कानूनी कमजोरियाँ: आतंकवाद और सीमा नियंत्रण से संबंधित विधिक प्रावधानों की दुर्बलता
डॉ. अभिरंजन दीक्षित
डॉ. ऐश्वर्या सिंह
पिछले दो दशकों में वैश्विक आतंकवाद का खतरा और अधिक विकराल हो गया है। इसके परिणामस्वरूप कई देश निरंतर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्कों और छिद्रपूर्ण सीमाओं के चलते। यद्यपि सरकारों ने खुफिया तंत्र, रक्षा, और पुलिस व्यवस्था में भारी निवेश किया है, किंतु आतंकवाद निरोध तथा सीमा सुरक्षा प्रबंधन हेतु जो विधिक ढांचे निर्मित हैं, वे प्रायः कालबाह्य, असंगत या कमजोर सिद्ध हो रहे हैं। इन विधिक खामियों के कारण न केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यक्षमता बाधित होती है, बल्कि आतंकवादी एवं तस्कर ऐसी कमजोर व्यवस्थाओं का लाभ उठाकर अपने मंतव्यों में सफल हो जाते हैं।
यह आलेख आतंकवाद और सीमा नियंत्रण की चार प्रमुख विधिक कमजोरियों की पड़ताल करता है:
- कालबाह्य परिभाषाएँ और विधिक ढांचे
- अंतरराष्ट्रीय विधिक सहयोग की न्यूनता
- सीमा नियंत्रण से संबंधित प्रक्रियात्मक प्रावधानों की अस्पष्टता
- प्रवर्तन तंत्र और न्यायिक क्षमता की दुर्बलता
कालबाह्य विधिक परिभाषाएँ और ढांचे
आतंकवाद से विधिक स्तर पर लड़ने में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई देशों के कानून अब भी पुरानी परिभाषाओं पर आधारित हैं। अधिकांश आतंकवाद निरोधक कानून ऐसे कालखंड में बने थे जब देशांतर्गत असंतोष मुख्य चुनौती थी; वे वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में उभरते साइबर आतंकवाद, ऑनलाइन कट्टरपंथ, तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्रों की भूमिका को नज़रअंदाज़ करते हैं। इसके अतिरिक्त, अधिकांश देशों के विधिक तंत्रों में आतंकवाद को अब भी आपराधिक कानून की एक उपश्रेणी के रूप में देखा जाता है, न कि एक विशिष्ट चुनौती के रूप में जो विशेष विधिक साधनों और प्रक्रियाओं की मांग करता है। इसका प्रतिफल यह होता है कि आतंकवादी कृत्यों को रोकने के लिए आवश्यक निगरानी, संपत्ति जब्ती, और यात्रा प्रतिबंध जैसी विधिक प्राधिकार सीमित रह जाते हैं। आधुनिक आतंकवादी खतरों के अनुसार यदि विधिक ढांचा अद्यतन न किया जाए तो कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ प्रतिक्रियात्मक रूप से कार्य करती हैं, न कि निवारक रूप में।
अंतरराष्ट्रीय विधिक सहयोग की न्यूनता
चूँकि आतंकी संगठन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार सक्रिय रहते हैं, इसलिए प्रभावी आतंकवाद-निरोध के लिए देशों के बीच गहन विधिक सहयोग अनिवार्य है। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन विभिन्न संधियों के माध्यम से इस दिशा में प्रयासरत हैं, फिर भी इन संधियों के कार्यान्वयन में राष्ट्रीय राजनीति और विधिक इच्छाशक्ति की कमी स्पष्ट है। प्रत्यर्पण संधियाँ अक्सर सीमित या पुरानी होती हैं, जिससे संदिग्धों को लाने में बाधाएँ आती हैं। गोपनीय खुफिया जानकारी साझा करने में देशों के बीच अविश्वास, गोपनीयता कानूनों की जटिलता, और राजनीतिक प्रभाव के भय के कारण बाधाएँ आती हैं। डिजिटल साक्ष्यों, वित्तीय लेनदेन और एन्क्रिप्टेड संचार से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं में मानकीकरण का अभाव समन्वय को और जटिल बनाता है। ऐसे में वैश्विक मानकों के अनुरूप विधिक तंत्रों का विकास अनिवार्य है।
सीमा नियंत्रण में प्रक्रियात्मक प्रावधानों का अभाव
सीमा सुरक्षा आतंकवाद निरोध की प्रथम पंक्ति होती है, किंतु कई देशों के कानूनों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि सीमा एजेंसियों को किन परिस्थितियों में कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हैं। कहीं एजेंसियाँ अत्यधिक विवेकाधिकार का प्रयोग करती हैं, तो कहीं सख्त कानूनी प्रावधान उन्हें आवश्यक सुरक्षा जाँच करने से रोकते हैं। बायोमेट्रिक आंकड़े, यात्री इतिहास, और निगरानी तकनीकों के प्रयोग से संबंधित विधिक स्पष्टता का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। गोपनीयता कानूनों के कारण सीमावर्ती जांच में बाधाएँ आती हैं, जिससे नकली पहचान या जाली दस्तावेजों के सहारे आतंकी घुसपैठ संभव हो पाती है। शरणार्थी कानूनों की अस्पष्टता तथा जांच प्रक्रियाओं की कमज़ोरी भी आतंकवादियों को मानवतावादी माध्यमों से घुसपैठ का अवसर प्रदान करती है। इस संदर्भ में, जबकि वास्तविक शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है, वहीं यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सुरक्षा एजेंसियाँ समय रहते पृष्ठभूमि की जांच कर सकें।
प्रवर्तन तंत्र और न्यायिक प्रणाली की दुर्बलता
विधिक प्रावधानों के बावजूद यदि उन्हें लागू करने वाला तंत्र कमजोर हो, तो आतंकवाद निरोध असफल ही रहेगा। कई देशों की पुलिस और जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त प्रशिक्षण, तकनीकी साधन या कानूनी अधिकार नहीं होते। आतंकवाद संबंधी मुकदमों में साक्ष्य की जटिलता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गुप्त सूचनाओं को न्यायालय में प्रस्तुत करने की कठिनाई अभियोजन को और भी कठिन बना देती है। वहीं कई देशों की न्यायिक प्रणाली राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, और मुकदमों की भीड़ से ग्रस्त है, जिससे अभियुक्तों को दंड से मुक्ति मिल जाती है। गवाह सुरक्षा कार्यक्रमों की कमी तथा डिजिटल साक्ष्यों की वैधता को लेकर अस्पष्टता भी अभियोजन प्रणाली को कमजोर करती है। आतंकवाद संबंधी मामलों की जटिलता को देखते हुए विशेष न्यायालयों की स्थापना आवश्यक है।
समाधान: आतंकवाद एवं सीमा नियंत्रण से संबंधित विधिक सुधार की दिशा में कदम
- आतंकवाद निरोधक कानूनों का आधुनिकीकरण करें – परिभाषाओं में साइबर आतंकवाद, ऑनलाइन कट्टरपंथ, एवं वित्तीय नेटवर्क शामिल हों। संपत्ति जब्ती, यात्रा प्रतिबंध जैसी निवारक विधिक शक्तियाँ सुलभ हों।
- अंतरराष्ट्रीय विधिक सहयोग को सुदृढ़ करें –प्रत्यर्पण और आपसी विधिक सहायता संधियों (MLATs) को सशक्त बनाएं। खुफिया जानकारी, डिजिटल साक्ष्य और संयुक्त जांचों के लिए मानकीकृत प्रक्रियाएँ लागू हों।
- सीमा नियंत्रण के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया लागू करें – बायोमेट्रिक डाटा, निगरानी और यात्री स्क्रीनिंग हेतु मानकीकृत दिशानिर्देश निर्धारित हों। मानवीय अधिकारों की रक्षा करते हुए निगरानी व उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए।
- न्यायिक एवं संस्थागत क्षमता का विकास करें – तकनीकी संसाधन, डिजिटल उपकरण, और एजेंसियों के बीच समन्वय को सुदृढ़ किया जाए।
एक गहराई से जुड़ी हुई वैश्विक व्यवस्था में आतंकवाद और सीमा सुरक्षा के लिए मजबूत, लचीले और समन्वित विधिक ढांचे की आवश्यकता है। पुरानी परिभाषाएँ, अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी, प्रक्रियात्मक अस्पष्टता, और प्रवर्तन की कमजोरी – ये सभी तत्व राष्ट्रों को आतंरिक और बाह्य खतरों के प्रति असुरक्षित बनाते हैं। इन कमजोरियों को दूर करने के लिए न केवल सख्त कानूनों की आवश्यकता है, बल्कि कानूनी प्रणाली को समयोचित बनाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विधिक समरसता लाना और संस्थागत क्षमता को विकसित करना भी अत्यंत आवश्यक है। आतंकवाद से निपटने की दृष्टि से यह उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसे दंडित किया जाए, जितना कि उसे समय रहते पहचानकर रोका जाए। विधिक व्यवस्था को केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि पूर्वनिवारक भी बनाना होगा। यह केवल राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी अनिवार्य है।








