पूर्वी द्वार की शान: चम्फाई – संस्कृति, सीमा और अन्न का संगम
आज मैं आपको ले चलता हूँ उस स्थान पर जहाँ से हमारा भारत शुरू होता है। मिज़ोरम के चम्फाई में, जहाँ सबसे पहले सूरज की किरणें भारत की धरती को छूती हैं। यह नगर हमारी सीमा का प्रहरी है, हमारी संस्कृति का संरक्षक है।
1,678 मीटर की ऊँचाई पर बसा यह नगर कभी ह्मार राजवंश की शान हुआ करता था। आज भी यहाँ का हर पत्थर, हर शिलालेख हमारी प्राचीन विरासत की कहानी सुनाता है। सिकपुई लुंग शिलालेख जो सदियों से वहाँ खड़ा है, वो हमारी जड़ों से जुड़ाव का प्रमाण है।
और देखिए यहाँ की हरी-भरी घाटियों को! धान के लहलहाते खेत! इसीलिए तो चम्फाई को ‘मिज़ोरम का राइस बाउल’ कहा जाता है। यह धरती सिर्फ अन्न नहीं उपजाती, यह हमारी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। यहाँ के किसान अपने परिश्रम से पूरे राज्य का पेट भरते हैं। चम्फाई की कृषि अर्थव्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्यों में जहाँ खेती योग्य भूमि सीमित है, वहाँ चम्फाई की उपजाऊ घाटियाँ खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
सीमा पार व्यापार की दृष्टि से भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है। भारत-म्यांमार के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में चम्फाई जैसे सीमावर्ती शहर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ स्थित व्यापार मार्ग दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ाव को सुगम बनाते हैं।
यह पूर्वोत्तर की आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। चम्फाई भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रथम सोपान है। हमारी सीमाओं की रक्षा भी यहीं से शुरू होती है। यह हमारे गौरव का प्रतीक है।








