वन्दे मातरम् : विश्व-इतिहास में एक अनूठा गीत
बंकिम चन्द्र चटर्जी की अमर रचना का वैश्विक महत्व
जब हम विश्व के इतिहास में झाँकते हैं, तब हमें अनेक राष्ट्रगीत, देशभक्ति-गीत और क्रांतिकारी गान मिलते हैं। फ्रांस का La Marseillaise, अमेरिका का The Star-Spangled Banner, ब्रिटेन का God Save the King – ये सब अपने-अपने देशों की गौरव-गाथाएँ हैं। परंतु जब हम बंकिम चन्द्र चटर्जी की रचना वन्दे मातरम् की बात करते हैं, तब हम केवल एक राष्ट्रगीत की नहीं, बल्कि एक अद्वितीय साहित्यिक, काव्यात्मक और राष्ट्रीय चेतना की महान कृति की बात करते हैं।
वन्दे मातरम् विश्व के इतिहास में एकमात्र ऐसा गीत है, जिसने साहित्य को क्रांति में, काव्य को संघर्ष में, और भक्ति को राष्ट्रवाद में परिणत कर दिया। यह केवल एक गीत नहीं है। यह है एक युग-परिवर्तक घोषणा, एक राष्ट्र-चेतना का आह्वान, एक मातृभूमि की पुकार जिसने करोड़ों लोगों को स्वतंत्रता के संघर्ष में कूद पड़ने के लिए प्रेरित किया।
कैसे यह गीत साहित्य, काव्यकला, राष्ट्रभाव, शिल्प और उद्बोधन की दृष्टि से विश्व-इतिहास में एक अनूठा, अतुलनीय और अद्वितीय स्थान रखता है। कुछ तथ्य द्रष्टव्य हैः
उपन्यास के अंतर्गत क्रातिकारी गीतः
विश्व साहित्य में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, जहाँ एक उपन्यास के भीतर लिखा गया एक गीत पूरे राष्ट्र का प्रतीक बन गया हो। बंकिम चन्द्र ने 1882 में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में इस गीत को समाहित किया था। उपन्यास की कहानी 18वीं सदी के संन्यासी विद्रोह और 1770 के भयानक बंगाल अकाल पर आधारित है।
उपन्यास में, एक संन्यासी समूह जिन्हें संतान (बच्चे) कहा जाता है – अपनी मातृभूमि को देवी के रूप में पूजते हैं। वे अपने मंदिर में माता की तीन मूर्तियाँ रखते हैं:
I. माता जो थीं – अतीत में गौरवान्वित
II. माता जो हैं – वर्तमान में पीड़ित
III. माता जो होंगी – भविष्य में मुक्त और विजयी
और इन संन्यासियों का युद्ध-घोष, उनकी प्रार्थना, उनका संकल्प – यही था वन्दे मातरम्। यह गीत केवल एक काव्य नहीं था; यह था “धर्म और राजनीति का अद्भुत संगम” – जहाँ देशभक्ति को धार्मिक पवित्रता का स्तर मिल गया।
साहित्यिक क्रांति का जन्म
इस गीत ने भारतीय साहित्य में एक नई परंपरा स्थापित की — राष्ट्र-भक्ति का साहित्यिकीकरण। पहली बार, एक लेखक ने अपनी रचना में राजनीतिक संदेश को आध्यात्मिक भक्ति के साथ इतनी गहराई से मिश्रित किया कि पढ़ने वाले का हृदय केवल साहित्य का आनंद नहीं लेता, बल्कि राष्ट्र-सेवा का संकल्प भी ले लेता है।
संस्कृत और बंगला का अद्भुत समन्वय
वन्दे मातरम् की भाषा-शैली विश्व-साहित्य में अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। बंकिम चन्द्र ने संस्कृत के व्याकरणिक वैभव को बंगला की सहज, प्रवाहमान लय के साथ मिलाकर एक ऐसी भाषा रची, जिसे हम संस्कृतायित बंगला कहते हैं। यह केवल एक भाषागत चुनाव नहीं था। यह था भारत के अतीत और वर्तमान का संगम। संस्कृत है भारत की प्राचीन, वैदिक आत्मा का प्रतीक; बंगला है उसकी समकालीन, जीवंत चेतना का प्रतिनिधि। इन दोनों का मिलन ही वन्दे मातरम् को काल और स्थान से परे एक शाश्वत गीत बनाता है।
छंद और लय की संगीतात्मकता
गीत में प्रयुक्त त्रिपदी मात्रा-छंद इसे किसी भी राग में गाने योग्य बनाता है। खेत्रनाथ मुखोपाध्याय ने इसे मल्हार राग में संगीतबद्ध किया था – वह राग जो वर्षा की ऋतु में, जल की रिमझिम में, पृथ्वी की उर्वरता का गीत गाता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जब 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया, तब उपस्थित हजारों लोगों के हृदय में यह गीत अग्नि की तरह उतर गया।
शब्द-चयन की दिव्यता
प्रत्येक शब्द में एक गहरा अर्थ निहित है:
सुजलां सुफलां मलयजशीतलां
शस्यशामलां मातरम्।
सुजल (पवित्र जल), सुफल (समृद्ध फल), मलयजशीतल (मलय पर्वत की शीतल हवा), शस्यशामल (हरीतिमा से ढके खेत) – ये सब शब्द माता-भूमि के रूप-सौंदर्य का वर्णन करते हैं। यह केवल वर्णन नहीं है; यह है शृंगार रस का अद्भुत प्रयोग, जहाँ प्रेम है, लेकिन यह प्रेमिका का प्रेम नहीं, बल्कि माता के प्रति पुत्र की भक्ति है।
राष्ट्रभाव का उद्घोषः शृंगार से वीर रस तक की यात्रा
गीत का दूसरा छंद जब आता है, तो पूरा स्वर बदल जाता है:
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले।
करोड़ों कंठ, करोड़ों भुजाएँ, तीक्ष्ण हथियार – यहाँ वीर रस का विस्फोट होता है। माता केवल सुंदर नहीं है; वह शक्तिशाली, रक्षक और विजयिनी है।
“अबला केन मा एत बले?” – माता अबला क्यों है? यह प्रश्न ही एक वीर चेतना का आह्वान है। यह कह रहा है – हे भारत के वीरों, अपनी माता को असहाय न रहने दो। उठो, संगठित हो, और अपनी माता की मुक्ति के लिए संघर्ष करो।
देवी का त्रिमुखी स्वरूप – शक्ति, समृद्धि और ज्ञान
तृतीय छंद में माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती – तीनों देवियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है:
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिणी।
यह है भारत की त्रिमुखी शक्ति – रक्षा, पोषण और ज्ञान। विश्व में कोई अन्य राष्ट्रगीत नहीं है, जो अपने देश को इतने गहन, आध्यात्मिक और दार्शनिक रूप में प्रस्तुत करता हो।
शिल्प की उत्कृष्टता – अलंकार और काव्य-सौष्ठव
रूपक अलंकार का अद्भुत प्रयोग
“त्वं हि दुर्गा” – तुम ही दुर्गा हो। यहाँ यह नहीं कहा गया कि भारत दुर्गा के समान है। बल्कि, भारत ही दुर्गा है। यह है रूपक अलंकार का सर्वोत्तम उदाहरण, जहाँ उपमेय और उपमान एक हो जाते हैं।
अनुप्रास की संगीतमयी ध्वनि
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले।
“क” की ध्वनि बार-बार। यह केवल सौंदर्य नहीं है; यह है एक संगीतात्मक गति है जो पाठक के हृदय में एक तरंग उत्पन्न करती है। यह अनुप्रास अलंकार का ऐसा प्रयोग है, जो गीत को केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि गाने की रचना बनाता है।
मंत्र की शक्ति
‘वन्दे मातरम्’ को बार-बार दोहराया जाता है। यह केवल एक काव्य-युक्ति नहीं है। यह है एक मंत्र की तरह काम करना – प्रत्येक बार दोहराव के साथ, हृदय में एक और गहरा स्पंदन होता है, एक और गहरी समर्पण की भावना उत्पन्न होती है।
उद्बोधन की शक्ति – स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र
1896 से 1947 तक की महान य़ात्रा
1896 में जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में गाया, तब से यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध-घोष बन गया। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में, इसने आग की तरह पूरे बंगाल को झकझोर दिया। प्रभात फेरियों में, राजनीतिक सभाओं में, जेलों में, फाँसी के तख्ते पर – हर जगह यही गीत गूंजता था। मातंगिनी हाजरा ने अपनी अंतिम साँस में इसी गीत को गाया। भगत सिंह ने जेल में इसी गीत को लिखा। सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आज़ाद हिंद फौज को इसी गीत से प्रेरित किया। अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। इसे गाने पर कारावास की सजा थी। लेकिन क्या प्रतिबंध किसी गीत को मार सकता है? नहीं। यह गीत और भी मुखर हो गया, और भी शक्तिशाली हो गया।
2003 में विश्व-स्तरीय सम्मान
2003 में, BBC ने विश्व के सबसे महान गीतों की एक सूची जारी की। वन्दे मातरम् को दूसरे स्थान पर रखा गया – विश्व के सबसे प्रेरणादायक और प्रभावशाली गीतों में से एक। यह भारत के लिए गौरव का क्षण था। यह इस बात का प्रमाण है कि वन्दे मातरम् केवल भारत का गीत नहीं है; यह मानवता के स्वतंत्रता-संघर्ष का एक वैश्विक प्रतीक है।
अन्य राष्ट्रगीतों से तुलना
फ्रांस का La Marseillaise – यह युद्ध का गीत है, जो सैनिकों को लड़ने के लिए प्रेरित करता है। अमेरिका का The Star-Spangled Banner – यह राष्ट्रीय ध्वज की महिमा का गीत है। ब्रिटेन का God Save the King – यह राजा की सुरक्षा की प्रार्थना है।
लेकिन वन्दे मातरम् – यह केवल युद्ध का गीत नहीं है, यह केवल ध्वज का गीत नहीं है, यह केवल राजा का गीत नहीं है। यह है माता-भूमि के प्रति पुत्र की भक्ति, राष्ट्र के प्रति नागरिक का समर्पण, और स्वतंत्रता के प्रति मनुष्य की अदम्य आकांक्षा का गीत।
साहित्य से राजनीति तक का सेतु
विश्व में कोई अन्य उदाहरण नहीं है, जहाँ एक उपन्यास का गीत इतना शक्तिशाली बन गया हो कि वह पूरे राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाए। यह वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता है – यह साहित्य और राजनीति के बीच का सेतु है।
समकालीन प्रासंगिकता – 150 वर्षों का सफर
1875 से 2025 तक की अमरताः आज, 150 वर्षों के बाद भी, वन्दे मातरम् अपनी प्रासंगिकता को बरकरार रख रहा है। 2025 में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया, तब विश्व भर में – कनाडा से न्यूज़ीलैंड तक, चिली से पेरू तक – भारतीय दूतावासों ने इसे सामूहिक रूप से गाया। यह केवल एक ऐतिहासिक गीत नहीं रह गया। यह है एक जीवंत, धड़कता हुआ संकल्प – जो आज भी प्रत्येक भारतीय को कहता है: “तुम्हारी माता-भूमि तुम्हें पुकार रही है। तुम शक्ति हो, विद्या हो, धर्म हो। देश की सेवा ही राष्ट्रधर्म है।”
वैश्विक एकता का प्रतीक
जब 2025 में विश्व के विभिन्न देशों में वन्दे मातरम् गाया गया, तो वह केवल भारत का गीत नहीं रह गया। वह बन गया मानवता के मुक्ति-संघर्ष का एक सार्वभौमिक गीत।
एक अमर विरासत
150 वर्षों के बाद भी, बंकिम चन्द्र चटर्जी की रचना वन्दे मातरम् विश्व के इतिहास में एक अनूठा, अतुलनीय और अद्वितीय गीत बना हुआ है। यह केवल एक गीत नहीं है। यह है: साहित्य की दृष्टि से एक उपन्यास से निकला हुआ, पूरे राष्ट्र का प्रतीक बनने वाला अद्वितीय गीत, काव्यकला की दृष्टि से संस्कृत और बंगला के संगम से निर्मित, छंद और लय से परिपूर्ण, एक संगीतमय रचना, राष्ट्रभाव की दृष्टि से शृंगार और वीर रस का अद्भुत मिश्रण जो माता-भूमि के प्रति पुत्र की भक्ति को राष्ट्र-सेवा का धर्म बना देता है, शिल्प की दृष्टि से रूपक, अनुप्रास और पुनरुक्ति प्रकाश जैसे अलंकारों का सुंदर प्रयोग, और उद्बोधन की दृष्टि से स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र जिसने करोड़ों लोगों को प्रेरित किया। जब शब्दों का संयोजन इतना सुंदर हो, इतना गहरा हो, इतना प्रभावशाली हो कि वह न केवल मन को छुए, बल्कि देश के भविष्य को सदा के लिए परिवर्तित कर दे, तब वह काव्य नहीं, वह इतिहास बन जाता है। वन्दे मातरम् — ये दो शब्द भारत की आत्मा की चिरंतन पुकार हैं। यह है विश्व के इतिहास में एक अनूठा, अमर और अतुलनीय गीत।
वन्दे मातरम्।








