सीमा-दृष्टि

मातृभूमि की सीमाओं का संरक्षण

माता का आंचल: सीमाएँ, संस्कृति और राष्ट्र-रक्षा मानव-सभ्यता के उषाकाल से लेकर आज के इस आधुनिक काल तक, मानवता की समस्त संस्कृतियों के हृदय में एक ऐसा अमर सत्य निहित रहा है, जो कालातीत है, सीमाहीन है, और जिसकी गहराई अथाह है। वह सत्य यह है कि धरती को माता के रूप में पूजने की…

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वन्दे मातरम्: भारत की स्वाधीनता का मंत्र

वन्दे मातरम्: ब्रिटिश दमन से लेकर भारत की सीमा-रक्षा तक   -भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार जब किसी राष्ट्र की चेतना पर विदेशी सत्ता की हथकड़ी बैठती है, तब कभी-कभी किसी संत के हृदय से ऐसी कविता फूट पड़ती है, जो इतिहास के सर्वाधिक क्रांतिकारी परिवर्तन का कारण बन जाती है। ‘वन्दे मातरम्’ ऐसा ही महामंत्र…

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‘वंदे मातरम्’ साम्राज्यवाद के खिलाफ बिगुल

वंदे मातरम्: जब एक गीत ने ब्रिटिश साम्राज्य को थरथराय भारत की शताब्दियों पुरानी संस्कृति में सदैव एक न एक दीपक जलता रहा है। उसे ही कहते हैं राष्ट्र-चेतना। परंतु जब यह दीपक गीत बनकर देशभक्ति के स्वर में सामने आया, तब ब्रिटिश शासकों के हृदय में वह भय की लपट बन उठा। यह गीत…

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बुद्ध की भूमि पर दो सेनाओं का शांति-संकल्प

बोधगया में भारत-श्रीलंका सैन्य सहयोग का नया अध्याय बिहार के बोधगया में भारत और श्रीलंका के बीच सीमा सुरक्षा, संस्कृति, अध्यात्म और कूटनीति पर वार्ता संपन्न हो गई। यहां 18 से 20 नवंबर 2025 तक भारत-श्रीलंका आर्मी-टू-आर्मी स्टाफ टॉक्स (AAST) का 11वां दौर संपन्न हो गया। यह बैठक श्रीलंका के छह सदस्ययों की अगुवाई में…

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वन्दे मातरम् की अनादि यात्रा

वन्दे मातरम्: भारत की आत्मचेतना कभी-कभी इतिहास ऐसे विलक्षण क्षणों से गुजरता है, जहाँ एक कलम की नोक, एक विचार की चमक और एक शब्द का स्पर्श समूचे राष्ट्र को झकझोर कर उठा देता है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण तब उदित हुआ, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से ‘वन्दे मातरम्’ जैसा अमर गीत प्रस्फुटित…

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पहाड़ की खुशबू, परंपराओं की छांव

भारत-नेपाल की साझा विरासत को सहेजता जौलजीबी मेला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में हर वर्ष 14 नवम्बर से 25 नवम्बर के बीच जौलजीवी मेले का आयोजन होता है। काली और गोरी नदियों के पवित्र संगम पर हर साल लगने वाला यह मेला एक बार फिर जीवंत हो उठा है। सदियों पुराना यह मेला सिर्फ़ व्यापारिक…

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