जिसने शौर्य को इतिहास में दर्ज कर दिया- रानी लक्ष्मीबाई
भारत के ऐतिहासिक आकाश में नारी–शौर्य के अनेक सूर्य उदित हुए, पर रानी लक्ष्मीबाई की उदीप्ति तो मातृभूमि के माथे पर अविचल वीरता का कुमकुम–चिह्न बनकर चमकी – एक ऐसी राष्ट्रात्मा के रूप में जो पीढ़ियों को संकल्प और स्वाभिमान का संदेश दे रही हैं। 19 नवंबर 1828 को वाराणसी की पुण्यभूमि पर जन्मी मणिकर्णिका तांबे, स्नेह से ‘मनु’ कहलाने वाली इस अलौकिक बालिका ने अपने संक्षिप्त जीवन में ऐसी अक्षय कीर्ति रच दी, जो युगों–युगों तक भारत–माता की स्वतंत्रता, संप्रभुता और सीमा–सुरक्षा के लिए अदम्य प्रेरणा बनकर दमकती रहेगी। इसलिए कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की भावांजलि है –

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
बिठूर के पेशवा दरबार में, जहाँ शास्त्र और शस्त्र का एक अनोखा संगम था, यह बालिका पली–बढ़ी। घुड़सवारी, तलवारबाजी, राज–नीति – ये सभी विषय उसकी शिक्षा के अभिन्न अंग बने।
1852 में इस वीर बालिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ। यह विवाह केवल एक व्यक्तिगत मिलन नहीं था, अपितु इतिहास की एक महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका थी। ये झाँसी की रानी बनीं – लक्ष्मीबाई नाम से – तब एक नई परिणति शुरू हुई। 1853 में लक्ष्मीबाई विधवा हो गईं लेकिन, अपने स्वाभिमान और शौर्य को अलविदा नहीं कहा।
1853 में, जब ब्रिटिश ने झाँसी को हड़पने का निर्णय किया, तब रानी ने वह अमर घोषणा की – “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!” यह केवल एक नारा नहीं था, यह भारत–माता की गर्जना थी।
झाँसी की धरती की वीरांगना—एक रानी, हजारों प्रेरणाएं
1857 वह वर्ष, जब भारत की धरती में एक नई राष्ट्र–चेतना का जन्म हुआ। झाँसी के किले पर, लक्ष्मीबाई पुरुषों के वेश में, तलवार हाथ में लिए, अपनी महिला–सेना के साथ, एक साम्राज्य से अदम्य वीरता के साथ लड़ीं। किले की दीवार से 40 फुट की छलांग लगा दी इस वीरांगना नो – अपने बेटे को पीठ पर बांधकर, अपने घोड़े ‘बादल‘ पर सवार होकर। यह एक ऐसा दृश्य था, जिसमें मातृत्व और शौर्य का अद्भुत संगम था। कालपी, ग्वालियर में हर युद्ध में, हर मोर्चे पर, अंत तक लड़ते–लड़ते, 18 जून 1858 को, भारत–माता की यह पुत्री अपनी अंतिम साँस ले गई। परंतु उसका संदेश – “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी” – यह हमेशा भारत की सीमाओं पर हमारे सैनिकों और नागरिकों का सम्बल और शौर्य बढ़ाता रहेगा।

रानी लक्ष्मीबाई – यह नाम, भारत के इतिहास में एक ऐसा तारा है, जो कभी अस्त नहीं होगा। उनके जीवन के 29 वर्ष, उनके बलिदान के प्रत्येक बूंद, उनके शौर्य की प्रत्येक गाथा—ये सभी, भारतीय राष्ट्र के सीमा–सुरक्षा के लिए एक अनंत प्रेरणा हैं। –
माथे को फूल जैसा
अपना चढ़ा दे जो,
रुकती–सी दुनिया को
आगे बढ़ा दे जो,
मरना वही अच्छा है,
जीना वही अच्छा है।
वन्दे मातरम्!








