बॉर्डर 2: भारतीय सिनेमा का नवजागरण
भोगेंद्र पाठक
(सीमा जागरण मंच की राष्ट्रनिष्ठ चेतना और सीमा प्रहरियों के कठोर अनुशासन में तपकर बनी जीवन-यज्ञ की ज्वाला फ़िल्म ‘बॉर्डर २’ में स्पष्ट रूप से प्रज्वलित होती दिखाई देती है। यहाँ युद्ध केवल गोलियों का शोर नहीं, बल्कि सीमांत धरती की दबाई गई पीड़ा का विस्फोट है। हर दृश्य मातृभूमि के प्रति अडिग निष्ठा की घोषणा करता है और भारतत्व के उस तेजस्वी आदर्श को पुनर्स्थापित करता है, जहाँ राष्ट्र पहले है – सुविधा, स्वार्थ और भय बाद में। फ़िल्म ‘बॉर्डर 2’ भारतीय सिनेमा के परदे को चेतना का रणक्षेत्र बनाकर यह उद्घोष करती है कि सीमा की रक्षा किसी वर्दी तक सीमित दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की आत्मिक प्रतिज्ञा है। यह फ़िल्म दर्शकों से सहानुभूति नहीं, संकल्प माँगती है; मनोरंजन नहीं, उत्तरदायित्व जगाती है; तालियाँ नहीं, तपस्या की अपेक्षा करती है। ‘बॉर्डर 2’ हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्र भाषणों से सुरक्षित नहीं रहता – वह सुरक्षित रहता है त्याग, अनुशासन और जाग्रत नागरिक चेतना से।)
“बॉर्डर 2” केवल एक वाणिज्यिक फिल्म नहीं है – यह भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा-दर्शन की एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। फिल्म का 30 करोड़ रुपये का पहले दिन का संग्रह, 66.5 करोड़ रुपये दो दिनों में, और 121 करोड़ रुपये पहले तीन दिनों की बॉक्स ऑफिस कमाई यह सुस्पष्ट करता है कि सीमा-चेतना भारतीय जनमानस में कितनी गहरी पैठ रखती है। किंतु इसके परे, ‘बॉर्डर 2’ उस विशाल सांस्कृतिक-आंदोलन का अग्रदूत है, जहाँ भारतीय सिनेमा पश्चिमी विमर्श से मुक्त होकर अपनी सभ्यतागत गाथाएँ कहने लगा है। यह केवल ‘स्वदेश-प्रेम’ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रधर्म की पुनर्घोषणा’ है। भारत की 15,106 किलोमीटर की भूमि-सीमा केवल एक राजनीतिक सीमा नहीं है – यह भारतीय सभ्यता की गरिमा, भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, और भारतीय आत्मा की पहचान का रेखांकन है। ‘बॉर्डर-2’ इसी अंतर को स्फुरित करता है।
यह सांस्कृतिक सत्य है कि भारतीय परंपरा में माता की तरह राष्ट्र-भूमि की पहचान सदैव रही है। ‘भारत माता’, ‘जन-गण-मन की माता’, ‘रक्त की बूंद-बूंद में माता की विरासत’, ‘वन्दे मातरम्’ – ये सब अभिव्यक्तियाँ भारतीय राष्ट्रीय चेतना की प्राणशक्ति हैं। ‘बॉर्डर 2’ इस भाव को जीवंत करता है। इसमें न तो अतिशय-नाटकीयता है, न ही राजनीतिक दृष्टि; बल्कि गहरे, सूक्ष्म, और आत्मीय भाव और अर्थ हैं। ‘बॉर्डर 2’ ‘सीमा-विकास’ की गाथा को सिनेमा में रूपांतरित करता है। यह एक जीवंत सीमा-समुदाय की छवि प्रस्तुत करता है, न कि केवल ‘युद्ध-क्षेत्र’ की। फिल्म के दृश्यों में पंजाब के किसान-सैनिक हैं जिनके खेत और घर दोनों ही सीमा पर हैं। सीमा-गाँवों की महिलाएँ अपने बेटों को सेना में भेजती हैं। सीमांत के व्यापारी वहाँ की अर्थव्यवस्था चलाते हैं। ये मिलकर सीमा का बोध कराते हैं। यहाँ सीमा-जागरण केवल ‘बाहरी खतरे’ का बोध नहीं है; यह ‘आंतरिक शक्ति’ का विस्फोट भी है। जब सीमावर्ती गाँवों के युवा ‘कबड्डी’ खेलते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं, वाहे गुरु की भक्ति से शक्ति अर्जित करते हैं, गुरुद्वारे में माथा टेकते हैं, माँ दुर्गा की शक्ति से संचारित होते हैं, और ‘वेद-उपनिषद्-गीता’ का अध्ययन करते हैं – तो यह केवल सांस्कृतिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण है। ‘बॉर्डर 2’ इसी ‘सीमा से राष्ट्र’ की यात्रा को दिखाता है। फिल्म के गीत “मिट्टी के बेटे” में भारतीय मिट्टी की गंध, उसकी सुगंध, उसके लिए कोई भी कुर्बानी – ये सब समाहित हैं। यह केवल सैनिकों की प्रशंसा नहीं है; यह सीमावर्ती समुदाय की संपूर्ण पहचान का समादर है।
अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ
हार्वर्ड कैनेडी स्कूल का शोध स्पष्ट करता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का प्रभावी उपकरण है। जब अमेरिका की फ़िल्में Zero Dark Thirty और Argo पाकिस्तान को ‘आतंकवाद का गढ़’ दिखाती हैं, तब उसे ‘सॉफ्ट-पावर’ कहा जाता है – और वही प्रस्तुति अमेरिकी विदेश नीति का सांस्कृतिक विस्तार बन जाती है। जब भारत भी इसी सिद्धांत पर अपनी राष्ट्रीय दृष्टि को अभिव्यक्त करता है, तब बॉर्डर 2, गदर, उरी, राज़ी, आर्टिकल 370, धुरंधर जैसी फिल्में यूएई, सऊदी अरब और बहरीन जैसे देशों में ‘पाकिस्तान-विरोधी विमर्श’ के नाम पर प्रतिबंधित कर दी जाती हैं। यह निर्णय एक स्पष्ट दोहरे मानदंड को उजागर करता है। जिन देशों में अमेरिकी फ़िल्में पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र के रूप में चित्रित करती हुई निर्बाध प्रदर्शित होती हैं, वहीं भारतीय फ़िल्में ऐतिहासिक यथार्थ दिखाने पर भी प्रतिबंधित कर दी जाती हैं।
यह सच है कि बॉर्डर, गदर, उरी, राज़ी जैसी फ़िल्में भारतीय सुरक्षा-बोध को वैश्विक विमर्श में स्थापित करती हैं। ‘बॉर्डर 2’ इसी परंपरा का महाकाव्यिक विस्तार है। यह 1971 के भारत–पाक युद्ध को केवल एक भूराजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत करती है। किन्तु, यह विरोधाभास भारतीय सिनेमा की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति का प्रमाण है। जब कोई रचना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असुविधा पैदा करती है, तभी वह प्रभावशाली होती है। ‘बॉर्डर 2’ पर लगाया गया प्रतिबंध वस्तुतः भारत की सॉफ्ट-पावर की शक्ति-साक्षी है। भारत की फ़िल्में अब केवल देखी नहीं जातीं – वे विमर्श बदलती हैं, धारणाएँ चुनौती देती हैं और इसलिए रोकी जाती हैं। यही इसके प्रभाव का सबसे ठोस प्रमाण है।
सीमा जागरण और सिनेमा
सीमांत क्षेत्रों में बसने वाले समाज को जाग्रत, संगठित और सशक्त बनाने में ‘बॉर्डर 2’ जैसी फ़िल्मों की भूमिका प्रेरणादायक हो जाती है। कारण स्पष्ट है, एक फ़िल्म एक साथ, एक ही क्षण में, लाखों दर्शकों तक पहुँचती है। यह प्रभाव किसी भाषण, रिपोर्ट या अभियान से कहीं अधिक तीव्र और व्यापक होता है। ऐसी फ़िल्में सीमा के समुदायों को सीधे सशक्त करती हैं, ‘वायरस-सदृश’ सीमा-चेतना का प्रसार करती हैं और दीर्घकालीन एवं संरचनात्मक परिवर्तन की नींव रखती हैं। ‘बॉर्डर 2’ केवल भावनात्मक जुड़ाव ही नहीं रचती है। यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सुरक्षा-दृष्टि को सुदृढ़ता से स्थापित करती है और राष्ट्रीय चेतना के सांस्कृतिक पुनर्जागरण को गति देती है। सीमांत क्षेत्रों की सड़कें, विद्यालय, अस्पताल, बिजली, शिक्षा, कला, परंपरा-संरक्षण, सीमा-जागरूकता और घुसपैठ-विरोधी संघर्ष जैसे विषय फ़िल्म में सिनेमाई भाषा के माध्यम से जीवंत हो उठते हैं। फ़िल्म के दृश्य पंजाब के विकास और समृद्धि को रेखांकित करते हैं, पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं, तथा सैनिकों के बलिदान और कर्तव्य को सीमा-सुरक्षा-दर्शन के रूप में प्राणवंत बनाते हैं। इसी क्रम में ‘धुरंधर’ भारतीय खुफिया तंत्र आईबी और आर&एडब्ल्यू की कार्यशैली को सामने लाती है। यह पाकिस्तान की आंतरिक साज़िशों का पर्दाफ़ाश करती है और बुद्धि, रणनीति तथा गुप्त संचालन की शक्ति को रेखांकित करती है, अर्थात् भारत की गोपनीय सैन्य अभियान क्षमता को दृश्य-रूप देती है। इसके विपरीत ‘बॉर्डर 2’ भारतीय सेनाओं की त्रिसेना-संलग्न वीरगाथा है, 1971 के युद्ध और विजय का प्रत्यक्ष दृश्यांकन, जहाँ खुले रणक्षेत्र में शौर्य, बलिदान और कर्तव्य का उद्घोष होता है। इन दोनों फ़िल्मों का समन्वय भारत की एक समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा-दृष्टि को स्पष्ट करता है। भारत खुली शक्ति से अपनी सीमाओं की रक्षा करता है – ‘बॉर्डर 2’ के माध्यम से, और गुप्त बुद्धि से आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है ‘धुरंधर’ के माध्यम से। दोनों न केवल आवश्यक हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक भी हैं। यही संतुलन किसी भी सशक्त राष्ट्र की सॉफ्ट पावर की वास्तविक पहचान होता है।
विकसित भारत में ऐसी फिल्मों की भूमिका
जब भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बन जाएगा, तो यह केवल जीडीपी और तकनीकी विकास तक सीमित नहीं रहेगा। भारत को अपनी सभ्यतागत पहचान को मजबूत रखना होगा। ‘बॉर्डर 2’ जैसी फिल्में भारत को ‘विकसित पश्चिम’ में न खोकर ‘भारतीय सभ्यता के शिखर’ पर पहुँचने में मदद करेंगी। जब भारत जी-7 और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व करेगा, तो उसकी फिल्मों को भी एक ‘सांस्कृतिक राजदूत’ की भूमिका निभानी होगी। ‘बॉर्डर 2’ वही कर रहा है। यह भारत की सुरक्षा-दृष्टि से दुनिया को परिचित कराता है, भारत की सभ्यता और मूल्यों को दिखाता है, और भारत के ‘न्यायपूर्ण युद्ध’ की परिभाषा प्रस्तुत करता है, जहाँ विजय न्याय के साथ आती है।
युवा पीढ़ी की राष्ट्रीय चेतना
‘बॉर्डर 2’ पिछली पीढ़ी को ‘अंग्रेजी फिल्मों’ से दूर लाता है, और भारतीय कथाओं की ओर ले आता है। यह ‘सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता’ का एक प्रमाण है। सीमा जागरण केवल सैनिकों का कार्य नहीं है, नागरिकों का भी है। भारतीय सेना का काम है सीमा की रक्षा करना और शत्रुओं की सशस्त्र धमकियों को मुँहतोड़ जवाब देना। वहीं भारतीय नागरिकों की भूमिका जो ‘बॉर्डर 2’ जैसी फिल्मों के माध्यम से आकार लेती है – वह है सीमा-समुदायों की आर्थिक मदद करना, घुसपैठ, तस्करी, आतंकवाद की रिपोर्टिंग करना, सीमा-क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवाओं का समर्थन करना, और सीमा से जुड़े सांस्कृतिक-प्रतीकों को जीवंत रखना। ‘बॉर्डर 2’ नागरिकों को ‘सीमा-रक्षक’ की मनोवृत्ति से लैस करता है। जब दर्शक सिनेमा हॉल से निकलते हैं, तो वे केवल ‘मनोरंजन’ से नहीं, बल्कि ‘एक दायित्व-बोध’ से भी निकलते हैं।
वामपंथी नैरेटिव के विरुद्ध भारतीय सिनेमा का पुनरुत्थान
भारतीय सिनेमा में एक ‘बुद्धिजीवी वामपंथ’ था, जो सेना को ‘साम्राज्यवादी यंत्र’ मानता था, सीमा को ‘कृत्रिम रेखा’ समझता था, और राष्ट्र को ‘एक भ्रम’ बताता था। ‘बॉर्डर 2’ जैसी फिल्मों ने यह संदेश दिया है कि सेना भारत की रक्षक है। सीमा केवल राजनीति रेखा नहीं है, यह संस्कृति और अस्मिता की परिभाषा है, यह राष्ट्र की एक सार्थक वास्तविकता है, जिसके लिए लड़ाई जायज़ है। यह एक ‘सांस्कृतिक प्रतिरोध’ भी है, किंतु हिंसा नहीं, सिनेमा के माध्यम से यह ‘बौद्धिक राष्ट्रवाद’ है, न कि ‘अंधानुकरण’।
अंतर्राष्ट्रीय मानदंड: एक तुलना
अमेरिकी सिनेमा ‘Zero Dark Thirty’ (2012) पाकिस्तान में यातना-केंद्र दिखाता है, फिर भी विश्वव्यापी प्रशंसा पाता है।

‘Argo’ (2012) ईरान में अमेरिकी एजेंटों की कहानी है, फिर भी विश्वव्यापी प्रदर्श्य है। भारतीय सिनेमा ‘Border 2‘ (2026) ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, फिर भी मध्य-पूर्व के कई देशों में प्रतिबंधित है। यह असमानता दर्शाती है कि भारतीय सिनेमा की शक्ति कितनी बढ़ गई है कि दूसरे देश उसे रोकने की कोशिश करते हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि भारत को ‘सॉफ्ट-पावर राष्ट्र’ के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। भारतीय सुरक्षा-दृष्टि को विश्व-स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है।
‘बॉर्डर 2‘ भारत के लिए क्यों अनिवार्य
सीमा जागरण के काम में लगे संस्थान जिस राष्ट्रबोध को चार दशकों से जन-जन तक पहुँचाते आ रहे हैं, वही संदेश ‘बॉर्डर 2’ ने मात्र तीन घंटों में पाँच करोड़ दर्शकों तक पहुँचा दिया। यह ‘साझी जिम्मेदारी’ का सशक्त उदाहरण है – जहाँ सामाजिक प्रयास और सांस्कृतिक माध्यम एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। ‘बॉर्डर 2’ सीमावर्ती समुदायों को केवल दर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के सक्रिय सहभागी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह दृष्टि नागरिक चेतना को कर्म में रूपांतरित करती है। साथ ही फ़िल्म यह भी सिद्ध करती है कि भारतीय सिनेमा अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि विश्व-मंच पर भारत का सांस्कृतिक दूत बनकर राष्ट्रीय दृष्टि, सुरक्षा-बोध और सभ्यतागत आत्मविश्वास को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर सकता है।

वस्तुतः सरहद पर तैनात जवान का शौर्य जब सीमावर्ती जीवन की कर्तव्य-चेतना के संग मिलकर राष्ट्रचेतना में रूपांतरित होता है और वही राष्ट्रभक्ति की चेतना सिनेमा हॉल में बैठे करोड़ों दर्शकों के हृदय में संचारित होती है, तब एक राष्ट्रीय संस्कार जन्म लेता है – यही ‘बॉर्डर 2’ की वास्तविक महिमा है। यह केवल एक सफल वाणिज्यिक फ़िल्म नहीं, बल्कि भारत की सीमा-सुरक्षा, सीमा-विकास और सीमा-चेतना का शौर्यप्रभ है, पवित्र सांस्कृतिक संवाद है। यह सिनेमा के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण की उस चेतना को जाग्रत करती है, जो 21वीं सदी के भारत का मूल मंत्र है- हम भारत हैं – अजस्र, अडिग, अजर।








