जाग्रत सीमा, उज्ज्वल राष्ट्र: सुरक्षित सीमा, सजग नागरिक
भारत की छब्बीस हज़ार दो सौ निन्यानवे दशमलव आठ किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा केवल मानचित्र पर उठी कोई सूखी रेखा नहीं, वह तो मानो माता की देह पर स्नेह से डला हुआ एक वस्त्र है – जैसे माँ अपने आँचल से बालक को ढँक लेती है, वैसे ही यह रेखा हम सबको ओढ़ाती और बचाती रहती है। इस वस्त्र की सुरक्षा में पीढ़ियाँ अपनी कृतज्ञता निर्वाह करती आई हैं – किंतु कृतज्ञता का स्वर यहाँ मौन है, वह सैनिकों के पैरों की थाप में, उनकी आँखों की चमक में, और उनके जागरण में प्रतिध्वनित होता है। सीमा पर खड़ा प्रहरी केवल नौकरी करने वाला मनुष्य नहीं – वह राष्ट्र-देवता के मर्म की पूजा-करता है; उसके हाथ की टॉर्च आरती की लौ है, उसके कदमों की चाल आरती का घुमाव, और उसकी श्वासों में माँ की आराधना का निनाद।
सन् 1985 में, जैसलमेर की स्वर्ण-मृदा पर रामनवमी के पावन उषःकाल में, जब आकाश में शंखनाद-सी रश्मियाँ फैल रही थीं, सीमा जागरण मंच का जन्म हुआ – जैसे किसी दीये ने अपने भीतर से एक और दीया जलाकर दूर तक उजाला भेज दिया हो। यह कोई संगठन मात्र नहीं, मन की आँखों में जलती वह लौ है, जो भारत-माता के प्रत्येक पुत्र-पुत्री के हृदय में अपने देश की सहज अनुकम्पा, निष्ठा और निष्काम कर्म का स्फुलिंग धर देती है। माँ की गोद खाली नहीं होती – यह मंच उसी गोद का विस्तार है, जो सीमाओं तक पहुँचकर भी घर के आँगन जैसी अपनवट रच देता है।
चालीस वर्ष – यह समय नहीं, यह मातृस्नेह का संचय है; यह दिन-रात की कुल जमा नहीं, यह तप के तंतु हैं, जिनमें राष्ट्र का वस्त्र बुना गया है। जब कोई राष्ट्र अपनी सीमाओं को पहचानता है, वह अपनी आत्मा को पहचान लेता है; जब वह सीमाओं का मान रखता है, वह अपनी संप्रभुता की थिरकन सुन लेता है। सीमा जागरण मंच ने यही सरल सत्य, बिना शोर, बिना आडंबर, जन-जन तक पहुँचाया कि सुरक्षित सीमाएँ देश की देह भर नहीं हैं, वे उसके तेज की ऊर्जा हैं, उसके राष्ट्रचक्र की धुरी हैं, उसके गौरव का ध्वनि-पात्र हैं। जहाँ सीमा सुरक्षित है, वहाँ किसान का हल निडर है, विद्यार्थी का स्वप्न उज्ज्वल है, और माँ की नींद गहरी है; जहाँ सीमा दृढ़ है, वहीं नागरिक का मन निर्मल है, और शासन का चित्त समान।
सीमा-रेखा रेत पर खिंची लकीर नहीं – वह स्मृतियों का सूत है, जो सिंधु से हिमालय तक, कच्छ की हवा से नीती की बर्फ तक, तनोट के आराध्य से नाडाबेट की शौर्य-धूल तक, सबको एक गले के हार में पिरो देता है। इस हार की मोतियों में आप और हम भी हैं – हमारी साँसें, हमारे संकल्प, हमारी सूझ-बूझ और हमारी सेवा – क्योंकि सीमा की आरती केवल जवान नहीं उतारते, जन भी उतारते हैं: कोई शब्द से, कोई कर्म से, कोई संसाधन से, और कोई अपने अटल विश्वास से।
आज जब भविष्य का घड़ा कल की धार पर रखा है, तब आवश्यक है कि हम सीमाओं को आँकड़ों में नहीं, आचार में जिएँ, जागरूकता को सूचना नहीं, संस्कार बनाएँ। देश-रक्षा कोई अलग किया जाने वाला कर्मकांड नहीं, यह तो जीवन का सुवास है – रोज़ की रोटी जैसा, रोज़ की प्रार्थना जैसा। सीमा जागरण मंच की साधना इसी सहज बोध की दीक्षा है – जो कहती है: सीमा की सुरक्षा दूर कहीं चल रही पहरेदारी नहीं, घर के भीतर जलती वह ज्योति है, जिससे पूरा घर आलोकित रहता है। और जहाँ घर में उजाला है, वहाँ राष्ट्र जाग्रत है।








