किबिथू- भारत का प्रथम गाँव, जहाँ सीमाएँ और नदियाँ मिलती हैं
जहाँ हिमालय की सर्वोच्च शिखरमालाएँ नीलाकाश का आलिंगन करती हैं, और भारत की सीमांत भूमियाँ हिमनदों से प्रवाहित सरिताओं के सहारे विश्व की भौगोलिक सीमाओं का विधान रचती हैं – वहीं एक ऐसा ग्राम स्थित है जो भारतीय राष्ट्रचेतना का अंतिम दीप-शिखर बनकर अडिग खड़ा है। वह ग्राम है किबिथू।
किबिथू केवल एक सीमांत बसावट नहीं, अपितु सीमाओं की सुरक्षा का सजग प्रहरी, राष्ट्रीय गौरव का अविचल स्तंभ और भारतीय सभ्यता की अक्षय चेतना का सजीव उद्घोष है। अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में सर्वाधिक पूर्वीय सीमा पर स्थित किबिथू ग्राम समुद्र तल से 1,305 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। हवाई जिला के मुख्यालय से 87 किलोमीटर की दूरी पर और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से मात्र 15 किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित यह ग्राम भारत, तिब्बत (चीन) और म्यांमार के त्रिराष्ट्रीय संधि-स्थल के अत्यंत निकट है। दिफू दर्रे से पश्चिम की ओर 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह सीमांत निवास, वालॉंग एयरस्ट्रिप के निकटतम आकाश-मार्ग से जुड़ा हुआ है।

यह भौगोलिक स्थिति, कोई सामान्य संयोग नहीं है; यह भारत के राष्ट्रीय अस्तित्व का एक सुनिश्चित विस्तार-बिंदु है। किबिथू वह अंतिम मणि है जो भारत के मुकुट की सबसे पूर्वीय सीमा में जड़ित है, जहाँ राष्ट्रीय संप्रभुता की प्रथम पहचान होती है। तिब्बत की तिराप-फासी पर्वतमालाओं के हृदय से जन्मी लोहित नदी किबिथू के निकटवर्ती क्षेत्र में ही भारतीय भूमि में प्रविष्ट होती है। ‘रक्त की नदी’ – यह नाम कोई काव्यात्मक अलंकार नहीं है। इसके पीछे निहित है भारत-भूमि पर हुए संघर्षों का एक दीर्घ इतिहास, त्याग और बलिदान की एक अनंत गाथा। भारतीय सेना इसी लोहित नदी के तटों पर अपने अभियानों को संपन्न करती है, अपने सैनिकों का प्रशिक्षण करती है। यह नदी भारत की सीमा-रक्षा की एक जीवंत साक्षी है, जहाँ इतिहास और वर्तमान का मिलन होता है।
सीमांत-रक्षा का अभेद्य किला

फोटो: अमित शाह (2023 के किबिथू यात्रा के दौरान पौधा रोपण)
किबिथू की सैन्य महत्ता को समझने के लिए हमें 1962 की भारत-चीन युद्ध की गौरवगाथा को स्मरण करना होगा। इसके निकटवर्ती वालॉंग क्षेत्र में हुई थी महाकाव्यात्मक लड़ाई – जहाँ भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और समर्पण का परिचय देते हुए चीन के 4,000 से अधिक सैनिकों की भारी हानि पहुँचाई थी। भारत को भी अपूर्व कीमत चुकानी पड़ी; किंतु उस संघर्ष में भारतीय पराक्रम का एक अमर प्रभाव स्थापित हो गया था। वर्तमान में किबिथू का सैन्य और रणनीतिक महत्व अप्रतिहत बना हुआ है। यहाँ भारतीय सेना की एक निरंतर, अचल और सतर्क उपस्थिति LAC पर चीनी सेना की गतिविधियों पर अपनी दृष्टि रखती है। यह अंजॉ जिले का एकमात्र ऐसा प्रशासनिक मुख्यालय है जो सीधे अंतर्राष्ट्रीय सीमा के सामने स्थित है और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता की अपरिहार्य रक्षा में निरंतर सजग रहता है।
आदिवासी बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत
मेयोर और मिजु मिश्मी जनजातियों का यह निवास-स्थान भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक वैभव का एक प्रामाणिक प्रतिनिधित्व है। पारंपरिक लकड़ी की झोपड़ियों की वास्तु-शैली, विविध रंगों के फूलों की सुरभि, पर्वतीय जलप्रपातों का संगीत, और पाइन वनों की गहन छाया – ये सब मिलकर एक अद्भुत सांस्कृतिक परिवेश का निर्माण करते हैं। हाल ही में, 2023 में इस सीमांत ग्राम को 4G कनेक्टिविटी प्राप्त हुई। यह केवल तकनीकी उन्नति नहीं है; यह भारत के सीमांत क्षेत्रों में आधुनिकीकरण का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। परंपरा और आधुनिकता का यह संगम भारतीय राष्ट्र-निर्माण का एक सुंदर प्रतीक है।
राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति
किबिथू को भारत का प्रथम ग्राम के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह राष्ट्रीय सीमा-सुरक्षा और सांस्कृतिक आत्म-बोध का एक जीवंत प्रतीक है। भारत सरकार के ‘भारत रणभूमि दर्शन’ कार्यक्रम के अंतर्गत किबिथू को एक प्रमुख सीमांत पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस पहल में 77 युद्ध-स्मारक समस्त सीमांत क्षेत्रों में विद्यमान हैं – लोंगेवाला, सियाचिन, कारगिल, गलवान, पांगोंग त्सो। ये सब मिलकर भारत की राष्ट्रीय गौरव-गाथा का एक स्तुत्य अभिलेख प्रस्तुत करते हैं। यह ग्राम भारत की पूर्वोत्तर सीमांत का वह अभेद्य प्रहरी है, जहाँ भारतीय राष्ट्र की संप्रभुता, राष्ट्रीय चेतना और सभ्यतागत अस्तित्व का पावन दायित्व प्रतिक्षण निर्वाह होता है। भारत का प्रथम ग्राम किबिथू केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मबोध की ज्योति, सांस्कृतिक स्मृति का अक्षय स्रोत और आने वाली पीढ़ियों के लिए अनंत प्रेरणा है।








