तकनीकी सामरिक युद्ध: सीमाओं के परे, भविष्य के संघर्ष
डॉ. आर. के. अरोड़ा
(सीमा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा तथा लोकनीति के विशेषज्ञ)
आज दुनिया संघर्षों को लड़ने और प्रतिरोध को बनाए रखने के तरीके में आमूल-चूल परिवर्तन देख रही है। हाल ही में भारत-पाक के बीच जो तनाव बढ़ा, जिसमें पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए भारत की साहसिक प्रतिक्रिया शामिल है, यह पारंपरिक तौर-तरीके के विपरीत तकनीक आधारित हाइब्रिड युद्ध की ओर बढ़ते बदलाव का संकेत है। पूर्वी यूरोप से लेकर मध्य पूर्व तक कई थिएटरों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के साथ, अब एक बात स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध अब संख्याओं का खेल नहीं रह गया है, बल्कि सटीकता, गति और तकनीकी श्रेष्ठता पर केंद्रित है।
ऑपरेशन सिंदूर: उपमहाद्वीप में एक महत्वपूर्ण मोड़
पहलगाम में हुए नृशंस आतंकवादी हमले के बाद, जिसमें भारतीय नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई, भारत ने जवाबी कार्रवाई के रूप मे ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में नौ प्रमुख स्थानों को निशाना बनाया गया। इनमें मुजफ्फराबाद, बहावलपुर, कोटली, नीलम घाटी और चकवाल जैसे इलाके शामिल थे, जो लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) जैसे समूहों से जुड़ी आतंकवादी गतिविधियों के संदिग्ध केंद्र हैं। इस ऑपरेशन को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाली बात यह थी कि इनमें पारंपरिक ज़मीनी अतिक्रमण नदारद था। लंबी दूरी के सटीक हमलों, उन्नत ड्रोन, स्टैंड-ऑफ मिसाइलों और साइबर क्षमताओं का उपयोग करते हुए, भारत ने सीमा पार किए बिना ही दुश्मन के इलाकों में काफ़ी अंदर तक जाकर काफ़ी नुकसान पहुँचाया। यह 1999 के कारगिल युद्ध या 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक जैसे पिछले संघर्षों से एक परिवर्तित स्ट्राइक था, जिसमें मुख्य रूप से ज़मीनी स्तर पर सैनिकों का इस्तेमाल किया गया था।
वायु शक्ति की बदलती भूमिका
इस घटनाक्रम ने हवाई युद्ध के सिद्धांत में भी एक बड़े बदलाव को उजागर किया। सुखोई-30 एमकेआई, मिराज 2000 और एफ-16 जैसे लड़ाकू जेट अभी भी उपमहाद्वीपीय शस्त्रागार में आज भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। वर्तमान हालातों में अब उनकी भूमिका एंटी-एक्सेस सिस्टम, सैटेलाइट गाइडेड हथियार और मानवरहित वायु यान के झुंडों द्वारा परिभाषित युद्धक्षेत्र में तेजी से सीमित होती जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कोई हवाई लड़ाई या पारंपरिक हवाई क्षेत्र का उल्लंघन नहीं हुआ। इसके बजाय ड्रोन और लंबी दूरी के हथियारों ने मुख्य भूमिका निभाई। भारत और पाकिस्तान दोनों अब हमले करने और वास्तविक समय की खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए मानव रहित हवाई प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक जैमर, जीपीएस स्पूफिंग टूल और लोइटरिंग हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है। लड़ाकू विमान अब प्रबल-खतरे वाले वातावरण में कम प्रासंगिक होते जा रहे हैं, जहाँ सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आसमान पर हावी हैं।
वैश्विक प्रतिध्वनि: यूक्रेन से इजरायल तक
यह क्रांतिकारी परिवर्तन केवल दक्षिण एशिया तक ही सीमित नहीं है। यूक्रेन-रूस संघर्ष ने पहले ही 21वीं सदी के युद्धों के स्वरूप को फिर से परिभाषित कर दिया है। यूक्रेन, पारंपरिक गोलाबारी में पिछड़ा होने के बावजूद, छोटे, बुद्धिमान ड्रोन, एआई-संवर्धित लक्ष्यीकरण और पश्चिमी देशों द्वारा प्रदान किए गए सटीक हथियारों का इस्तेमाल करके रूसी रसद और कमांड संरचनाओं को तबाह कर रहा है; कभी-कभी तो सीमावर्ती क्षेत्रों से सैकड़ों किलोमीटर अंदर तक जाकर भी। जून के महीने में यूक्रेन ने केर्च ब्रिज पर पानी के भीतर विस्फोटकों का इस्तेमाल किया, जो एक मीट्रिक टन टीएनटी के बराबर था। इसे रूस के भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था पर सेंध लगाते हुए सर्जिकल सटीकता के रूप मे देखा जा सकता है। यहाँ विस्मयकारी बात यह है कि इस आक्रमण में कोई पारंपरिक नौसैनिक जहाज शामिल नहीं था। इसके बजाय, मात्र तकनीक के उपयोग से रणनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से गंभीर प्रभाव डाला गया।

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष में, अज़रबैजान द्वारा तुर्कीये निर्मित बायरकटर ड्रोन और इज़रायली लोइटरिंग हथियारों के उपयोग ने 2020 में अर्मेनियाई सेनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया था। ये स्मार्ट ड्रोन न केवल निगरानी के उपकरण थे, बल्कि बेहद सटीक हमले करने में भी सक्षम थे, जो रडार की पकड़ से बचते हुए टैंकों, रडार और यहां तक कि कठोर बंकरों को नष्ट करने में सक्षम थे। इसी तरह, संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने दुनिया को दिखाया है कि कैसे सटीक तकनीक-आधारित ऑपरेशन भू-राजनीतिक गतिशीलता को बदल सकते हैं। चाहे वह अमेरिकी ड्रोन हमला हो जिसने ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी को मार डाला, या इज़राइल द्वारा गाजा में हमास नेतृत्व को वास्तविक समय आधारित खुफिया जानकारी, सर्जिकल ड्रोन और हवाई हमलों के माध्यम से निशाना बनाना। आधुनिक युद्ध अब युद्ध के मैदान में पारंपरिक हार या जीत से कहीं अलग सटीक उन्मूलन पर केंद्रित है।
दक्षिण एशिया के लिए रणनीतिक निहितार्थ
भारत और पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न हैं और लंबे समय से क्षेत्रीय और वैचारिक विवादों में परस्पर उलझे हुए हैं। युद्ध नीति-रीति में यह बदलाव दोनों के लिए ही अपार अवसर और गंभीर खतरे दोनों ही लेकर आया है। एक ओर, सटीक हमले से तनावपूर्ण स्थिति पर शीघ्र नियंत्रण संभव होता है, निर्दोष नागरिकों के हताहत होने की संख्या लगभग नगण्य होती है और वृहद पैमाने पर युद्ध की संभावनाएं सीमित होती है। लेकिन दूसरी ओर, स्वायत्त हमलों के कारण गलत अनुमान या अनपेक्षित परिणाम बहुत तेज़ी से बढ़ सकते हैं, खासकर तब जब भ्रामक सूचना अभियानों और साइबर हेरफेर के धुंधलके में हमला किया जाता है।
भारत का वर्तमान दृष्टिकोण व्यापक रणनीतिक पुनर्संतुलन के साथ संरेखित प्रतीत होता है, जिसमें अंतरिक्ष-आधारित निगरानी, साइबर संचालन, एआई-समर्थित निर्णय लेने वाले उपकरण और पारंपरिक युद्ध के बिना सीमा पार के खतरों को बेअसर करने के लिए सामरिक मानव रहित वायुयान क्षमताओं को एकीकृत किया गया है। पाकिस्तान ने भी चीनी मूल के ड्रोन, जीपीएस जैमिंग सिस्टम और डीपफेक प्रचार में भारी निवेश किया है। इसके चलते दक्षिण एशिया हाइब्रिड संघर्ष मॉडल के लिए एक परीक्षण स्थल बन गया है।
तकनीकी सामरिक युद्ध का उदय
कुल मिलाकर, आधुनिक युद्ध नीति रीति में मूलभूत बदलाव हो रहा है, जहाँ पारंपरिक जनशक्ति और क्षेत्रीय नियंत्रण के स्थान पर तकनीक एक निर्णायक भूमिका ग्रहण कर रही है। यूक्रेन, नागोर्नो-काराबाख, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में चल रहे संघर्ष यह दर्शाते हैं कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, साइबर उपकरण और सटीक-निर्देशित युद्ध सामग्री अब सैन्य अभियानों के केंद्र मे हैं। एआई का व्यापक रूप से टोही और पूर्वानुमान विश्लेषण के लिए उपयोग किया जा रहा है; जबकि घूमने वाले और स्वायत्त ड्रोन, कम लागत मे लगातार हमला करने की क्षमता प्रदान करते हैं। साथ ही, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले और भ्रामक सूचना का प्रचार प्रसार सहित साइबर युद्ध किसी भी संघर्ष की स्थिति में एक अभिन्न अंग बन गये हैं।
विकास के इस क्रम ने युद्ध के भूगोल की परिभाषा को ही बदल दिया है। स्टैंडऑफ हथियारों और सैटेलाइट, लंबी दूरी के ड्रोन, तात्क्षणिक रूप से काम करने वाले खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही सिस्टम के माध्यम से आज देश जमीनी स्तर पर सैन्य गतिविधि के बिना, अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र से ही दुश्मन की संपत्तियों पर उसकी सीमा के बहुत अंदर तक घुस कर हमला कर सकते हैं। जब खुफिया जानकारी सीधे निर्णय तंत्र से भेजी जाती हैं, तब प्रतिक्रिया केवल तेज़ नहीं, बल्कि अत्यंत सटीक और लक्ष्यभेदी बन जाती है। तकनीकी रणनीतिक युद्ध का उदय एक ऐसे भविष्य का संकेत देता है, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल कमांड नेटवर्क, टैंक या लड़ाकू जेट से ज़्यादा युद्ध के मैदान को मूर्त स्वरूप प्रदान करते हैं।
भविष्य के संघर्ष: स्मार्ट, त्वरित और रणनीतिक
अगली पीढ़ी के युद्ध संभवतः एआई-संचालित, एकीकृत तकनीक आधारित और मानव-पर्यवेक्षित होंगे। परमाणु निरोध एक रणनीतिक विचार बना रहेगा, जबकि वास्तविक संघर्ष साइबरस्पेस, सूचना नेटवर्क और सटीक युद्ध-क्षेत्र के धुंधलके युद्ध-मैदान में लड़े जाएँगे। सेनाओं को अब क्वांटम कंप्यूटिंग, हाइपरसोनिक हथियारों, झुंड ड्रोन और एकीकृत युद्ध नेटवर्क के क्षेत्र में अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत को क्षेत्रीय रक्षा से ऊपर उठकर डेटा-संचालित खतरा प्रबंधन की दिशा में उन्मुख होने की आवश्यकता है। प्रशिक्षण को भी पारंपरिक युद्ध अभ्यास से आगे बढ़कर तकनीकी प्रवीणता, साइबर दृढ़ता और अनुकूली युद्ध गेमिंग (adaptive war gaming) में बदलना होगा।
भविष्य का युद्धक्षेत्र आपके आस-पास
ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद की घटनाएं न केवल भारत और पाकिस्तान के लिए बल्कि पारंपरिक युद्ध के अंतिम दौर से गुजर रहे सभी देशों के लिए एक चेतावनी हैं। युद्ध के आधुनिक उपकरण अब सेना और टैंक डिवीजन नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका स्थान एल्गोरिथ्म, उपग्रह और मानव रहित मशीनों ने ले लिया है। आज सीमाएँ ही एकमात्र युद्धक्षेत्र नहीं हैं, बल्कि क्लाउड, सर्वर और न्यूरल नेटवर्क अब युद्धक्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं।
राष्ट्रों को सुरक्षित बने रहने के लिए, उन्हें अपने सैनिकों को सुसज्जित करने से कहीं अधिक, बहुत कुछ करना होगा। उन्हें अपनी प्रणालियों, संस्थाओं और रणनीतिक सोच को एक ऐसे विश्व के लिए सुसज्जित करना होगा, जहां पहला आक्रमण डिजिटल स्वरूप में हो सकता है, और अंतिम प्रहार ऐसा कि उसे कभी देखा ही न जा सके।








