सुचेतगढ़: भारत का प्रथम गाँव जहाँ सीमा राष्ट्र की आत्मा है
पाकिस्तान के सीमांत द्वार जम्मू की पवित्र धरती पर एक छोटा-सा गाँव सगर्व खड़ा है- नाम है सुचेतगढ़। यह केवल एक पता नहीं, एक पहचान है। केवल एक ग्राम नहीं, भारत की प्रथम राष्ट्र-धारणा है। आर.एस.पुरा की तहसील में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर यह अतुल्य गाँव स्थित है। इसकी दूरी जम्मू से 28 किलोमीटर है। पाकिस्तान से भारत में आने वाली पहली हवा, पहली नदी, पहली मिट्टी – सब कुछ सुचेतगढ़ में परिणत हो जाता है। यह वह अलौकिक द्वार है जहाँ स्वतंत्रता की पहली गर्जना सुनाई देती है। यह धरा केवल भूमि नहीं, मातृभूमि है। यह धारणा सुचेतगढ़ के हर कण में गूँजती है। यह गाँव, कभी ब्रिटिश काल में एक चुंगी-चौकी था, व्यापार का केंद्र था, आवागमन का सेतु था। महाराजा गुलाब सिंह के समय से यह जम्मू-सियालकोट मार्ग का अभिन्न अंग रहा। 1897 में, जब पहली रेलगाड़ी जम्मू से सियालकोट (जो अब मात्र 11 किलोमीटर दूर पाकिस्तान में है) तक दौड़ी, तब सुचेतगढ़ ही वह ऐतिहासिक मोड़ था। यहाँ कभी व्यापारी और साधु दोनों एक पदचिन्ह पर चलते थे, आज वहीं BSF के जवान निर्भीकता से पहरेदारी करते हैं। विभाजन की आग ने वह पुरानी रेलगाड़ी रोक दी, वह व्यापार-मार्ग तोड़ दिया। किंतु सुचेतगढ़ की चेतना कभी नहीं टूटी। आज यह एक अलग तीर्थ बन गया है – देशभक्ति का तीर्थ, सीमा-जागरण का पवित्र स्थल।

फोटो: AI Image सुचेतगढ़
वीरता का साक्षी
सुचेतगढ़ के मध्य में एक विशाल वट-वृक्ष है – सौ वर्ष का गर्वोन्नत गवाह। यह वृक्ष केवल छाया नहीं देता रहै; यह इतिहास कहता है। इसकी जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी गहरी है भारत से इसका नाता। इस पेड़ ने विभाजन को देखा है, युद्धों को सहा है, फिर भी खड़ा है – अविचल, अडिग, शाश्वत। यह वह प्रतीक है जो कहता है – मैं जीवंत हूँ, जाग्रत हूँ, भारत को कभी नहीं भूला सकता।
प्रकृति का साथी
सुचेतगढ़ के आसपास घरना और अब्दुल्लियान की आर्द्रभूमि फैली है जो प्रकृति का अपना उपहार है, राष्ट्र की अपनी सम्पदा है। सर्दियों में लाखों प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं, जिनकी गतिविधियाँ मानो सीमा पर एक शांतिपूर्ण संदेश देती हैं। सुचेतगढ़ के साथ राबी नदी प्रवाहमान है, गतिशील है, कभी रुकती नहीं है। यह जल भी एक मूर्त संदेश है कि भारत बहेगा, अविचल रहेगा, किसी की परवाह किए बिना।

फोटो: सुचेतगढ़
454 हेक्टेयर भूमि यहाँ खेती के लिए वरदान बनी हुई है। यह भूमि बासमती चावल, मक्का, गेहूँ आदि के लिए ख्यात है। किसान यहाँ न केवल खाद्यान्न उगाते हैं, बल्कि राष्ट्र की जीवनशक्ति को भी सुदृढ़ करते हैं।
राष्ट्र का दुर्ग
गत वर्षों में सुचेतगढ़ की सीमा-चौकी का पुनर्निर्माण हुआ है। यह अब केवल एक सैन्य चौकी नहीं है, यह राष्ट्र-गर्व है। इस अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अब सड़कें हैं, विश्राम घर हैं, और शहीदों की स्मृति के लिए समर्पित स्मारक हैं। बीएसएफ के जवान यहाँ निरंतर कर्तव्य निभाते हैं – प्रतिदिन, प्रतिघंटा, किसी विराम के बिना। वाघा सीमा (अमृतसर) की तरह गर्मियों में यहाँ मौसमी रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन होता है। तब यहाँ भारत की दूरगामी गर्जना सीमा पर गूँजती है और राष्ट्र-भाव को मूर्त रूप मिलता है।








