परमवीर
मेजर सोमनाथ शर्मा
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को हुआ। 22 फरवरी 1942 को उन्हें कुमाऊँ रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ और उन्होंने राष्ट्रसेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
3 नवंबर 1947 को बडगाम के रणक्षेत्र में उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद शत्रु के भीषण आक्रमण का अदम्य साहस से सामना किया और अंतिम क्षण तक मोर्चा नहीं छोड़ा।
राष्ट्र की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके अद्वितीय पराक्रम के लिए उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम परमवीर चक्र प्रदान किया गया।
लांस नायक करम सिंह
लांस नायक करम सिंह का जन्म 15 सितंबर 1915 को पंजाब में हुआ। 1941 में 1 सिख रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया और द्वितीय विश्वयुद्ध में असाधारण वीरता के लिए मिलिटरी मेडल से सम्मानित हुए।
1948 में जम्मू-कश्मीर के तितवाल सेक्टर में उन्होंने भीषण शत्रु आक्रमणों के बीच अदम्य साहस और नेतृत्व का परिचय देते हुए अपनी चौकी की रक्षा की। उनके पराक्रम ने शत्रु के अनेक हमलों को विफल कर युद्ध की दिशा बदल दी।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अतुलनीय शौर्य और अटूट कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के अमर प्रतीक हैं।
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सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे
सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे का जन्म 26 जून 1918 को कर्नाटक में हुआ। 1947 में कोर ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया और अपने अद्वितीय साहस तथा तकनीकी कौशल से भारतीय सेना की शक्ति को नई दिशा दी।
1948 के जम्मू-कश्मीर अभियान में नौशेरा से राजौरी मार्ग पर शत्रु द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों, ध्वस्त पुलों और लगातार हो रही गोलाबारी के बीच उन्होंने स्वयं अग्रिम मोर्चे पर रहकर रास्ता साफ किया। उनके साहस ने भारतीय सेना के विजय अभियान का मार्ग प्रशस्त किया।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्भुत पराक्रम, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य संकल्प, नेतृत्व और विजय-पथ के अमर शिल्पकार हैं।
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नायक जदुनाथ सिंह
नायक जदुनाथ सिंह का जन्म 21 नवंबर 1916 को शाहजहाँपुर में हुआ। 1941 में 1 राजपूत रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया और अपने अदम्य साहस, अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा से सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
1948 में नौशेरा सेक्टर की रक्षा करते हुए उन्होंने भीषण शत्रु आक्रमण, सीमित संसाधनों और लगातार गोलाबारी के बीच अपनी चौकी को अंत तक सुरक्षित रखा। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी वे अंतिम क्षण तक लड़ते रहे और अपने सर्वोच्च बलिदान से नौशेरा की रक्षा सुनिश्चित की।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अनुपम साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अटूट साहस, कर्तव्य और बलिदान के अमर प्रतीक हैं।
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह का जन्म 20 मई 1918 को राजस्थान में हुआ। 1936 में 6 राजपूताना राइफल्स में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया और अपने अदम्य साहस तथा नेतृत्व से भारतीय सेना में विशिष्ट पहचान बनाई।
1948 में तिथवाल सेक्टर के भीषण युद्ध के दौरान उन्होंने शत्रु के सुदृढ़ मोर्चों पर अकेले ही धावा बोल दिया। लगातार गोलाबारी और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अंतिम क्षण तक लड़ते रहे और अपने सर्वोच्च बलिदान से भारतीय सेना के अदम्य साहस का इतिहास रच दिया।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अटूट साहस, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया
कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया का जन्म 29 नवंबर 1935 को पंजाब में हुआ। भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त करने के बाद उन्होंने राष्ट्रसेवा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने साहस, नेतृत्व तथा कर्तव्यनिष्ठा से विशिष्ट पहचान बनाई।
1961 में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अंतर्गत कांगो में उन्होंने भारतीय टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए शत्रु के सशस्त्र विद्रोहियों का अदम्य साहस से सामना किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अंतिम क्षण तक लड़ते रहे और अपने सर्वोच्च बलिदान से मिशन को सफल बनाया।
राष्ट्र और विश्व शांति के लिए उनके अनुपम पराक्रम तथा सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के साहस, कर्तव्य और निःस्वार्थ सेवा के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
मेजर धन सिंह थापा
मेजर धन सिंह थापा का जन्म 10 अप्रैल 1928 को शिमला में हुआ। 1949 में 8 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने अदम्य साहस, अनुशासन तथा नेतृत्व से भारतीय सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
21 अक्टूबर 1962 को लद्दाख के सामरिक महत्व वाले सिरिजाप चौकी पर चीनी सेना के भीषण आक्रमण के बीच उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए अंतिम क्षण तक मोर्चा संभाले रखा। सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शत्रु को भारी क्षति पहुँचाई और असाधारण वीरता का परिचय दिया।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय नेतृत्व, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अटल संकल्प, शौर्य और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक हैं।
सूबेदार जोगिंदर सिंह
सूबेदार जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब के फ़रीदकोट में हुआ। 1936 में प्रथम सिख रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने अनुशासन, नेतृत्व तथा अदम्य साहस से भारतीय सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
23 अक्टूबर 1962 को बुम ला धुरी पर चीनी सेना के भीषण आक्रमण के दौरान उन्होंने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अपनी प्लाटून का नेतृत्व जारी रखा। गोला-बारूद समाप्त होने पर भी उन्होंने अपने साथियों के साथ संगीनों से शत्रु पर धावा बोल दिया और अंतिम क्षण तक वीरतापूर्वक मातृभूमि की रक्षा करते रहे।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय नेतृत्व, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अटल संकल्प, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान के अमर प्रतीक हैं।
मेजर शैतान सिंह
मेजर शैतान सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1924 को राजस्थान के जोधपुर में हुआ। 1949 में कुमाऊँ रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने अनुकरणीय नेतृत्व, अनुशासन तथा साहस से भारतीय सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
18 नवंबर 1962 को चुशूल सेक्टर के रेज़ांग ला में चीनी सेना के भीषण आक्रमण के दौरान उन्होंने 13 कुमाऊँ के सैनिकों का नेतृत्व करते हुए एक चौकी से दूसरी चौकी तक पहुँचकर उनका मनोबल बनाए रखा। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अंतिम क्षण तक डटे रहे और अपने साथियों को मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित करते रहे।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय नेतृत्व, अटूट कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य साहस, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
कंपनी हवलदार अब्दुल हमीद
कंपनी हवलदार अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश में हुआ। 1954 में 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने अनुशासन, साहस तथा कर्तव्यनिष्ठा से भारतीय सेना में विशिष्ट पहचान बनाई।
1965 के भारत-पाक युद्ध में खेमकरण सेक्टर के भीषण संघर्ष के दौरान उन्होंने रिकॉयललेस गन से शत्रु के पैटन टैंकों पर सटीक प्रहार कर अनेक टैंकों को नष्ट कर दिया। लगातार गोलाबारी और प्राणघातक खतरे के बीच भी वे अंतिम क्षण तक डटे रहे और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय साहस, अटूट कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य पराक्रम, त्याग और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्ज़ोरजी तारापोर
लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्ज़ोरजी तारापोर का जन्म 18 अगस्त 1923 को मुंबई में हुआ। 1951 में पूना हॉर्स (बख़्तरबंद रेजिमेंट) में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने उत्कृष्ट नेतृत्व तथा अदम्य साहस से भारतीय सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
1965 के भारत-पाक युद्ध में सियालकोट सेक्टर के फिल्लौरा अभियान के दौरान उन्होंने अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व करते हुए शत्रु के अनेक टैंकों को ध्वस्त किया तथा फिल्लौरा, वज़ीराली और आसपास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अंतिम क्षण तक अग्रिम मोर्चे पर डटे रहे।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय नेतृत्व, अनुपम पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के साहस, नेतृत्व और अटूट राष्ट्रसमर्पण के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
लांस नायक अल्बर्ट एक्का
लांस नायक अल्बर्ट एक्का का जन्म 27 दिसंबर 1942 को रांची में हुआ। 1962 में 14 गार्ड्स रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने साहस, अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा से भारतीय सेना में विशिष्ट पहचान बनाई।
1971 के भारत-पाक युद्ध में गंगासागर क्षेत्र के भीषण संघर्ष के दौरान उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर शत्रु के सुदृढ़ बंकरों पर साहसिक धावा बोला, अनेक दुश्मन सैनिकों को मार गिराया तथा गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अंतिम क्षण तक लड़ते हुए अभियान की सफलता सुनिश्चित की।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय साहस, अनुपम पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य शौर्य, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई 1943 को पंजाब के लुधियाना में हुआ। 1967 में भारतीय वायुसेना में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने साहस, अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा से विशिष्ट पहचान बनाई।
14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी सेबर विमानों के आक्रमण के दौरान उन्होंने अकेले ही शत्रु के विमानों का निर्भीकता से सामना किया। भीषण वायु-संग्राम में उन्होंने शत्रु को गंभीर क्षति पहुँचाई और अंतिम क्षण तक मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय साहस, उत्कृष्ट वायु-युद्ध कौशल और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय वायुसेना के शौर्य, समर्पण और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल
सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे में हुआ। 1971 में 17 पूना हॉर्स में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने साहस, नेतृत्व तथा कर्तव्यनिष्ठा से भारतीय सेना के युवा योद्धाओं के लिए आदर्श स्थापित किया।
1971 के भारत-पाक युद्ध में शकरगढ़ सेक्टर के बासंतर युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी टैंक टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए शत्रु के अनेक टैंकों को ध्वस्त किया। अपना टैंक आग की लपटों में घिर जाने के बाद भी उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और अंतिम क्षण तक लड़ते हुए शत्रु की प्रगति को रोक दिया।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय पराक्रम, निर्भीक नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अदम्य साहस, युवा नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
मेजर होशियार सिंह
मेजर होशियार सिंह का जन्म 5 मई 1936 को हरियाणा में हुआ। 1963 में ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त कर उन्होंने राष्ट्ररक्षा को अपना जीवन समर्पित किया और अपने अनुशासन, नेतृत्व तथा अदम्य साहस से भारतीय सेना में विशिष्ट स्थान बनाया।
1971 के भारत-पाक युद्ध में भीषण शत्रु गोलाबारी के बीच गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। वे एक खाई से दूसरी खाई तक पहुँचकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे और स्वयं मशीनगन संभालकर शत्रु के आक्रमण को विफल कर निर्णायक विजय सुनिश्चित की।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय नेतृत्व, अटूट साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सेना के अडिग संकल्प, शौर्य और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
नायब सूबेदार बाना सिंह
नायब सूबेदार बाना सिंह का जन्म 6 जनवरी 1949 को जम्मू के कडयाल गाँव में हुआ। 1969 में उन्होंने जम्मू एवं कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (JAK LI) में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा का संकल्प लिया और अपने अदम्य साहस, अनुशासन तथा नेतृत्व से भारतीय सेना के गौरवशाली योद्धाओं में स्थान बनाया।
जून 1987 में सियाचिन के दुर्गम हिमाच्छादित क्षेत्र में उन्होंने स्वेच्छा से विशेष अभियान में भाग लिया। अत्यंत कठिन मार्ग से अपने दल का नेतृत्व करते हुए वे शत्रु की चौकी तक पहुँचे और ग्रेनेड तथा संगीन के साहसिक प्रहारों से एक-एक मोर्चा ध्वस्त कर पूरी चौकी को घुसपैठियों से मुक्त करा दिया।
राष्ट्र की रक्षा में उनके अद्वितीय पराक्रम, निर्भीक नेतृत्व और असाधारण साहस के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे भारतीय सैनिक के अटूट संकल्प, शौर्य और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक हैं।
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन का जन्म 13 सितंबर 1946 को मुंबई में हुआ। 16 जनवरी 1972 को उन्हें महार रेजिमेंट में शॉर्ट सर्विस कमीशन प्राप्त हुआ और उन्होंने अनुशासन, साहस तथा कर्तव्यनिष्ठा के साथ भारतीय सेना में अपनी सेवाएँ प्रारंभ कीं।
25 नवंबर 1987 को श्रीलंका में शांति अभियान के दौरान उनके दस्ते पर उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला किया। गंभीर परिस्थितियों में उन्होंने अद्भुत सूझबूझ से शत्रु को पीछे से घेर लिया और निर्भीक होकर मुकाबला किया। सीने में गोली लगने के बाद भी उन्होंने एक उग्रवादी की राइफल छीनकर उसे मार गिराया तथा अंतिम क्षण तक अपने सैनिकों का नेतृत्व और उत्साहवर्धन करते रहे।
राष्ट्र-सेवा में दिए गए उनके सर्वोच्च बलिदान, असाधारण नेतृत्व और अद्वितीय वीरता के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। मेजर रामास्वामी परमेश्वरन आज भी कर्तव्य, साहस और सर्वोच्च समर्पण के अमर प्रेरणास्रोत हैं।
कैप्टन विक्रम बत्रा
कैप्टन विक्रम बत्रा ने 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स की डेल्टा कंपनी का नेतृत्व करते हुए 1999 के कारगिल युद्ध में अद्वितीय साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। उन्हें ड्रास सेक्टर की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण चोटी प्वाइंट 5140 को शत्रु के कब्ज़े से मुक्त कराने का दायित्व सौंपा गया।
भीषण आमने-सामने की लड़ाई में उन्होंने स्वयं अग्रिम मोर्चे पर रहकर अनेक शत्रु सैनिकों को मार गिराया और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अभियान जारी रखा। उनके प्रेरणादायी नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने प्वाइंट 5140 पर विजय प्राप्त की तथा आगे चलकर प्वाइंट 4750 और प्वाइंट 4875 पर भी तिरंगा फहराया। एक घायल अधिकारी को बचाने के प्रयास में वे वीरगति को प्राप्त हुए।
उनके अनुपम शौर्य, अदम्य नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। कैप्टन विक्रम बत्रा आज भी "ये दिल माँगे मोर" के अदम्य जज़्बे के साथ भारतीय वीरता के अमर प्रतीक बने हुए हैं।
ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव ने 1999 के कारगिल युद्ध में 18 ग्रेनेडियर्स की कमांडो ‘घातक’ प्लाटून के सदस्य के रूप में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। 3–4 जुलाई 1999 की रात्रि उन्हें टाइगर हिल पर स्थित अत्यंत सामरिक महत्व के शत्रु बंकरों पर अधिकार करने का दायित्व सौंपा गया।
भीषण गोलीबारी के बीच कमर और कंधे में तीन गोलियाँ लगने के बावजूद उन्होंने लगभग साठ फीट की खड़ी चढ़ाई पूरी की और शत्रु के बंकर तक पहुँच गए। गंभीर रूप से घायल होने पर भी उन्होंने ग्रेनेड फेंककर चार पाकिस्तानी सैनिकों को निष्क्रिय किया तथा शत्रु की भीषण गोलीबारी को शांत कर अपने साथियों के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
उनके अदम्य साहस, अटूट संकल्प और अनुपम वीरता के सम्मान में उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता अलंकरण परमवीर चक्र प्रदान किया गया। ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव जीवित परमवीर चक्र विजेताओं में से एक हैं और आज भी राष्ट्र के लिए साहस, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा के प्रेरणास्रोत हैं।
राइफलमैन संजय कुमार
राइफलमैन संजय कुमार ने 1999 के कारगिल युद्ध में 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स के अग्रिम स्काउट के रूप में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। 4 जुलाई 1999 को उन्हें मुश्कोह घाटी स्थित सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्वाइंट 4875 के ‘एरिया फ्लैट टॉप’ पर शत्रु के सुदृढ़ बंकरों को मुक्त कराने का दायित्व सौंपा गया।
भीषण गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अकेले ही चट्टानों के सहारे आगे बढ़े और पहले शत्रु बंकर पर धावा बोलकर उसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद उन्होंने शत्रु की ही मशीनगन उठाकर दूसरे बंकर पर आक्रमण किया और तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराते हुए निर्णायक विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
उनके अदम्य साहस, अनुपम पराक्रम और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में उन्हें भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। राइफलमैन संजय कुमार जीवित परमवीर चक्र विजेताओं में से एक हैं और उनका अद्वितीय शौर्य भारतीय सैनिक की अटूट वीरता का अमर प्रतीक है।
लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे
लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे ने 1/11 गोरखा राइफल्स का नेतृत्व करते हुए 1999 के कारगिल युद्ध में अद्वितीय साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। बाटालिक सेक्टर में उन्होंने शत्रु को परास्त कर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जौबर टॉप को पुनः भारतीय नियंत्रण में लाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
2–3 जुलाई 1999 की रात्रि खलुबर पर हुए भीषण अभियान में उन्होंने अपनी प्लाटून का नेतृत्व करते हुए दुर्गम पहाड़ी मार्ग से शत्रु पर सीधा आक्रमण किया। कंधे और पैर में गंभीर चोट लगने के बावजूद वे लगातार आगे बढ़ते रहे, अनेक शत्रु बंकरों को ध्वस्त किया और अंतिम मोर्चे को भी नष्ट कर विजय सुनिश्चित की। इसी अभियान में उन्होंने राष्ट्र की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनके अनुपम शौर्य, निर्भीक नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे भारतीय सेना के उस अमर आदर्श हैं, जिनका जीवन साहस, कर्तव्य और बलिदान की अमिट प्रेरणा बनकर सदैव राष्ट्र का मार्ग आलोकित करता रहेगा।

