द्वीपों की सीमा-संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता
नक्शों की रेखाओं से राष्ट्र नहीं बनते; राष्ट्र बनते हैं संकल्प से। भारत की सीमाएँ वही संकल्प हैं, जिन्हें इतिहास ने तपाया है और बलिदान ने अमर किया है। ये तो राष्ट्र–देह की वह प्रथम–दृश्यमान त्वचा है, जो किसी जीवंत शरीर की बाह्य-सीमा होती है। इससे परे सीमा का एक और आयाम है: वह राष्ट्र–आत्मा की उस गहन, अनुरणनशील धड़कन है, जो हिमालय की तपस्वी, निरपेक्ष चोटियों से अपनी यात्रा शुरू करती है। जहाँ सूर्य की पहली किरण पड़ती है वहाँ से यह भारतीय सीमा दक्षिण की ओर अग्रसर होते–होते भारत की सम्पूर्ण भौगोलिक तन को सजग, संवेदनशील रूप से स्पर्श करती हुई, अंततः समुद्र की अथाह–गहन लहरों के साथ मिल जाती है, उनमें विलीन हो जाती है। यह सीमा–यात्रा, यह सीमा–सूत्र एक अदृश्य, पर अत्यंत सशक्त, अत्यंत ताप–वहन करने वाला भाव–सूत्र है, जो समूचे भारत को, समूचे राष्ट्र को, समूचे समाज को एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक–सांस्कृतिक एकता–समरूपता की ईकाई के रूप में बाँधता है। –
भारत की सीमाएँ: स्थलीय और समुद्री
भारत की सीमाएँ केवल 15,000 किलोमीटर स्थलीय सीमा तक सीमित नहीं हैं। समुद्री सीमा में भारत का विस्तार भी विशाल है। भारत की कुल तटरेखा 11,098.81 किलोमीटर है (2024 में संशोधित), जिसमें मुख्य भूमि 5,422 किमी, द्वीप क्षेत्र 2,094 किमी, और अंडमान–निकोबार 3,083.50 किमी शामिल हैं। यह तटरेखा गुजरात (2,340.62 किमी), तमिलनाडु (1,068.69 किमी), आंध्र प्रदेश (1,053.07 किमी), महाराष्ट्र (877.97 किमी), पश्चिम बंगाल (721.02 किमी), केरल (600.15 किमी) और अन्य नौ तटीय राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों के माध्यम से विस्तृत है। भारत का समुद्री क्षेत्र तीन स्तरों में विभाजित है: (1) प्रादेशिक समुद्र (12 समुद्री मील), (2) अविच्छिन्न मंडल (24 समुद्री मील), और (3) विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) – 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर, साथ ही महाद्वीपीय शेल्फ 372,424 किमी²।
तटीय संस्कृति: समुद्र से जन्मी परंपराएँ
लक्षद्वीप की ‘पोल एंड लाइन’ एक अनन्य विरासत मानी जाती है। लक्षद्वीप द्वीप समूह भारत के समुद्री सीमांत का एक अद्वितीय, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र है। विश्व में यहाँ का मछली पकड़ने का तरीका ‘पोल एंड लाइन’ केवल लक्षद्वीप में ही उपलब्ध है। लक्षद्वीप के मछली पकड़ने वाले समुदाय परंपरागत नावें ‘ओडम’ (नारियल की लकड़ी और रस्सी से बनी गहरे समुद्र की नावें) और ‘मछुवा’ (लैगून मछली पकड़ने के लिए) का उपयोग करते हैं। तरीका जो सदियों की समुद्री परंपरा और कौशल को प्रतिफलित करती हैं। टूना यहाँ का मुख्य मत्स्य संसाधन है जिसमें 80% स्किपजैक टूना का हिस्सा होता है। इसका वार्षिक उत्पादन 21,016 टन तक पहुँचता है। यहाँ की ‘मसमीन’ (सूखी मछली) परंपरा भारतीय समुद्री मत्स्य पालन का एक प्रसिद्ध उत्पाद है, जो 60% उत्पादन को सूखे उत्पाद में रूपांतरित करती है और 40% स्थानीय उपभोग के लिए संरक्षित रहता है।

अंडमान-निकोबार: आदिवासी समुद्री परंपरा
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत की समुद्री सीमा का रणनीतिक और सांस्कृतिक हृदय है। यह 572 द्वीपों का समूह है, जिनमें से शोम्पेन, ओंग, अंडमानी और निकोबारी जैसी स्वदेशी जनजातियाँ हजारों वर्षों से रहती हैं। निकोबारी समुदाय की समुद्री परंपरा में विशेष रूप से कुशलतापूर्वक निर्मित नावें होती हैं। एक ही लकड़ी के टुकड़े से सावधानीपूर्वक खोखली कर ऐसी नावें बनाई जाती हैं। ये समुद्र से उनके अभिन्न और शाश्वत संबंध को प्रदर्शित करती हैं। शोम्पेन जनजाति विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है। इसकी अनुमानित जनसंख्या मात्र कुछ सौ व्यक्तियों की है। द्वीप के प्राकृतिक और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र से यह जनजाति गहरी निकटता रखती है। समुद्री सुरक्षा में तटीय समुदाय भारत की समुद्री सुरक्षा केवल नौसेना, तटरक्षक बल और राडार तकनीक पर निर्भर नहीं है। तटीय और मछली पकड़ने वाले समुदाय भी समुद्री सुरक्षा की रीढ़ हैं। ये राष्ट्र की मूक सेना हैं। भारतीय तटरक्षक द्वारा नियमित ‘कम्युनिटी इंटरैक्शन प्रोग्राम्स’ (CIPs) आयोजित किए जाते हैं, जहाँ मछली पकड़ने वाले समुदायों को सुरक्षा जागरूकता, तस्करी-विरोधी प्रशिक्षण, और खतरनाक गतिविधियों की रिपोर्टिंग के बारे में जानकारी दी जाती है। 2025 की एक पायलट परियोजना में आंध्र प्रदेश के मछुआरों को एक मोबाइल ऐप के माध्यम से संदिग्ध गतिविधि की रिपोर्ट करने के लिए प्रशिक्षित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप कई विदेशी ट्रॉलरों की पकड़ हुई।
समुद्री सीमान्त सूचना नेटवर्क
भारतीय तटरक्षक द्वारा स्थापित तटीय सुरक्षा निगरानी प्रणाली 46 स्थानों पर राडार, स्वचालित पहचान प्रणाली (AIS), और दिन/रात कैमरों से सुसज्जित है। पर यह तकनीकी व्यवस्था तब तक अधूरी है, जब तक स्थानीय समुदायों की जागृत चेतना, उनकी समुद्री परिचितता, और उनके ‘आँखों-कानों’ का दर्जा शामिल न हो। मार्च 2025 में लक्षद्वीप के पास, एक अज्ञात मछली पकड़ने वाले जहाज को स्थानीय मछुआरों द्वारा दी गई वास्तविक समय बुद्धिमत्ता के आधार पर भारतीय तटरक्षक और स्थानीय पुलिस द्वारा अवरोधित किया गया, और उसमें से 5 AK-47, 1,000 गोलियाँ, और 300 किग्रा हेरोइन बरामद की गईं।
पहचान प्रणाली और सुरक्षा
भारत सरकार द्वारा तटीय मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए जैव-मेट्रिक पहचान पत्र जारी किए जा रहे हैं, और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों में अनिवार्य ट्रांसपोंडर स्थापित किए गए हैं। ‘री एएल क्राफ्ट’ ऐप्लिकेशन भारतीय तटरक्षक और नौसेना के समुद्री प्रवर्तन एजेंसियों को तटीय सुरक्षा को मजबूत करने में सहायता करती है।
सीमांत संघर्ष की त्रासदी
पाल्क जलडमरूमध्य (भारत और श्रीलंका के बीच) में भारतीय मछुआरों का अवैध प्रवेश और गिरफ्तारी एक दीर्घकालिक, मानवीय समस्या है। 1974-1976 के समुद्री सीमांकन समझौतों के बाद, यह क्षेत्र कानूनी रूप से विभाजित हो गया, पर उच्च-गति के भारतीय ट्रॉलरों ने श्रीलंकाई मछुआरों को प्रतिस्पर्धा में पराजित कर दिया। 2008 के बाद से 1,348 भारतीय मछुआरे श्रीलंकाई नौसेना द्वारा गिरफ्तार किए गए हैं, और उनकी नावें महीनों-सालों तक श्रीलंकाई नौसेना के ठिकानों में अवरुद्ध रहती हैं। यह “मछली पकड़ने के युद्ध” दरअसल सीमांत समुदायों की पीड़ा, उनकी आजीविका के संघर्ष, और भूली-बिसरी सरकारी उपेक्षा का एक जीवंत उदाहरण है।
अवैध, अव्यवस्थित और अनियंत्रित मछली पकड़ना भी एक बड़ी समस्या है। विशेषकर चीनी मछली पकड़ने वाले जहाजों द्वारा भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में एक बढ़ता हुआ समुद्री सुरक्षा खतरा है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और तटीय समुदायों की आजीविका का प्रश्न है। भारतीय निर्देशालय के 2023 की एक रिपोर्ट में चीन से 11 जहाज, हांगकांग से 29, लाइबेरिया से 88, मार्शल द्वीप से 89, और पनामा से 143 जहाजों का निरीक्षण दर्ज है।
संस्कृति और सुरक्षा का समन्वय
जब भारत की राष्ट्रीय नीति में समुद्री सीमांत क्षेत्रों के तटीय और मछली पकड़ने वाले समुदायों को केवल ‘आर्थिक इकाइयों’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र–आत्मा के सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि’ के रूप में स्वीकृति दी जाएगी – तब समुद्री सुरक्षा एक तकनीकी व्यवस्था से परे, एक सांस्कृतिक धर्म, एक सामाजिक संकल्प, एक मानवीय प्रतिश्रुति बन जाएगी। तटीय क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, टिकाऊ आजीविका, सांस्कृतिक संरक्षण केंद्र और सामाजिक सशक्तीकरण को सुरक्षा रणनीति के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। जब लक्षद्वीप के ‘पोल एंड लाइन’ मछली पकड़ने की परंपरा, अंडमान की निकोबारी नाव निर्माण कला, और समूचे तटीय भारत की समुद्री संस्कृति राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय कथानक के सर्वोच्च मंच पर प्रतिष्ठित होगी – तब भारत की समुद्री सुरक्षा केवल एक सामरिक उपक्रम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण, एक आध्यात्मिक संकल्प बन जाएगी। तब अनंत काल तक प्रत्येक पीढ़ी के लिए भारत की सुरक्षा, सम्मान, गरिमा और अस्मिता की रक्षा होती रहेगी।








