वन्दे मातरम्—स्वदेश-प्रेम का वज्र-नाद
भारतीय राष्ट्र-चेतना का इतिहास अप्रतिम है। जब हम उस महान राष्ट्र-चेतना को खोजते हैं तो हमारा ध्यान अवश्यमेव बंकिम चंद्र चटर्जी की ओर उन्मुख होता है और भारत के राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ के प्रति हम श्रद्धावनत हो जाते हैं। ये दो शब्द संस्कृत की गहन-गरिमा से निर्मित हैं, और भारतीय जनमानस के लिए केवल एक नारा नहीं, अपितु आत्मा की एक पवित्र-क्रंदन हैं। किंतु यह प्रश्न विचार के योग्य है कि बंकिम चंद्र को इस अतुलनीय रचना के लिए कौन-सी आंतरिक प्रेरणा मिली?
बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) के जीवनकाल में भारत ब्रिटिश-साम्राज्य के अधीन कराह रहा था। बंकिम एक युगचेता बुद्धिजीवी थे जो भारतीय-संस्कृति के प्रति अपार-स्नेह रखते थे। उनका मनोविज्ञान तीन प्रमुख-आयामों से निर्मित था – राष्ट्रीय-गौरव की स्मृति, सांस्कृतिक-पुनरुत्थान की आकांक्षा, और जनमानस को जागृत करने की अपरिहार्य-प्रवृत्ति।

उपन्यास ‘आनन्दमठ’ (1882) में ‘वन्दे मातरम्’ का प्रथम प्रकाशन हुआ। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि 1770 के बंगाल का भीषण-दुर्भिक्ष था। इस अकाल में लाखों नर-नारियों का असमय मरण हुआ था। बंकिम चंद्र ने इसी ऐतिहासिक त्रासदी को अपनी कथा का केंद्र-बिंदु बनाया। किंतु उनका उद्देश्य केवल इतिहास-लेखन नहीं था। वह न केवल समसामयिक संदेश था, बल्कि भारत-माता के कष्टों के प्रति जागरूकता और उसके उद्धार के लिए आत्म-समर्पण भी।

AI फोटो: 1773 का बंगाल
इतिहासकार राजेश्वरी शर्मा और डॉ. सुमित सरकार ने पुस्तक ‘बंकिम चंद्र एंड द पैट्रियटिक्स’ में विश्लेषण किया है कि बंकिम चंद्र का मनोविज्ञान नव-हिंदुत्व के एक सुसंगठित-विचारक का था। वे हिंदू-संस्कृति को पुनः जीवंत करना चाहते थे, किंतु उसे आधुनिक चेतना से परिवेष्ठित करते हुए। ‘वन्दे मातरम्’ इसी द्वैध चेतना का परिणाम है। यह संस्कृत का प्राचीन मंत्र है, किंतु साथ ही आधुनिक राष्ट्रवाद का भी एक जीवंत-प्रतीक भी। बंकिम चंद्र के पत्र बंगला साहित्य-संग्रह में संरक्षित हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने ‘माता’ शब्द का चयन अत्यंत सचेतनता के साथ किया। भारत-भूमि को ‘माता’ की संज्ञा देकर वे इसे एक जैविक सत्ता में रूपांतरित करते हैं – ऐसी सत्ता के रूप में जिसके साथ भावनात्मक-बंधन संभव है। यह मनोवैज्ञानिक कौशल था जो लाखों आमजनों तक राष्ट्र-भक्ति का संदेश पहुँचा सकता था। संस्कृत में “माता” का अर्थ केवल जीविका नहीं, बल्कि सर्वोच्च-सत्ता है। बंकिम चंद्र ने इसी अर्थ को भारत-भूमि के लिए प्रयुक्त किया।

भारत में स्वतंत्रता का उत्सव
डॉ. सुमित सरकार की विद्वत्तापूर्ण कृति है ‘बंकिम चंद्र चटर्जी: अ स्टडी इन लिटररी रेजिस्टेंस।’ इसमें बंकिम चंद्र के साहित्य को ‘साहित्यिक प्रतिरोध’ के रूप में विश्लेषित करती है। सरकार प्रदर्शित करते हैं कि कैसे बंकिम चंद्र के उपन्यास ब्रिटिश-औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक सूक्ष्म, किंतु शक्तिशाली विद्रोह का माध्यम बन गए। पुस्तक ‘आनन्दमठ’ में राष्ट्रीय-चेतना, सांस्कृतिक-पुनर्जागरण और सामाजिक-परिवर्तन के विषय प्रमुख हैं। सरकार ने बंकिम चंद्र को एक ‘सांस्कृतिक-विद्रोही’ के रूप में प्रस्तुत किया है, जिन्होंने लेखनी को राष्ट्र-निर्माण का एक शक्तिशाली-साधन बनाया।
यह कृति साहित्य और राजनीति के अंतर्संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. रमेश कुंतल मेघ की यह अनुपम कृति ‘वन्दे मातरम् की आध्यात्मिक-भूमिका’ ‘वन्दे मातरम्’ को एक आध्यात्मिक-मंत्र के रूप में विश्लेषित करती है। मेघ प्रदर्शित करते हैं कि बंकिम चंद्र के इस दो-शब्दीय मंत्र में हिंदू-दर्शन, शक्ति-पूजन और भारतीय-संस्कृति की गहन-परतें निहित हैं। यह पुस्तक ‘वन्दे मातरम्’ के संस्कृत-व्याकरण, आध्यात्मिक-अर्थ और राष्ट्रीय-चेतना के मध्य के संबंध को उजागर करती है। मेघ सिद्ध करते हैं कि यह नारा केवल राजनीतिक-प्रतीक नहीं, बल्कि एक पवित्र-आह्वान है, जो भारतीय आत्मा को जागृत करता है।
प्रसिद्ध-विद्वान शिशिर कुमार दास ने अपनी पुस्तक ‘बंकिम चंद्र: ए क्रिटिकल बायोग्राफी’ में सिद्ध किया है कि ‘वन्दे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र के गहन-आत्मचिंतन का फल था। उन्होंने भारतीय इतिहास, धर्मशास्त्र और सामाजिक-विज्ञान का गहन अध्ययन किया था, और तब इस सर्वस्पर्शी नारे को जन्म दिया। ‘वन्दे मातरम्’ केवल शब्दों का एक समूह नहीं है। यह बंकिम चंद्र चटर्जी के राष्ट्र-प्रेम, सांस्कृतिक-गर्व और जनचेतना-निर्माण की अव्यय-आकांक्षा का एक मूर्त-रूप है। यह भारतीय-आत्मा का एक शाश्वत-आह्वान है।








