श्रम और साहस से संवरता खाजूवाला का सीमांत जीवन
बीकानेर की मरुभूमि के हृदय में, सीमा से तेईस किमी दूर खाजूवाला स्थित है। कभी बेड़ियावाली कहा जाने वाला यह इलाक़ा, इंदिरा गांधी नहर की एक धार से ऐसा बदला कि अब राजस्थान के कृषि–औद्योगिक नक़्शे में यह चमकता सितारा बन गया है। नहर का संबल मिवते ही इस भूमि ने तप्त रेतीली धूल को हरियाली का अप्रतिम आशीर्वाद दे दिया। आज यह शौर्य और श्रम की नई गाथा लिख रहा है।
इंदिरा गांधी नहर का जल जहाँ पड़ा, वहाँ रेत भी खेत बन उठी। अब यहाँ गेहूँ की बालियाँ हवा में झूमती हैं, सरसों का सोनापन धरती को स्वर्ण-सी चमक देता है। कपास के रेशे और ग्वार के दाने यहाँ के परिश्रम के प्रमाण हैं। तेल मिलें, स्पिनिंग यूनिटें, जिप्सम की धूल और भट्टों का ताप – ये सब मिलकर इस क्षेत्र की प्रगति का अग्नि-दीप जलाते हैं। और इस सबके बीच, खाजूवाला के लोग सीमा की निगरानी से लेकर खेत की मेड़ तक एक ही संकल्प में बंधे दिखते हैं – “देश सुरक्षित रहे, और धरती अन्न देती रहे।”
मारवाड़ी की मधुर वाणी इस सीमांत भूमि को मधुर बनाती है, वहीं सीमा के प्रहरी कठोर जीवन जीकर सरहद की सुरक्षा करते हैं – यह भी खाजूवाला की पहचान है। सच में, खाजूवाला, राजस्थान के पश्चिम में उगा वह दीपक है, जो रेगिस्तान में आशा की लौ बनकर चमक रहा है। हम सभी के लिए खाजूवाला का संदेश है कि देश की सीमाएं न केवल सुरक्षा की दीवारें हैं, बल्कि खुशहाली और समृद्धि के द्वार भी हैं।








