अखिल भारतीय बैठक 2025, अहमदाबाद (7-9 नवम्बर )
‘अभेद्य सीमा, अखंड भारत’ का उद्घोष
दिशा, दृष्टि और दायित्व का महाजागरण
भारत की सीमाओं पर सतत जागरण में स्थित प्रहरियों की चेतना जब समवेत होती है, तब इतिहास को नई दिशा प्राप्त होती है। इसी समवेत चेतना का विराट अनुष्ठान सीमा जागरण मंच की अखिल भारतीय संयुक्त बैठक (जमीनी एवं समुद्री सीमा) कल्कि तीर्थ धाम, प्रेरणा पीठ, अहमदाबाद की पावन भूमि पर 7 से 9 नवंबर 2025 के मध्य सम्पन्न हुआ। यह आयोजन औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि राष्ट्र-सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रहरियों का एक महा-सत्संग था, जहाँ 18 सीमावर्ती प्रांतों से आए 189 तपस्वी प्रतिनिधियों ने राष्ट्र-साधना का संकल्प भारत माता के आँचल की सुरक्षा और सम्मान में समर्पित किया।

बौद्धिक पाथेय: दिशा और दृष्टि
इस महामंथन में राष्ट्र के शीर्ष विचारकों का मार्गदर्शन ध्रुवतारे की भाँति प्राप्त हुआ। मा. अरुण कुमार जी (सह-सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) ने अपने उद्बोधन में प्रांतीय कार्यकर्ताओं की भूमिका को एक नए आयाम से परिभाषित किया। उनकी वाणी में वह ओज था जो मन के संशयों को काटकर संकल्प को वज्र बना देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीमा-कार्य केवल भूगोल की रक्षा नहीं, बल्कि ‘भारत के विचार’ की रक्षा है। मंच के संरक्षक, मा. गोपालकृष्णन जी का सानिध्य एक वटवृक्ष की छाया जैसा था, जिसकी जड़ों में अनुभव और शाखाओं में दूरदर्शिता है। सीमा जागरण नमंच के अखिल भारतीय संयोजक, मा. मुरलीधर जी भिण्डा, और सह-संयोजकों — मा. प्रदीपन जी, मा. निम्ब सिंह जी, और मा. रामकुमार जी का मार्गदर्शन कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ। उनके शब्द केवल निर्देश नहीं थे, वे उस अग्नि को हवा दे रहे थे जो हर सीमा-प्रहरी के सीने में जलती है।

एक संकल्प, एक स्वर
तीन दिनों तक चला इस मंथन ने हर प्रतिनिधि के नेत्रों में नये स्वप्न जागृत किए और भुजाओं में अजस्र ऊर्जा का संचार किया। अहमदाबाद की इस बैठक ने सिद्ध कर दिया कि सीमा जागरण मंच केवल एक संगठन नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र की आत्मा का स्पंदन’ है। यहाँ से जो ऊर्जा लेकर कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में लौटे हैं, वह आने वाले समय में भारत की सीमाओं को न केवल सुरक्षित बनाएगी, बल्कि उन्हें ‘समर्थ, सशक्त और स्वाभिमानी’ भारत का द्वार भी सिद्ध करेगी। यह बैठक इतिहास के पन्नों में केवल एक तिथि बनकर नहीं, बल्कि ‘सीमा-चेतना के नवजागरण’ के एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित रहेगी।

शुभारंभ
बैठक का प्रारंभ एक अलौकिक वातावरण में हुआ। पूज्य संत श्री प्रेम स्वरूप दास जी महाराज के सानिध्य में सीमा जागरण मंच के वरिष्ठ अधिकारियों ने माँ भारती के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित किया। वह ज्योति केवल एक लौ नहीं थी, वह राष्ट्र की अखण्ड चेतना का प्रतीक थी। दीप की उस शिखा में कच्छ से लेकर कामरूप तक और लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक की सीमाओं का तेज समाहित था। पुष्प-अर्पण के उस क्षण में हर प्रतिनिधि ने मानो अपनी श्रद्धा और संकल्प को ही सुमन बनाकर माँ के चरणों में धर दिया। इस महायोजन का साक्षी बना अहमदाबाद का ‘कल्कि तीर्थ धाम’। प्रेरणा पीठ के कर्मठ कार्यकर्ताओं ने जब इस स्थान के ऐतिहासिक और धार्मिक महात्म्य का उद्घाटन किया, तो उपस्थित जनसमुदाय को अनुभव हुआ कि वे केवल एक भवन में नहीं, बल्कि कालचक्र के एक महत्वपूर्ण बिंदु पर खड़े हैं। वह भूमि वर्तमान के राष्ट्र-रक्षकों की प्रेरणा-भूमि बन गई।

प्रतिनिधियों का उद्घोष: प्रांतों की गूँज
विभिन्न प्रांतों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में वर्ष भर सीमा-सुरक्षा, सीमा-समृद्धि और सीमा-विकास के लिए किए गए पुरुषार्थ का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। यह विवरण केवल आँकड़ों का खेल नहीं था; यह ‘सीमा-साधना’ का जीवंत दस्तावेज़ था। किसी ने मरुस्थल की तपती रेत में राष्ट्र-प्रेम के बीज बोए थे, तो किसी ने सागर की लहरों के बीच ‘सागर-प्रहरी’ बनकर संस्कृति की रक्षा की थी। हर शब्द में संघर्ष की गंध और विजय का विश्वास था।













