नागालैंड–मणिपुर सीमा का दूरस्थ गाँव केन्दुंग
असम राइफल्स अपनी शानदार पहल से यहाँ सुरक्षा के नए ‘मॉडल‘ की बुनियाद रख रही है। जवान पहुँचे, बुज़ुर्गों से संवाद किया, युवाओं को शिक्षा और खेल की ताकत समझाई, बच्चों में जोश भरा—यह सिर्फ सामुदायिक कार्यक्रम नहीं, यह ‘360-डिग्री सिक्योरिटी‘ का भारतीय संस्करण है। सीमा पर तैनात फौज अगर समाज को सशक्त करती है, तो हर नागरिक सीमा का अदृश्य रक्षक बन जाता है।
सीमाओं पर तैनाती का मतलब सिर्फ बंदूक उठाना नहीं, समाज को खड़ा करना भी है। असम राइफल्स ने स्पष्ट किया—’हम सिर्फ सीमा नहीं बचाते, समाज भी बनाते हैं।‘ युवा प्रोत्साहन, शिक्षा संवर्धन, और स्थानीय भागीदारी – यह तीन स्तंभ मिलकर सीमा–रक्षा को सामाजिक ताकत में बदल देते हैं। केन्दुंग की यह पहल साबित करती है कि जब सेना समाज के बीच पहुँचती है, सीमा सिर्फ भौगोलिक रूप से ही नहीं, भावनात्मक धरातल पर भी सशक्त होती है। यही भरोसा, किसी भी हथियार से अधिक सुरक्षित बनाता है। सच यही है कि जब समाज सशक्त होता है, सीमा सुदृढ़ होती है। केन्दुंग की यह यात्रा केवल फौजी मुलाकात नहीं, यह राष्ट्र–निर्माण की उस पद्धति की प्रेरक कथा है जहाँ सुरक्षा और समाज–सेवा, दोनों एक ही अर्थ के दो नाम हैं।








