सावलकोट: सीमा-चेतना और आत्मनिर्भरता का विद्युत-स्तंभ
जिन पर्वत शृंखलाओं ने बरसों से बर्फ और बादल का बोझ सहा है, वहीं अब विकास का सूर्योदय फूट रहा है। चिनाब की अनवरत धारा जो पीढ़ियों से सीमांत जन-जीवन को पालती आई है। वहीं आज सावलकोट में ऊर्जा का नया ज्वालामुखी बनकर फूट रही है। 1856 मेगावाट की सावलकोट जल विद्युत परियोजना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के हृदय में प्रज्वलित होती हुई एक अग्निशिखा है। यह भारत के उस स्वप्न का प्रत्यक्ष रूप है जिसमें हिमालय की गोद से भी संकल्प की ऊष्मा विद्युत उर्जा के स्वरूप में फूट रही है। जम्मू-कश्मीर के रामबन की धरती सदियों तक सीमाओं की प्रहरी रही, अब अपनी गोद में शक्ति और समृद्धि का नया बीज रोप रही है। सीमा जागरण मंच का यह अटल विश्वास है कि भारत की सीमाएँ केवल रक्षा-पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के स्पर्श-बिंदु हैं। चिनाब की गर्जन भरी लहरें मानो कह रही हैं कि अब समय आ गया है कि भारत अपनी नदियों की शक्ति को जगाए, अपने पर्वतों की चुप्पी को ऊर्जा में बदले। सावलकोट परियोजना इसी जागरण का प्रतीक है। यह केवल बाँधों और टरबाइनों की कहानी नहीं, यह उस आत्मविश्वास की घोषणा है जो कहता है कि भारत किसी से उधार नहीं लेगा, वह अपनी नदियों से ही अपनी ज्योति प्रज्वलित करेगा।

फोटो: सावलकोट डैम
इन विद्युत धाराओं में केवल बिजली नहीं बहेगी, यहाँ भविष्य का उजाला और सीमांत नागरिकों के जीवन में नई आशा प्रवाहित होगी। सीमांत गाँवों में जहाँ आज रोजगार की पगडंडी धुंधली है, वहीं कल उद्योग और उद्यम की नई-नई राहें खुलेंगी। जब युवाओं के हाथों में उपकरण और उनके मन में आत्मविश्वास का संकल्प जल उठेगा। तब यह घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं, राष्ट्रीय चेतना और सीमा-गौरव से भी आलोकित होगी। सीमा जागरण मंच का यह अटूट संकल्प है कि सीमांत नागरिकों का सर्वांगीण विकास शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान के साथ ही राष्ट्र की सच्ची सुरक्षा का आधार बन सकता है।
भारत की आत्मनिर्भरता केवल अर्थशक्ति से नहीं, बल्कि सीमाओं के सशक्तिकरण और सीमांत समुदायों की समृद्धि से नापी जाएगी। जिस प्रदेश ने देश की रक्षा की, अब वही प्रदेश राष्ट्र की ऊर्जा का स्रोत बनेगा। इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है? सावलकोट परियोजना यह संदेश देती है कि सीमा पर खड़ा हर नागरिक राष्ट्र का प्रहरी है, और उनका विकास राष्ट्र का कर्तव्य। यह परियोजना देश के हर नागरिक को यह स्मरण कराती है कि हमारी नदियाँ केवल जल नहीं, जीवन हैं; केवल प्रवाह नहीं, संघर्ष, सृजन और सीमा-सुरक्षा का प्रतीक हैं। कहते हैं – जहाँ नदियाँ गर्जना करती हैं, वहीं से शक्ति का स्रोत फूटता है। सावलकोट की यह उद्यम सीमा की शांति की शपथ है, आत्मनिर्भर भारत का संकल्प है, और सीमा जागरण मंच की उस दृष्टि का साकार रूप है जो सीमा को केवल रेखा नहीं, राष्ट्र की धड़कन मानती है। जब यह परियोजना अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगी, तो उसके टरबाइन भारत के नवजागरण के स्वर बनेंगे – यह संदेश देते हुए कि पर्वत मौन नहीं, अब मुखर हो रहे हैं; सीमा अब केवल सुरक्षित नहीं, समृद्ध भी होगी; और उनकी गूंज हर कोने तक कहेगी कि यह भारत है, भारत अपने स्रोतों से ही विश्व को आलोकित करेगा, और अपनी सीमाओं को राष्ट्र-निर्माण का केंद्र बनाएगा!








