाग है अतः इस प्रदेश में चतुर्दिक बालु मिट्टी से आच्छादित ऊबड़–खाबड़ व कहीं समतल प्रदेश दृष्टिगत होता है। क्षेत्र के पश्चिमी भाग में बड़े–बड़े मरु के टीबे मिलते हैं। जिन्हें स्थानीय बोली में “धोरों” के नाम से पुकारा जाता है। पर्यटन जगत में “सम के धोरे” बड़े चर्चित और सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र माने जाते है। प्राचीन समय में जैसलमेर के लिए कुछ इस प्रकार कहा जाता था –
घोड़ा कीजे काठ का, पिण्ड कीजे पाखाण।
बखतर कीजे लोह का, जद देखो जैसाण।।
यदि आपको जैसलमेर देखना हो तो आपका घोड़ा लकड़ी का, शरीर पत्थर का और वस्त्र लोहे के होने चाहिए तभी जैसलमेर की यात्रा कर सकते हैं। ऐसी कठिन परिस्थिति राजशाही जमाने के समय से 20 वर्ष बाद 1965 तक बनी रही। यह क्षेत्र विकसित नहीं हो सका, सड़कें, बिजली, टेलिफोन आदि का अभाव रहा।परंतु 1965 एवं 1971 के भारत – पाक युद्ध मे इस क्षेत्र का अभूतपूर्व योगदान रहा।

1971 भारत-पाक युद्ध (पाकिस्तान का समर्पण)
सीमावर्ती जिला जैसलमेर सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह अन्तर्राष्ट्रीय भारत–पाक सीमा से 471 किमी की सीमा साझा करता है । पश्चिमी राजस्थान के अन्तिम छोर पर पाकिस्तान की सीमा से सटा प्राचीन गढ़ ‘तणोट‘ जैसलमेर के इतिहास में अपना एक विशिष्ट महत्व रखता है। इस गढ़ के निर्माण के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित है–जैसलमेर री ख्यात के अनुसार केहर के पुत्र तणुराव (तन्नूराव) ने तणोट में गढ़ का निर्माण करवा कर वहां अपनी राजधानी स्थापित की,जबकि गैजेटियर में तणोट की स्थापना का श्रेय केहर को दिया गया है।
प्राचीन काल में सिन्ध, पंजाब तथा अफगानिस्तान एवं मक्का मदिना जाने वाले हज यात्रियों तथा व्यापारिक काफिलों का यह मुख्य मार्ग था। इस कारण इस नगर एवं गढ़ पर सदा दुश्मनों की नजर रहती थी। राजशाही शासन में थल मार्ग से होने वाले व्यापारिक मार्ग से तणोट जुड़ा हुआ था। सुदूर पश्चिमी देशों का व्यापारिक मार्ग ऊंटों के द्वारा लोद्रवा से होकर तणोट की ओर जाता था। मार्ग में जल का बड़ा अभाव था। लोगों को पीने के पानी की आपूर्ति 60 पुरस (लगभग दो सौ फीट) गहरे पानी के कुओं से होती थी। इस कारण मार्ग में मानव, पशु, पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते थे। दूर दूर तक रेत लहराते टीले, फोग, आक, जाल, खेजड़ी, केर आदि के छितरे वृक्ष दिखाई देते थे। कभी–कभी आंधी और तूफान के कारण रेत उड़कर इधर से उधर चली जाती थी। इस कारण मार्ग दिखाई नहीं देते थे। रेत में विशाल भंवर होते थे जिसमें लोग अन्दर के अन्दर धंसते चले जाते थे।
पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर जिले की सीमावर्ती चौकी में तणोट चौकी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसीलिए 1965 और 1971 के मरुसमरांगण में तणोट का नाम स्वर्णिम पृष्ठ पर अंकित है। 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान शत्रु सेना ने लगातार 48 घंटे तक तणोट क्षेत्र में करीब 3000 गोले बरसाए लेकिन मां तणोट राय की असीम कृपा से अधिकांश गोले अपना लक्ष्य चूक गए । पाकिस्तान सेना के द्वारा बरसाए गोले जो तणोट माता की कृपा के फलस्वरुप फटे नहीं, उन गोलों में से कुछ गोले मंदिर परिसर में आज भी रखे हुए हैं। 1965 के भारत–पाक युद्ध में तणोट की लड़ाई में भारतीय सेना की विजय हुई इस युद्ध को 20वीं सदी की सर्वाधिक चमत्कारी घटना कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस विजय के उपलक्ष्य में भारतीय सेना ने तणोट राय के मंदिर में एक शिलालेख भी स्थापित कराया जो मां तणोट राय के अद्भुत चमत्कार का पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य है। इसी प्रकार 1971 के भारत – पाक युद्ध , जो थार रेगिस्तान में लोंगेवाला सीमा चौकी पर लड़ा गया था, यह भी एक ऐतिहासिक युद्ध था, यह भारतीय सेना के एक छोटे से दल और एक बड़ी पाकिस्तान सेना के बीच हुआ था।

माना जाता है कि इसमें भी माँ तणोट राय ने भारतीय सेना की चमत्कारी सहायता की जिससे भारतीय सेना पूर्ण विजयी हुई। इस युद्ध की विजय 16 दिसंबर को होने के कारण भारतीय सेना इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाती है।
1965 एवम 1971 के युद्ध के लिए कुछ पक्तियाँ इतिहासकार नन्द किशोर शर्मा द्वारा इस प्रकार लिखी गयी है –








