सोमनाथ की भविष्यवाणी: कौन टिकेगा, कौन इतिहास बनेगा
भोगेन्द्र पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को जब हम बारीकी से देखते हैं, तो एक अद्भुत दृश्य उभरकर आता है – दो रेखाएँ एक साथ चलती हुई, पर विरुद्ध दिशाओं में। एक रेखा है तलवार की जो खून से लिखी गई, क्रूरता से रंगी गई, विजय और विनाश के बीच झूलती हुई। यह रेखा ज्यों-ज्यों चलती है, त्यों-त्यों धरती काँपती है, आबादियाँ उजड़ती हैं, मंदिर राख हो जाते हैं। यह है विदेशी आक्रांताओं की विजय-गाथा। दूसरी रेखा है तूलिका की जो न खून से लिखी गई, न क्रूरता से रंगी गई, बल्कि सहस्राब्दियों की साधना से, पीढ़ियों की श्रद्धा से, अदम्य संकल्प से लिखी गई। यह रेखा तलवार की मार सहती है, पर थमती नहीं। टूटती है, पर मिटती नहीं। यह है भारतीय सभ्यता की निरंतरता की गाथा।
जब हम मध्यकाल की बात करते हैं, तो हम केवल भूभाग पर हुए आक्रमणों की कथा नहीं कह रहे होते। यह केवल भौगोलिक विजय का इतिहास नहीं है। इससे कहीं अधिक गहरा और कहीं अधिक पीड़ादायक कुछ और है, और वह है एक राष्ट्र की आत्मा पर हुए प्रहारों का इतिहास। जब महमूद गज़नी ने सोमनाथ को तोड़ा, तो वह केवल पत्थर नहीं तोड़ रहा था। जब बाबर ने श्रीराम मंदिर का विध्वंस किया तो तब उसका लक्ष्य था – भारत के शिखर को नष्ट कर अपने को सुल्तान और भारतीयों को शासित एवं गौरवहीन करना। जब औरंगजेब ने काशी और मथुरा के देवालयों को ध्वस्त किया, तो वह केवल संरचनाएँ नहीं तोड़ रहा था। ये सब तलवारें वास्तव में भारतीय सभ्यता के हृदय को छेदने के प्रयास थे। इसका संदेश स्पष्ट था कि तुम्हारे देवता झूठे हैं, तुम्हारी परंपरा निरर्थक है, तुम्हारी सभ्यता मिट जाएगी। भारत की आत्मा पर इससे बड़ा कोई प्रहार हो नहीं सकता था। क्योंकि जब एक बाहरी शक्ति न केवल आपको जीतती है, बल्कि आपकी पहचान को, आपकी आस्था को, आपकी परंपरा को तोड़ने का प्रयास करती है, तो वह केवल राजनीतिक विजय नहीं है, वह आत्मनिर्णय का हनन है, सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है।
परंतु यहीं पर हम उस अद्भुत रहस्य को देखते हैं जो इतिहास के गर्भ में छिपा हुआ है। इतिहास स्वयं एक भविष्यवाणी करती है। वह भविष्यवाणी यह कहती है कि कौन टिकेगा, कौन ढहेगा, और कौन केवल एक क्रूर स्मृति बनकर ग्रंथों के हाशिये पर रह जाएगा। महमूद गज़नी आया, लूट-मार की, लौट गया। आज उसके राज्य का नाम तक नहीं है। उसका नाम केवल एक लूटेरा के रूप में, एक विध्वंसक के रूप में याद है। उसकी महत्ता गलियों के किस्सों में, आक्रोश की सूक्तियों में, अतीत की निंदा में रह गयी है। अलाउद्दीन खिलजी भारत के बड़े हिस्से को जीतना चाहता था, आज उसका साम्राज्य अलमारियों में बंद है – इतिहास की किताबों में, किसी संग्रहालय के कांच के पीछे। उसके सैनिकों के नाम कोई नहीं जानता। उसके विजय अभियान की वीरता अब केवल एक क्रूर कथा है। औरंगजेब भारत को एकीकृत साम्राज्य में बाँध देना चाहता था, उसके साम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसकी धार्मिक कट्टरता ने जो नींव खोदी, उसी में उसका साम्राज्य डूब गया। आज उसका नाम केवल धार्मिक कट्टरता के पर्याय के रूप में याद है।
परंतु देखिए, सोमनाथ मंदिर अभी भी है। मंदिरों की परंपरा अभी भी है। संस्कृत के श्लोक, तमिल के सेय्युल, तेलुगु के पद्यमु, मलयालम के पद्यम् आज भी मंदिरों में गूँज रहे हैं। काशी का आध्यात्मिक गौरव अभी भी है। मथुरा की परंपरा अभी भी है। विडंबना देखिए कि जिन्होंने इन सब को मिटाने का प्रयास किया, उनका नाम केवल इसी कारण शेष है कि वे ये तोड़ने वाले थे। आज वे राष्ट्र-विरोधियों, जेहादियों और वामपंथियों को प्रिय हैं; अन्यथा तो वे इतिहास की धूल में कब के खो गए होते। क्यों? क्योंकि तलवार की यह विशेषता होती है कि वह चमकती है तो बहुत चमकती है। जब वह रक्त से भीगी होती है, तब वह एक भयानक सुंदरता प्रकट करती है। विजय के क्षणों में तलवार की विजय-कथा सबसे अधिक प्रभावी दिखती है। परंतु तलवार के पास कोई स्थायी निर्माण करने की क्षमता नहीं है। वह केवल तोड़ सकती है, केवल काट सकती है, केवल विनाश कर सकती है। जब सैनिक लौट जाते हैं, जब विजय की चीखें शांत हो जाती हैं, तब तलवार के पास क्या बचता है? केवल राख, केवल खून, केवल दुःख की स्मृतियाँ। लोग कहते हैं, “देख, वहाँ एक क्रूर शासक था, जिसने इस मंदिर को तोड़ा था।” तलवार की अंतिम नियति यही है – एक क्रूर स्मृति, एक अंधकारमय अध्याय, एक ऐसी कहानी जो चेतावनी के रूप में रहती है, प्रेरणा के रूप में नहीं। जब तलवार की चमक मिट जाती है, तब भी तूलिका अपना काम जारी रखती है। हजार साल बाद, जब आप किसी सनातन गाँव में जाते हैं, तो आप वहाँ एक नया मंदिर पाते हैं। शहर में एक नया मंदिर देखते हैं। पुरानी कला को नए कलाकार सीख रहे हैं। यह है तूलिका की शाश्वत-शक्ति – निरंतरता, अनश्वरता, और एक ऐसी सृजनात्मकता जो समय के साथ न घटती है, न थकती है।
इसके विपरीत, तूलिका की शक्ति निर्भर नहीं होती समय पर, परिस्थिति पर, या किसी राजा की सनक पर। तूलिका की शक्ति निर्भर होती है एक अदृश्य, अभौतिक वस्तु पर – मानव-आत्मा की सृजनात्मक शक्ति पर। जब एक मंदिर टूट जाता है, तो सैकड़ों हाथ उसे फिर से बनाने के लिए आगे आते हैं। क्यों? क्योंकि उनके भीतर एक आंतरिक आग्रह है, एक अदम्य इच्छा है – सृजन करने की, निर्माण करने की, अपनी परंपरा को जीवंत रखने की। यह इच्छा न तो किसी राजा की आज्ञा पर निर्भर है, न किसी सैन्य बल पर। यह निर्भर है प्रेम पर, आस्था पर, और संस्कृति के प्रति अटूट समर्पण पर। एक गाय एक परिवार को पालती है, एक मंदिर एक नगर को पालता है। देवालय यदि सरकार-शासन के जाल से मुक्त हों, तो वे केवल पूजा के नहीं, विश्वविद्या के भी केंद्र बन सकते हैं, और तब भारत को ऑक्सफोर्ड उधार लेने की आवश्यकता न पड़ेगी।

सोमनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग
यदि हम भारत के इतिहास को समग्रता से देखें, तो एक अद्भुत पैटर्न दिखाई देता है। महमूद तोड़ता है और भारत निर्माण करता है। बाबर श्रीराम मंदिर विध्वंस करता है, तो भारतवर्ष वहीं विराट मंदिर को स्थापित कर देता है। आक्रांता अनिष्ट-अनर्थ-विनाश करता है और सनातन पुनः सृजन करता है। औरंगजेब क्रूरता की हदें पार करता है, पर भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की धरातल पर फिर से उठता है। यह चक्र केवल तलवार और तूलिका का नहीं, बल्कि विनाश और निर्माण के बीच चलने वाली शाश्वत प्रक्रिया का संकेत है। ध्यातव्य है कि जो भी विनाश करता है, वह थक जाता है। महमूद भी एक दिन मर गया। बाबर मिट गया। अलाउद्दीन भी अपने राज्य को छोड़ गया। औरंगजेब भी चला गया। उनके साम्राज्य भी विभाजित हो गए। पर भारत अभी भी निर्माण कर रहा है। अभी भी पुरानी परंपराओं को जीवंत रखकर वैज्ञानिक आविष्कार का चमत्कार किया जा रहा है। यह है तलवार और तूलिका का अंतिम, शाश्वत, अनश्वर द्वैध-दर्शन। सोमनाथ तूलिका की शक्ति का प्रतीक है। महमूद उसे तोड़ गया, पर सोमनाथ के पास एक ऐसी शक्ति थी जो तलवार से परे थी – मानव-आत्मा की श्रद्धा, समाज की एकजुटता, परंपरा की अविचल निरंतरता।
इस्लामी आक्रमणों और उनके बाद के शासनों के दौरान हिन्दू समाज ने जो हानि झेली, वह शब्दों और आँकड़ों से बहुत बड़ी है; मंदिर–विध्वंस, दास–बाज़ार, सामूहिक वध, बलात्कार और धर्मांतरण – इन सभी पर गंभीर ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। हिंसा, उत्पीड़न और जन–संहार की वास्तविकता किसी भी न्यूनतम अनुमान से कम नहीं, बल्कि उससे अधिक ही भयावह है। सोमनाथ पर गिरती तलवार, काशी के महादेव पर टूटता हथौड़ा, मथुरा–अयोध्या के ध्वस्त गुम्बद – ये केवल धार्मिक केन्द्रों पर प्रहार नहीं थे; ये इस बूमि के आत्मविश्वास पर पड़े घाव थे, ताकि भविष्य में कोई पीढ़ी यह विश्वास ही न कर सके कि वह स्वतंत्र, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर रह सकती है। विदेशी विजेताओं की नीति नीचता-भरी थी – देवालय को गिराओ, देवत्व को अपमानित करो, ताकि समाज की रीढ़ झुक जाए और वह स्वयं को पराजित मान ले। पर इस आघात के उत्तर में भारत ने क्या किया? वह टूटकर बिखर नहीं गया; उसके भीतर गाँव का एक किसान, आश्रम का एक सन्यासी, किसी पहाड़ी किले में बैठा एक राजपूत, किसी वन–आश्रय में संघर्षरत एक आदिवासी – इन सबने मिलकर एक मौन प्रतिज्ञा की कि मंदिर गिर सकते हैं, तीर्थ नहीं; मूर्तियाँ टूट सकती हैं, पर स्मृति और मन्त्र नहीं टूट सकते। यही वह अंतर्धारा थी, जिसने अखंड भारत की कल्पना को, चाहे राजनैतिक रूप में सीमाएँ सिकुड़ती रहीं, पर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से कभी लुप्त नहीं होने दिया।
महान चिंतकों की दृष्टि में हिन्दू सभ्यता
विश्व के अनेक विचारकों ने इस सनातन सभ्यता के भविष्य को, इसके भूतकाल के घावों के बावजूद, विलक्षण शक्ति–स्रोत के रूप में देखा। अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने लिखा कि भारत पर हुए विदेशी अत्याचार “मानव इतिहास के सबसे भयानक अध्यायों में से एक” हैं, पर इस सबके बाद भी यहाँ की संस्कृति नष्ट नहीं हुई, यह स्वयं में एक चमत्कार है। अनेक दार्शनिकों और लेखकों ने हिन्दू धर्म को सहिष्णुता, बहुलता और आध्यात्मिक गहराई की माता–सभ्यता कहा, जिसने विश्व को अहिंसा, करुणा और आत्मानुभूति की राह दिखाई। कुछ विचारकों ने संकेत किया कि यदि मानवता को भविष्य में किसी सभ्यता से संतुलन और सहअस्तित्व का मार्ग सीखना हो, तो वह हिन्दू–बौद्ध धारा की ओर देखेगी, क्योंकि यहाँ ईश्वर के लिए एक ही दरवाजा नहीं, असंख्य पथ हैं; यहाँ ‘मेरा सत्य’ और ‘तेरा सत्य’ के बीच युद्ध नहीं, संवाद की संभावना रहती है। इसी दृष्टि के भीतर एक मौन भविष्यवाणी छिपी है कि जो सभ्यता अपने भीतर विविधता को समेटकर चलती है, वही दीर्घकाल तक टिकती है, संकुचित और असहिष्णु ढाँचे स्वयं अपने भार से टूट जाते हैं।
लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और मंदिर–चेतना
इतने लम्बे उत्पीड़न के इतिहास के बाद भी आज यह भूमि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है; यहाँ एक सौ दस करोड़ से अधिक हिन्दू नागरिक एक ऐसे संविधान के अंतर्गत जी रहे हैं जो उन्हें पूर्ण राजनीतिक अधिकार देता है, और साथ ही अनेक धार्मिक समुदायों को भी बराबरी की सुरक्षा प्रदान करता है। वैश्विक मंचों पर भारत एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, न केवल जनसंख्या और क्षेत्रफल के कारण, बल्कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और ज्ञान–उद्योग के कारण भी। इस आधुनिक भारत में मंदिर केवल पूजा–स्थल नहीं हैं, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के नाभि-स्थल बने गए हैं; तीर्थ–पर्यटन, सांस्कृतिक–अर्थव्यवस्था, स्थानीय उद्यम और सेवा–गतिविधियों ने मंदिर–इकोनॉमी को समाज के लिए एक सकारात्मक शक्ति बना दिया है, जो गाँव–कस्बों तक रोजगार और आत्मगौरव दोनों पहुँचा रही है। प्रधानमंत्री स्तर पर भी मंदिर–यात्राएँ, पूजा-अर्चना और तीर्थ–पुनरुत्थान को राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण से जोड़ा जा रहा है। आज सोमनाथ, काशी, महाकाल, अयोध्या की झंकार केवल घंटियों की ध्वनि नहीं, आत्मविश्वास की पुनरावृत्ति है।
आक्रांताओं की कट्टरता और सनातन का उत्तर
यह भी सत्य है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इस्लामी कट्टरपंथ ने केवल हिन्दुओं को ही नहीं, अनेक समुदायों को हिंसा, आतंक और असहिष्णुता के मार्ग पर घसीटा; भारत में भी यह विषबीज बार–बार सिर उठाता रहा – कभी आक्रमणों के रूप में, कभी अलगाववाद के रूप में, कभी वैश्विक जिहादी नेटवर्क के रूप में। परन्तु इसके बीच सनातन धर्म का उत्तर क्या रहा? यह धर्म अपने मूल में नियत शत्रु–घोषणा पर नहीं, धर्मसंस्था और आत्मरक्षा पर खड़ा है; वह संघर्ष से विमुख नहीं, पर संघर्ष को भी धर्म की कसौटी पर कसता है। सनातन की मूल शिक्षा रही – अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं, और क्षात्र-धर्म का अर्थ क्रूरता नहीं; अन्याय का प्रतिकार अनिवार्य है, पर सम्पूर्ण मानव–समुदाय के विनाश की कल्पना धर्म नहीं, अधर्म है। यही कारण है कि यहाँ इस्लाम या किसी अन्य मत के साधारण अनुयायी के प्रति घृणा की नहीं, पर कट्टरता और आतंक के प्रति कठोरता की माँग उठती रही है। यह अंतर ही हिन्दू राजनीति और जिहादी राजनीति के बीच मूलभूत भेद रेखांकित करता है।
भविष्यवाणी: कौन टिकेगा, कौन इतिहास बनेगा
इतिहास का अनुभव और चिंतकों की दृष्टि मिलकर एक ही बात कहती हैं – जो सभ्यता स्वयं को तलवार से परिभाषित करती है, वह तलवार के युग तक ही टिकती है; जैसे–जैसे ज्ञान, प्रौद्योगिकी, संवाद और वैश्विक संपर्क बढ़ते हैं, केवल भय और हिंसा पर टिकी व्यवस्थाएँ भीतर से खोखली होने लगती हैं। दूसरी ओर, जो सभ्यता अपने को करुणा, ज्ञान, साधना और आत्मानुभव से परिभाषित करती है, उसकी आयु राजनीतिक साम्राज्यों से कहीं अधिक दीर्घ होती है; वह साम्राज्यों के उठने–गिरने के बाद भी बची रहती है। इस अर्थ में सोमनाथ केवल मध्यकालीन गुजरात का मंदिर नहीं, भविष्य की एक वाणी भी है – गिरी हुई दीवारों के बीच से उठता हुआ स्वर कहता है कि कट्टरता की उम्र छोटी होती है, सनातन संस्कृति की साँस लम्बी। इस्लामी कट्टरवाद, यदि स्वयं को न बदला तो वह दुनिया भर में आपसी युद्ध, विस्थापन और आन्तरिक विखंडन का कारण बनता रहेगा; उसकी कथाएँ अधिक से अधिक चेतावनी–प्रसंग के रूप में इतिहास में दर्ज होंगी। इसके विपरीत, भारत अपने सनातन–केन्द्रित, पर बहुलतावादी स्वभाव के साथ लोकतंत्र, विचार–स्वतंत्रता, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर अग्रसर है और रहेगा। यहाँ सनातन धर्म की उदारता कमजोरी नहीं, बल्कि उस वृक्ष की तरह है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि आँधी उसे हिला तो सकती है, गिरा नहीं सकती।
अन्ततः भविष्यवाणी यही है – जो सभ्यता केवल दूसरों को मिटाने के लिए जीती है, वह स्वयं अपने भीतर से टूट जाती है; और जो सभ्यता स्वयं को नये–नये रूपों में रचती, उठाती, सजाती रहती है, वही भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीतेगा, प्रश्न यह है कि जब धूल बैठ जाएगी, तब मानवता किसके पास लौटकर दिशा पूछेगी – हिंसा के स्मारकों के पास या सोमनाथ जैसे पुनरुत्थान–तीर्थों के पास? जो सभ्यता सृजन के लिए, पुनर्निर्माण के लिए, अपनी परंपरा को जीवंत रखने के लिए जीती है, वह कभी नहीं मरती। उसकी हार को भी विजय का-सा गौरव मिलता है, क्योंकि वह अपनी हार को एक नए निर्माण का आधार बना देती है। यही सोमनाथ की अंतिम और अनश्वर भविष्यवाणी है।









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