मधुर मुस्कान और मजबूत निर्णय शक्ति के साथ, यह वीर सपूत भारत के स्वाभिमान का आधार हैं। 4 अप्रैल 1914 को जन्मे और 27 जून 2008 को हमे अलविदा कह गए इस महायोद्धा ने 1971 के युद्ध में अपनी सेनाध्यक्षता का अद्भुत परिचय दिया। सेनापति के रूप में, भारत की रणभूमि में वे धूप-छांह का संतुलन रहे। उनसे पूर्व कोई ऐसा शूरवीर भारत में न हुआ, जिन्होंने सेना के पहले फील्ड मार्शल का खिताब पाया हो। उन्हें देखकर यही ज्ञात होता है कि वे भी उस विराट सूर्य के आलोक हैं, जिसने राष्ट्र के अंधकार को दूर कर दिया।

