सीमाएं टूटीं तो टूटे मंदिर
– भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
सीमाएँ किसी राष्ट्र की संप्रभुता की परिभाषा हैं। ये केवल भौगोलिक विभाजन नहीं हैं, बल्कि देश के अस्तित्व, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। एक सुरक्षित सीमा के अभाव में राष्ट्र अपनी सार्वभौमिकता खो देता है। सीमा सुरक्षा में कोई समझौता राष्ट्रीय विकास को ही अवरुद्ध करता है। सीमा सुरक्षा अब केवल सीमा सुरक्षा बल का ही दायित्व नहीं रहा, बल्कि यह संपूर्ण राष्ट्र का सामूहिक उत्तरदायित्व है।महाभारत के शीर्षस्थ चरित्र भीष्म पितामह की मानें तो देश की सीमाएं माता के वस्त्रों के समान होती हैं और इनकी रक्षा करना संतान का परम कर्तव्य है।
अब बात मंदिर की … मंदिर क्या है? सम्पूर्ण सनातन ज्ञान-विज्ञान, आत्मा-परमात्मा के आध्यात्मिक आयाम, सभ्यता-संस्कृति, शिक्षा-शोध, संकट-निवारण, समृद्धि-व्यवस्था, शासन-अनुशासन, दिनचर्या-परिचर्या आदि-आदि के विराट तत्वों का सुगठित और सारगर्भित क्रियात्मक जीवंत रूपायन है मंदिर। इसलिए सनातन संस्कृति में मंदिर प्रबल आध्यात्मिक शक्ति केंद्र हैं। मंदिर में विग्रह का होना ब्रह्माण्ड की भौतिक सत्ता है और विग्रह में प्राण-प्रतिष्ठा अभौतिक सत्ता। परमात्मा अभौतिक हैं, जैसे हमारी आत्मा। विग्रह भौतिक है जैसे हमारा शरीर। भौतिक में अभौतिक की प्रतिष्ठा ही जीवन है। इसलिए मंदिर में ध्यान-केन्द्रण सहज हो पाता है और परमात्मा से आत्मा का सान्निध्य सरलतर होता है। सनातन संस्कृति में मंदिर ऐसा बहुआयामी संस्थान है जहाँ से न केवल सभ्यता-संस्कृति-ज्ञान-विज्ञान के पथ निर्मित होते रहते हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की भी समृद्धि हो पाती है। फलतः मंदिर सुख-शांति-समृद्धि का प्रसाद बाँटते रहते हैं। इसे ही कहते हैं ‘मंदिर संस्कृति’ और ‘मंदिर अर्थव्यवस्था’। जिस तरह गंगा की निर्मल धारा के पीछे विशाल हिमालय का निर्वाक व्यक्तित्व खड़ा है, वैसे ही मंदिर की वैज्ञानिकता के पीछे प्राचीन भारत की शोध-परम्परा खड़ी है। यही कारण है कि एक तरफ़ जहाँ मंदिर के भव्य भौतिक रूप-स्वरूप की रचना होती रही है, वहीं दूसरी तरफ़ प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा का विज्ञान भी सहस्राब्दियों पहले ही ज्ञात हो गया था। दोनों मिलकर सनातन धर्म को गुणवाण और ग्रहणीय बनाते हैं। इसलिए महाकवि महर्षि वाल्मीकि श्रीराम को कहते हैं – “रामो विग्रहवान् धर्म:” अर्थात् श्रीराम धर्म के मूर्त स्वरुप हैं। सच तो यह है कि जीवन के समस्त रचनात्मक आयामों को समेटकर एक स्वरूप दिया जाए तो वह मंदिर ही होगा जो नित्य आध्यात्मिक ऊंचाइयों को ऊर्जावान बनाता है, सामाजिक संवेदनाओं की सरिता को गति देता है, हर वर्ग और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सहारा एवं लाभ देता है; साथ ही कला-संस्कृति-सभ्यता-सुरक्षा-शिक्षा को विकसित एवं सर्वव्यापी बनाता है। इसलिए धर्मस्वरूप विग्रहवान श्रीराम राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में ‘साकेत’ महाकाव्य में कहते हैं –
“संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।”
ऐसे राम की भूमि पर सनातन संस्कृति के नाभिक मंदिर आख़िर क्यों ध्वस्त किए गए आक्रांताओं के हाथों? वस्तुतः जब धरातल पर आध्यात्मिकता का हनन कर दिया जाता है और केवल धन एवं स्त्री को यानी उनके शब्दों में ‘माल’ को जीवन का लक्ष्य बना लिया जाता है, तब ऐसा समुदाय विशेष दुर्दम्य पाशविकता का दानवराज बन जाता है। इस स्थिति का शब्दांकन राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने किया है –
“कौन केबल आत्मबल से जूझकर,
जीत सकता देह का संग्राम है,
पाशविकता खड्ग जो लेती उठा,
आत्मबल का एक वश चलता नहीं।”
ऐसे परिस्थितियों में धर्मप्राण-अध्यात्मप्रधान देश भारत की सीमाएँ टूटती हैं, पुरुष मारे जाते हैं, स्त्रियाँ लूटी जाती हैं, मंदिर तोड़े-लूटे-परिवर्तित किए जाते हैं और पाशविक सत्ता का जाल फैल जाता है।

AI इमेज राम मंदिर
अब प्रश्न उठता है कि मंदिरों से इनका विरोध क्यों? क्योंकि मंदिर प्रकाश है, आध्यात्मिक विकास का केंद्र है, शिक्षा की ठोस व्यवस्था है, नैतिकता की नाभि है एवं सर्वहितकारी अर्थव्यवस्था की धुरी है। वहीं मंदिर विरोधी केवल ‘माल’ को अपने भाल में जगह देने के कारण ‘तिमिर समुदाय’ बन जाते हैं। निराकार के चक्कर में साकार से भी चूक जाते हैं और बन बैठते हैं मंदिर का शत्रु – हर दृष्टि से, हर दिशा से और हर दशा में । इन्हें मालूम ही नहीं है कि पेट और पेट के नीचे के अंग ही सम्पूर्ण शरीर नहीं हैं, मनुष्य के पास ब्रह्माण्ड की चाबी और ज्ञान का केन्द्र मस्तिष्क भी है, मनुष्यता के मार्ग में खड़ी हर चट्टान को उलट देनेवाली दो सशक्त भुजाएं भी हैं, परस्त्री को माँ-बहन के रूप में देखने वाले दो नेत्र भी हैं और परहित के लिए दौड़ने वाले दो पैर भी हैं।
इतिहास की मानें तो ‘माल’-लोलुप समुदाय की पाशविकता से तब तक हार होती रही है जब तक उसका सामना शत्रुबोध के साथ नहीं किया गया। मुहम्मद बिन क़ासिम की सिपहसालारी में सन् 712 में सिंध पर आक्रमण हुआ। अनेक बार शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हिन्दू राजा दाहिर को अंतिम संघर्ष में उससे पराजित होना पड़ा – शत्रुओं का मूलोच्छेदन नहीं करने के कारण। तब भारत की सशक्त सीमाएँ सॆभवतः पहली बार टूटीं और तोड़ दिए गए भारत के सैकड़ों मंदिर। इसी तरह सन् 1000-1027 के बीच महमूद गजनवी ने भी कई बार भारत की सीमाएं तोड़ीं । सीमाएं टूटीं और अनेक हिंदू-जैन-बौद्ध मंदिर ध्वस्त कर दिए गए, लूटे गए, महिलाएँ ग़ुलाम बनाई गईं। सन् 1026 में सहस्रों साल पुराने गुजरात के सोमनाथ मंदिर को भी आक्रमणकारियों ने तोड़ा, लूटा, हत्याएँ कीं। लेकिन -‘माल’ की भूख का अंत नहीं हुआ। सीमा की सुरक्षा में कमी रही तो मुइज़ुद्दीन मुहम्मद गौरी ने बारहवीं शताब्दी में उत्तर भारत पर आक्रमण किया और अन्य मंदिरों के साथ साथ तोड़ दिया अजमेर का प्रसिद्ध शिव मंदिर – पृथ्वीराज चौहान का शिव मंदिर; और वही किया जो ‘माल’ के लिए मानवता का काल बनने वाला कर सकता है। सन् 1526 में जलालुद्दीन मुहम्मद बाबर ने भी भारत की पश्चिमोत्तर सीमा तोड़ी और दो साल के अंदर तोड़ दिया भारत की अयोध्या का प्रसिद्ध श्रीरामजन्मभूमि मंदिर; बनवाया वहीं पर बाबरी मस्जिद का ढांचा। जिस पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा के लिए चाणक्य ने मगध सम्राट घनानंद से अपमानित होना स्वीकार किया, महाशक्ति से सम्पन्न मगध सम्राट की तख्तापलट कर दी और मौर्य साम्राज्य की नींव डाली… वह भारत की सीमा मध्य काल में बार-बार टूटती रही । फलतः टूटते रहे मंदिर, लुटती रही संस्कृति। वह अयोध्या भी ध्वस्त हुई जिसके ऐश्वर्य की स्तुत्य चर्चा अथर्ववेद के दसवें मंडल में है–
“अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्यय: कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृत:।।”
अर्थात् आठ चक्राकार महल एवं नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की नगरी है। यहाँ हिरण्यमय यानी स्वर्णाभ कोष है, जो आनंद और प्रकाश से भरा हुआ है। मुग़ल सल्तनत के कालखण्ड में ही भारत का बड़ा भाग आक्रमणकारियों के अधीन हो गया । लंबे कालखंड के लिए सीमाओं के भीतर ही शत्रु समा गए। तब बिना सीमा तोड़े ही मंदिर ध्वस्त किए जाते रहे। उन आक्रमणकारियों और उनके वंसजों ने सीमाएँ तोड़कर नहीं, सिंहासन पर बैठकर ही 40 हज़ार से ज़्यादा मंदिर ध्वस्त कर दिए। सन् 1947 तक पाकिस्तान में 428 मंदिर थे। वहां अब बचे हैं केवल 22 मंदिर –सिंध प्रांत में 11 मंदिर, पंजाब प्रांत में 04 मंदिर, पख्तूनख्वा में 04 मंदिर और बलूचिस्तान में 03 मंदिर।
सत्ता-सिंहासन पर सवार हो गए आक्रमणकारियों को लम्बा समय मिल जाने के कारण वे भारत की काया में एक महारोग की तरह बैठ गए – जिसका इलाज तो भारतीयों द्वारा चलता रहा, लेकिन उससे सदियों मुक्ति नहीं मिली। रक्तबीज से युद्ध होता रहा, मगर हज़ार साल में भी मूलध्वंसक औषधियाँ नहीं बन पाईं। राम करें- चिकित्सा की दूसरी पद्धति की आवश्यकता न पड़े जो श्रीराम को लंका में अपनानी पड़ी थी, या श्रीकृष्ण ने जिसका सहारा कुरुक्षेत्र में लिया था। भारत स्वतंत्र हुआ तो समस्या और बढ़ गई । भारत के दो टुकड़े हो गए, लेकिन इस समस्या के टुकड़े-टुकड़े नहीं हुए। हाँ, स्वतंत्रता के बाद सीमाएं विधितः सुरक्षित हुईं तो गुजरात में सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण हो गया। आज सीमाएं लगभग पूरी तरह सुरक्षित हैं तो श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की भव्यता साकार हो गई।
निष्कर्षतःसीमाएं तभी सुरक्षित होती हैं जब देश मज़बूत होता है, देशवासियों के मानस में शत्रुबोध की समझ सजग रहती हैं, सरकारें दायित्व का निर्वहन करती हैं और सुरक्षा बलों के चक्षु जाग्रत रहते हैं। जब सेना बलिष्ठ होती है – तब सीमा-सुरक्षा चाक-चौबंद रहती है। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ लिखते हैं–
“हिंस्र पशु जब घेर लेते हैं उसे,
काम आता है बलिष्ठ शरीर ही।
और तू कहता मनोबल है जिसे,
शस्त्र हो सकता नहीं वह देह का;
श्रीमद्भागवत गीता का 700वां यानी अन्तिम श्लोक है–
“यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।”








