सीमा सुरक्षा बल: सीमा का कवच, संस्कृति का तपस्वी
(BSF का 60वां स्थापना दिवस)
थार की ज्वाला में तपकर निखरता साहस, कच्छ के दलदलों में चमकता शौर्य, कश्मीर की बर्फीली चोटियों पर कठोर होता संकल्प, और बांग्लादेश की हरियाली से भरी संवेदनशील सीमाओं पर चौकस सतर्कता का एक पर्यायवाची है सीमा सुरक्षा बल। सीमा सुरक्षा बल की देशभक्ति की गूँज सीमांत नागरिकों के लिए केवल सुरक्षा नहीं, प्रेरणा के स्रोत भी बन गई है –
“वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो;
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो,
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो।”
भारत की सीमाएँ केवल माप-जोख की लकीरें या अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की महज़ सीमा-रेखाएँ नहीं हैं। ये हैं उस चिरंतन संस्कृति और शाश्वत सभ्यता की आत्मनाड़ी जिसमें हजारों वर्षों की साधना का अमृत, मानवीय-मूल्यों का अजेय प्रकाश, और वीरों के त्याग का पवित्र रक्त प्रवाहित है। इन्हीं पवित्र सरहदों पर जहाँ प्रकृति भी अपनी निर्मम परीक्षा लेती है, जहाँ आत्मा प्रतिपल अपना परिमार्जन करती है, जहाँ साहस और त्याग एक-दूसरे को गले लगाते हैं, वहाँ अडिग, अचल, अविचल, अपराजेय खड़ा है भारत का सीमा सुरक्षा बल। यह ऐसा सुरक्षा-बल है, ऐसा अनंत प्रहरी है जो भारत की आत्मा का ‘कवच-दुर्ग’ है, राष्ट्र के गौरव की ‘अमर-ज्योति’ है, और भारत की सीमाओं के भविष्य की ‘रक्षा-परम्परा’ है। यह केवल एक बल नहीं, यह भारत की ‘रक्षा की प्रथम पंक्ति’ है। 1 दिसंबर 1965 को सृजित यह सुरक्षा बल आज विश्व का सबसे बड़ा सीमा रक्षक बल बन चुका है। यह पाकिस्तान और बांग्लादेश से सटी 6,386 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमाओं पर एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा है।
राजस्थान के सीमांत पर खड़े सीमा सुरक्षा बल के प्रहरी केवल बंदूकें नहीं थामते, वे उस मरुधरा के उत्तराधिकारी हैं जहाँ “शीश कटे पर धड़ लड़े” की गाथाएँ हवाओं में गूंजती हैं। जब थार की रेत 50 डिग्री तापमान में चमड़ी जलाती है, तब बीएसएफ के जवान ‘ऑपरेशन सर्द हवा’ और ‘ऑपरेशन गर्म हवा’ जैसे अभियानों के माध्यम से न केवल घुसपैठ रोकते हैं, बल्कि उस भीषण अकेलेपन में भी अपनी संस्कृति का दीपक जलाए रखते हैं। उनकी पोस्ट पर जलता दीया केवल प्रकाश नहीं, बल्कि हाड़ा और राणा सांगा के शौर्य का प्रतीक है। वह सीमा का रक्षक ही नहीं, उस माटी की गंध का पहरेदार भी है जो उसे अपने गाँव, अपनी जड़ों से जोड़ती है।
पूर्वी मोर्चे पर, जहाँ नदियाँ सीमाओं को धुंधला करती हैं, बीएसएफ एक ‘जल-योद्धा’ (Water Warrior) के रूप में उभरता है। सुंदरबन के दुर्गम डेल्टा और चंचल नदियों के बीच, 193 बटालियनों का यह बल न केवल तस्करी और घुसपैठ को कुचलता है, बल्कि ‘सिविक एक्शन प्रोग्राम’ के तहत सीमावर्ती गाँवों में शिक्षा, चिकित्सा और खेल का प्रकाश भी फैलाता है। दुर्गा पूजा हो या ईद, यह बल सरहद पर केवल संगीनें नहीं, स्नेह भी बाँटता है। स्थानीय लोग जब जवानों के लिए घर से बना भोजन लाते हैं, तो वह भोजन नहीं, बल्कि राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रसाद होता है। यहाँ बीएसएफ सांस्कृतिक सेतु बन जाता है, जो भाषाओं और भावनाओं के बीच की खाई को पाट देता है।
उत्तर में, जहाँ तापमान शून्य से -40 डिग्री नीचे चला जाता है और रक्त भी जमने लगता है, वहाँ बीएसएफ के जवान अपनी नसों में ‘वज्र’ सा संकल्प लिए खड़े रहते हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी वीरगाथाओं में, उसने पाकिस्तान की 118 चौकियों को ध्वस्त कर यह सिद्ध किया कि भारत की शांति का अर्थ कायरता नहीं है। परंतु इसी कठोरता के बीच उनका हृदय मक्खन-सा कोमल बना रहता है। बर्फ में फँसे नागरिकों को निकालना हो या घायल चरवाहों की मरहम-पट्टी करनी हो, वे रक्षक के साथ-साथ मानवीयता के देवदूत भी बने रहते हैं। कश्मीर की वादियों में उनकी उपस्थिति उस “अभय” का प्रतीक है जो दिनकर के शब्दों में गूंजता है:
“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।”
कच्छ का रण में न पानी है, न ज़मीन, केवल नमक और दलदल का अनंत विस्तार है। वहाँ बीएसएफ की ‘क्रीक क्रोकोडाइल’ (Creek Crocodile) कमांडो यूनिट और ऊँट दस्ता प्रकृति को भी चुनौती देते हैं। ‘हरामी नाला’ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में स्थायी बंकर बनाकर उन्होंने घुसपैठ के हर रास्ते को सील कर दिया है। यहाँ जवान और स्थानीय लोग एक-दूसरे के पूरक हैं, एक ऐसी साझदारी बनी रहती है जिसके कारण कोई भी सरहद को चोट नहीं दे सकता।

स्थापना दिवस: संकल्प का महापर्व
1 दिसम्बर को बीएसएफ अपना स्थापना दिवस मनाता है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस त्याग का स्मरण होता है जिसने 1971 के युद्ध से लेकर कारगिल तक, हर मोर्चे पर तिरंगे का मान बढ़ाया है। यह बल केवल सीमाओं की रक्षा नहीं करता, यह उस ‘भारतीयता’ का रक्षक है जो एकता में अनेकता के मंत्र का उद्घोष करता रहता है।
आज हर चौकी पर फहराता तिरंगा उस जवान की आँखों का विश्वास है जो कहता है:
“सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा,
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!”
नमन है उन प्रहरियों को, जो अपने रक्त से भआरत की सीमाओं को शक्तिशाली-सुरक्षित बनाए रखते हैं और जिनके त्याग-बलिदान से माँ भारती का सम्मान विश्वव्यापी बना हुआ है।
वन्दे मातरम्!









