सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP) की समीक्षा
आर. पी. कलिता, लेफ्टिनेंट जनरल (से. नि.)
भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है तथा हिंद महासागर पर इसकी प्रभुत्वकारी स्थिति है, जिसके माध्यम से वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 80% (वॉल्यूम के आधार पर) एवं वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 40% गुजरता है। भारत की 11,098.81 किलोमीटर लम्बी समुद्री सीमाएँ हैं। इसके अतिरिक्त यह सात देशों – पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ 15106.7 किलोमीटर लंबी स्थलीय सीमा साझा करता है। लंबे उपनिवेशवाद के दौर ने अनेक जटिल विरासत समस्याएं छोड़ी हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है अधिकांश पड़ोसी देशों के साथ अनसुलझी सीमाएं। कुछ सीमावर्ती क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन पूर्णतः एकीकृत नहीं हो सके और वहाँ विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के पश्चात पृथकता की मांग की, जिससे कई पृथकतावादी विद्रोही आंदोलन प्रारंभ हुए।
जटिल पर्वतीय भू-आकृति, सघन वनों, अत्यंत उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों तथा प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को बाधित किया, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के समय इन क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास अत्यंत न्यूनतम था। पाकिस्तान और चीन के साथ अनसुलझी सीमाओं ने पाँच युद्धों और कई संघर्षों को जन्म दिया, जिससे एक ओर इन क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न हुई, वहीं दूसरी ओर सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत संरचना निर्माण तथा दीर्घकालिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता भी उजागर हुई।
सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास एवं सीमा प्रबंधन
सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, विशेषतः उस प्रकार के खतरों की प्रकृति को देखते हुए जो इन क्षेत्रों से उत्पन्न हो सकते हैं। सीमा प्रबंधन की प्रमुख चुनौतियों में दुर्गम भू-आकृति, अति-दलदली सीमाएँ, उत्तर में हिमालय, पूर्व में घने वन एवं नदियाँ तथा पश्चिम में विस्तृत मरुस्थल शामिल हैं। चीन के साथ अनसुलझी सीमाएं और प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रीय दावे तथा पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद एवं जम्मू-कश्मीर पर दावा सीमा प्रबंधन को अत्यंत गतिशील बना देता है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद एवं पूर्वोत्तर में विद्रोह आंतरिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त अवैध प्रवास, सीमा पार तस्करी, मानव तस्करी तथा तटीय सीमाओं की अपर्याप्त निगरानी के कारण होने वाली समस्याएं जैसे तस्करी, समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना एवं घुसपैठ, प्रभावी सीमा प्रबंधन के समक्ष गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP) की रूपरेखा

सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम की स्थापना वर्ष 1986-87 में भारत सरकार के गृह मंत्रालय के तत्वावधान में की गई थी, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में समग्र विकास के माध्यम से सीमा प्रबंधन को सुदृढ़ करना था। यह एक “कोर सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीम (CSS)” है, जो वर्तमान में 16 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के अंतर्गत आने वाले 117 सीमावर्ती जिलों के 460 सीमावर्ती खंडों में लागू है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमा के समीप निवास करने वाले नागरिकों की विशिष्ट विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करना एवं आवश्यक आधारभूत ढांचे को प्रदान करना है।
यह कार्यक्रम छह प्रमुख विषयगत क्षेत्रों – आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि एवं जल संसाधन, वित्तीय समावेशन एवं कौशल विकास में विभिन्न योजनाओं के समेकन (Central/State/UT/Local Schemes) तथा सहभागी दृष्टिकोण के माध्यम से लागू किया जाता है। 2020 में जारी सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम के दिशा-निर्देशों एवं अक्टूबर 2021 के संशोधन में योजना के क्रियान्वयन, वित्तपोषण तथा प्राथमिकता निर्धारण की विस्तृत प्रक्रिया को रेखांकित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से प्रथम बस्ती तक की हवाई दूरी के आधार पर 0-10 किमी के भीतर आने वाले जनगणना गांवों, अर्ध-नगरीय और नगरीय क्षेत्रों में परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है। यदि ये क्षेत्र संतृप्त हो जाते हैं तो योजना को आंतरिक क्षेत्रों तक विस्तारित किया जा सकता है।
वित्तपोषण का वितरण निम्न प्रकार है:
- उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) एवं जम्मू-कश्मीर में 90:10 (केंद्र: राज्य) अनुपात।
- बिहार, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 60:40 अनुपात।
- लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश हेतु 100% केंद्रीय निधि।
इसके अतिरिक्त:
- कुल आवंटन का 10% प्रशासनिक व्यय और रिज़र्व फंड हेतु।
- भारत-चीन सीमा से लगे राज्यों हेतु 10% अतिरिक्त।
- शेष 80% में से 40% पूर्वोत्तर राज्यों को एवं 60% अन्य सीमावर्ती राज्यों को दिया जाता है।
वित्तीय आवंटन तीन मानदंडों पर आधारित होता है:
- अंतरराष्ट्रीय सीमा की लंबाई (33%)
- 0-10 किमी के क्षेत्र में आने वाला क्षेत्रफल (33%)
- इसी क्षेत्र में आने वाली जनसंख्या (33%)
(फंड वितरण तालिका और स्रोत: गृह मंत्रालय, भारत सरकार की वार्षिक रिपोर्ट 2023-24)
कार्यान्वयन तंत्र
राज्य सरकारें सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम की परियोजनाओं की योजना एवं क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होती हैं। सीमा सुरक्षा बलों (BGFs) की भूमिका क्षेत्र चयन, प्राथमिकता निर्धारण एवं निगरानी में महत्वपूर्ण है। राज्य सरकारें सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम का अन्य योजनाओं से समेकन सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी हैं। परियोजनाओं को पांच वर्षीय परिप्रेक्ष्य कार्ययोजना के आधार पर वार्षिक योजनाओं के रूप में तैयार कर गृह मंत्रालय की स्वीकृति से लागू किया जाता है। परियोजनाएं केवल सरकारी भूमि पर क्रियान्वित की जानी हैं और भूमि खरीद हेतु सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम की निधि का उपयोग नहीं किया जा सकता। प्रतिवर्ष आवंटित निधि का अधिकतम 10% पूर्व निर्मित परिसंपत्तियों के रखरखाव हेतु उपयोग किया जा सकता है। मॉडल ग्रामों का निर्माण भी सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम का एक अंग है।
चुनौतिया:
सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम की योजना एवं कार्यान्वयन में वर्षों में परिवर्तन आया है, परंतु इसके समक्ष अब भी अनेक बाधाएँ हैं, जैसे –
- दुर्गम स्थलाकृति, सीमित कार्यकाल, कच्चे माल और श्रमिकों की उपलब्धता की समस्या
- सीमापार विद्रोह एवं सुरक्षा संबंधी जोखिम
- राज्यों की विभिन्न प्राथमिकताएं और क्षमताएं
- योजनाओं में दोहराव, जैसे MGNREGA, PMGSY के साथ
- आधारभूत सर्वेक्षणों का अभाव
- निगरानी एवं मूल्यांकन तंत्र की दुर्बलता
- सीमावर्ती गांवों से जनसंख्या का पलायन
- स्थानीय सहभागिता का अभाव
- आधारभूत संरचना पर अत्यधिक बल, जबकि जीविका, स्वास्थ्य और शिक्षा की उपेक्षा
- डेटा की पारदर्शिता में कमी
पूर्वोत्तर क्षेत्र की विशेष चुनौतियाँ:
- 5300 किमी की अंतरराष्ट्रीय सीमा
- जातीय विविधता, पुरानी विद्रोही गतिविधियाँ
- सीमित पहुंच, प्रशासनिक बाधाएँ
- सीमित बुनियादी सुविधाएं
- अवैध प्रवास, जातीय पहचान संघर्ष
- पारंपरिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक-सामाजिक जटिलताएं
- प्राकृतिक आपदाएँ (भूकंप, बाढ़, भूस्खलन)
सुझाव
- सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में एक दीर्घकालिक स्थायित्वकारी उपकरण के रूप में समाहित करना चाहिए।
- वर्तमान दिशा-निर्देशों को विकास सूचकांक, जनसंख्या घनत्व तथा परियोजना क्रियान्वयन में कठिनाइयों को ध्यान में रखकर संशोधित किया जाए।
- सशस्त्र बलों को सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम की योजना-प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाए।
- पंचायतों को स्थानीय स्तर पर सहभागिता हेतु शामिल किया जाए।
- निगरानी के लिए केंद्रीय डैशबोर्ड, GIS और उपग्रह छवियों का उपयोग किया जाए।
- समय पर निधि-प्रवाह सुनिश्चित किया जाए।
- समाज आधारित लेखा परीक्षा और तृतीय पक्ष मूल्यांकन किए जाएँ।
- स्थानीय कौशल विकास और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जाए।
- क्षेत्रीय समन्वय हेतु जिला एवं राज्य स्तर पर सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम समन्वय कक्ष गठित किए जाएँ।
पूर्वोत्तर क्षेत्र हेतु विशेष अनुशंसाएँ:
- वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और पूर्वोत्तर परिषद् परियोजना (North Eastern Council Projects) के साथ सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम का समेकन किया जाए।
- सीमावर्ती पारंपरिक व्यापारिक मार्गों का पुनः सशक्तिकरण हो।
- पारंपरिक संस्थाओं और समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाए।
- स्थानीय आर्थिक जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण जैसे साहसिक पर्यटन, बुनाई, बागवानी आदि को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत संरचना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ, विशेषतः गलवान संघर्ष, पूर्वोत्तर में विकास एवं रणनीतिक समावेशन की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम को रणनीतिक हितों के साथ-साथ सीमावर्ती समुदायों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का साधन बनना चाहिए। विशेषतः पूर्वोत्तर क्षेत्र में इसका एक व्यापक, समावेशी और परिणाम-आधारित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। एक पुनःसंरेखित सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम, भारत की सीमाओं एवं सीमावर्ती नागरिकों दोनों की सुरक्षा का आधार बन सकता है।








