भारत और नेपाल के बीच 25 नवम्बर से 19वां ‘सूर्यकिरण’ सैन्य अभ्यास
भारत और नेपाल, दो ऐसे पड़ोसी देश हैं जिनके बीच इतिहास, संस्कृति, धर्म और परंपराओं के अनगिनत सूत्र जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि दोनों देशों की सेनाएँ जब भी एक साथ प्रशिक्षण करती हैं, उसे केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं माना जाता, बल्कि यह रोटी-बेटी के रिश्ते और साझी विरासत का जीवंत उत्सव बन जाता है। इसी कड़ी में 25 नवम्बर से उत्तराखंड में 19वां ‘सूर्यकिरण’ संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू हो रहा है, जिसकी प्रतीक्षा दोनों सेनाओं में लंबे समय से की जा रही थी।
हिमालय की गोद में सहयोग का नया सूर्योदय
उत्तराखंड की शांत पर्वतमाला और देवभूमि की पवित्र वादी इस अभ्यास की मेजबानी कर रही है। ‘सूर्यकिरण’ भारत-नेपाल के बीच होने वाले सबसे बड़े द्विपक्षीय सैन्य प्रशिक्षणों में से एक है, जो बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित किया जाता है। इस वर्ष भारत की मेजबानी में आयोजित होने वाला यह अभ्यास न केवल सामरिक तालमेल को मज़बूत करेगा, बल्कि लोगों के रिश्तों की गर्माहट को भी नई ऊर्जा देगा।
युद्ध तकनीकी का आदान-प्रदान
जानकार मानते हैं कि ‘सूर्यकिरण’ अभ्यास का मूल उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी संचालन क्षमता, युद्ध तकनीकी का आदान-प्रदान और पर्वतीय युद्ध तकनीकों को मज़बूत करना है। भारत और नेपाल दोनों ही पर्वतीय भूभाग वाले देश हैं, इसलिए पर्वतीय युद्ध, आपदा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी अभियानों और मानवीय सहायता जैसे विषय इस अभ्यास के केंद्र में रहते हैं।
इसके साथ ही, दोनों सेनाओं के जवानों के बीच वर्षों से चला आ रहा भावनात्मक जुड़ाव इस अभ्यास को एक अनोखी सांस्कृतिक छटा प्रदान करता है। भारतीय सेना में आज भी हजारों गोरखा सैनिक सेवा कर रहे हैं, जो दोनों सेनाओं के बीच गहरी साझेदारी का प्रतीक हैं।
निरंतरता और भविष्य की तैयारी
भारत और नेपाल 2011 से ‘सूर्यकिरण’ अभ्यास करते आ रहे हैं। इसकी शुरुआत जिस भावना के साथ हुई थी, वह समय के साथ और मजबूत हुई है। इस 19वें संस्करण में दोनों देश आधुनिक हथियार प्रणालियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी तकनीकों, संयुक्त योजना और युद्धाभ्यास, और जंगल़ में प्रशिक्षण जैसे नए अभ्यासों पर भी फोकस कर रहे हैं।
दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान
अभ्यास के दौरान दोनों सेनाओं के जवान सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोकगीतों और पारंपरिक भोजों में भी शामिल होते हैं। पहाड़ी ढोल-दमाऊ की थाप से लेकर नेपाली मादल की लय तक ये समारोह सैनिकों को याद दिलाते हैं कि वे सिर्फ युद्धक क्षमता बढ़ाने नहीं आए, बल्कि साझा संस्कृति की विरासत को और गहरा करने आए हैं। यही वह क्षण होते हैं जब सैनिक वर्दी के परे एक दूसरे को इंसान, मित्र और पड़ोसी के रूप में देखते हैं।
19वां ‘सूर्यकिरण’ अभ्यास केवल भारत- नेपाल की सैन्य साझेदारी का विस्तार नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक, सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक संबंधों का निरंतर पुष्टिकरण भी है। हिमालय की ऊँचाइयों में शुरू हो रहा यह संवाद दोनों राष्ट्रों के लिए सुरक्षा का आश्वासन देता ही है और आने वाली पीढ़ियों को आपसी सहयोग बढ़ाने की प्रेरणा देता है।








