“जम्मू-कश्मीर की सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता की कुंजी: जनसांख्यिकीय संतुलन”- अश्विनी कुमार च्रोंगू
(जम्मू-कश्मीर का प्रश्न केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की सीमा-सुरक्षा और सांस्कृतिक अखंडता से जुड़ा मूल मुद्दा है। अश्विनी कुमार च्रोंगू द्वारा प्रस्तुत यह विचारपुंज बताता है कि घाटी में जनसांख्यिकीय असंतुलन ने न केवल कश्मीरी पंडित समुदाय के विस्थापन को जन्म दिया, बल्कि उस आतंकवाद को भी पोषित किया जिसने सीमावर्ती क्षेत्रों की शांति को दशकों तक बंधक बनाए रखा। ऐसे समय में जब देश की सीमाओं पर सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी भौगोलिक सुरक्षा। यह चिंतन भारत की सीमा-सुरक्षा के लिए नीति-निर्माण और राष्ट्रीय विमर्श – दोनों स्तरों पर दिशा-दर्शक दस्तावेज़ के रूप में महत्त्वपूर्ण बन जाता है।)
जम्मू-कश्मीर के ताजा सामाजिक और राजनीतिक हालात पर केन्द्रित एक वैश्विक वेबिनार में राज्य के भीतर और बाहर के हालातों पर गंभीर चिंता जताई गई। चर्चा का सबसे बड़ा केन्द्र रहा – विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय और उस पर पड़े लगातार उपेक्षा के साये का सवाल। वेबिनार में यह बात गूंजती रही कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ी राष्ट्रीय कथाओं को सही परिप्रेक्ष्य में रखने की जरूरत है, ताकि एक संतुलित और सकारात्मक बहस को जन्म दिया जा सके। बैठक में वीरेंद्र रैना (अध्यक्ष, पनुन कश्मीर), वरिष्ठ नेता उत्पल कौल, उपिंदर कौल, कमल बगाटी, राजिंदर कौल, पी.के. भान, के.के. कौल, अशोक च्रोंगू, राजेश कौल, के.के. बुझेव, उत्तम धर, समीम भट्ट और विमल पंडिता उपस्थित रहे। वरिष्ठ बीजेपी और कश्मीरी पंडित नेता अश्विनी कुमार च्रोंगू ने “जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय संतुलन” पर प्रस्तुति दी, जिसने पूरी चर्चा की दिशा तय की। इसके मुख्य बिन्दु अवश्यमेव द्रष्टव्य हैं –

पाकिस्तान और पड़ोसी क्षेत्रों में शिया समुदाय पर हमलों से बनी दहशत
वेबिनार में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई कि पाकिस्तान, कब्जे वाले कश्मीर और अफगानिस्तान–चीन–ईरान की सीमाओं तक फैले इलाकों में शिया मुसलमानों पर हो रहे लगातार हमले केवल धार्मिक असहिष्णुता नहीं, बल्कि खतरनाक भू-राजनीतिक संकेत हैं। इन घटनाओं की गूंज अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तक सुनाई दे रही है – विरोध और आक्रोश की आग वहां भी दहक रही है।
विस्थापित समुदाय अब भी न्याय से दूर
वक्ताओं ने माना कि तीन दशक बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडित समुदाय अभी तक अपने वतन से लौट पाने की उम्मीद में बिखरा हुआ है। जरूरत इस बात की है कि सरकार और गैर-सरकारी मंचों दोनों पर उनकी आवाज़ बुलंद की जाए, ताकि उन्हें वह न्याय मिल सके जो उनसे बहुत पहले छीना गया।
राज्यत्व और सामान्य स्थिति की बहस
कुछ राजनीतिक दल लगातार राज्यत्व की बहाली का मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि शांति और सामान्य स्थिति पिछले चालीस वर्षों से आतंकवाद की गिरफ्त में बंधी रही है। नेताओं के बयान साफ बताते हैं कि राज्य का दर्जा तभी लौटेगा जब घाटी में वास्तविक सामान्य स्थिति स्थापित होगी। वह तभी संभव है जब विस्थापित पंडित समुदाय अपनी शर्तों पर सुरक्षित लौट सके।
370 के बाद भी अधूरा रहा जनसांख्यिकीय विमर्श
अश्विनी कुमार च्रोंगू ने अपने संबोधन में कहा कि जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय चुनौती अब वास्तविक रूप में सामने खड़ी है। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35A की समाप्ति के बाद संवैधानिक और प्रशासनिक कदमों की अपेक्षित शृंखला नहीं बढ़ी। डोमिसाइल कानून तो बने, पर उसके बाद का राजनीतिक अनुगमन गायब रहा। उन्होंने कहा कि यह देखा गया है कि जम्मू-कश्मीर के लोग दूसरे राज्यों में जाकर खुले तौर पर संपत्तियां खरीदते हैं, कॉलोनियां बसाते हैं, कारोबारी ढांचे खड़े करते हैं – किन्तु इसके उलट कोई प्रक्रिया नहीं है। यह रिश्ता दोतरफा होना चाहिए ताकि जनसांख्यिकीय संतुलन स्थायी रूप से बना रहे। च्रोंगू ने स्पष्ट कहा, “इस्लामी आतंकवाद की जड़ें घाटी में इसलिए फैल सकीं क्योंकि जनसांख्यिकीय असंतुलन ने उसे उर्वर जमीन दी। विस्थापन और जातीय सफाया इसके ही परिणाम थे।” उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन को भी उद्धृत किया जिसमें देशभर में जनसंख्या असंतुलन को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा गया था। च्रोंगू ने कहा, “जहां भी संख्यात्मक असंतुलन होता है, वहां राष्ट्र की स्थायी सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगता है। इसीलिए, जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय विमर्श को तुरंत राष्ट्रीय बहस के केन्द्रीय विषय के रूप में उठाया जाना चाहिए। हमें स्वयं इस दिशा में पहल करनी चाहिए।”








