गुंजी -तकनीक से सुरक्षा, संकल्प से संप्रभुता
गुंजी – यह नाम ही एक सुर है। पिथौरागढ़ का यह छोटा-सा ग्राम है जहाँ आकाश पृथ्वी को चूमता है और यहाँ भारत की सीमा केवल राजनीति नहीं, आत्मा बन गई है। भारत-नेपाल-तिब्बत की त्रिवेदी पर अवस्थित यह ग्राम मानचित्र से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। दस हज़ार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर जहाँ कुठी यांकती और कालापानी की धारा एक-दूसरे का आलिंगन करती है, वहाँ बसा हुआ ग्राम गुंजी भारत के संकल्प का साक्षी है। यहाँ खड़े होकर अनुभूति होती है कि यह ग्राम केवल पत्थर और मिट्टी का समवाय नहीं है, यह तो राष्ट्र-प्राण का तीर्थ है। यहाँ धर्म और कर्तव्य एक ही दीये में दैदीप्यमान हैं।

फोटो: AI Generated गुंजी विलेज
कैलाश-मानसरोवर की यात्रा का पवित्र मार्ग गुंजी से गुज़रता है। आदि कैलाश भी यहीं से दिखाई देता है। गुंजी गाँव इनका सारथी है, इसका रक्षक है। तीस सौ पैंतीस लोग और एक सौ चौरानवे घर से स्पंदित है यह गाँव। ये संख्याएँ छोटी हैं, पर इसके संकेत बड़े हैं, ये सीमा-शक्ति के चिन्ह हैं। शीत की कठोरता में जब गाँववासी धारचुला की गोद में जाते हैं, तब भी यहाँ भारत की धड़कन नहीं रुकती। इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के जवान, स्थानीय युवकों का साथ – यह सब एक सुरक्षा-तंत्र है। इनका हर कदम राष्ट्र-हित में अर्थवान होता है। यही गुंजी की साधना है, यही इसका व्रत है।
असीम चुनौतियों में भी यहाँ सामर्थ्य अपना साहस खोता नहीं है। भू-आकृति कठोर है, हवाएँ तीव्र हैं, संसाधन सीमित हैं, पर सीमा की रक्षा यहाँ भूगोल की समस्या नहीं, मनोबल का समाधान है। यह तिब्बत का व्यापार-द्वार है, कालापानी की पवित्र धारा का साक्षी है, यहाँ के मंदिरों की लकड़ी की कारीगरी में शिल्प और श्रद्धा एक साथ श्वास लेते हैं। ये सब गुंजी की विरासत हैं। यह ग्राम प्राचीन काल के उस वाणिज्य-मार्ग का साक्षी भी है, जहाँ व्यापारी और साधु एक ही पग में चलते थे। तब ज्ञान और जीविका यहाँ अभिन्न थे। भारत के इस सीमांत गाँव को देखिए – यह दीया है, पर यह दीया तूफ़ानों से नहीं, अपने धैर्य से जलता है। इसकी लौ में राष्ट्रदीक्षा दीखती है। हिमालय के शिखर इसके चारों ओर गुनगुनाते हैं, गाते हैं।








