भारत के लिए जैव–सुरक्षा के वैश्विक सबक
डॉ. जयदेव पारीदा
कल्पना कीजिए कि एक सुबह आपके सभी डिजिटल उपकरणों पर एक साथ अलर्ट आने लगते हैं – भारत के पूर्वी क्षेत्र में बर्ड फ्लू के प्रसार की चेतावनी, केरल में निपाह वायरस का प्रकोप, और उत्तर भारत में आक्रामक प्रजातियों की उपस्थिति, जो करोड़ों नागरिकों के जीवन एवं आजीविका के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। अगले ही क्षण एक समाचार फ्लैश होता है कि पड़ोसी देशों में कोविड-19 पुनः उभर रहा है, जिससे संभावित लॉकडाउन की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं, वहीं पश्चिम एशिया और यूरोप में चल रहे संघर्ष परमाणु तनाव की ओर बढ़ सकते हैं। इसी बीच एक नकली डिजिटल गिरफ्तारी की घटना, जिसमें ‘स्पाइडरमैन’ के नाम पर एक करोड़ रुपये की ठगी हो जाती है, यह बताती है कि जैव-सुरक्षा अब केवल वैज्ञानिक या तकनीकी अवधारणा नहीं रही, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न आयाम बन चुकी है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जैव सुरक्षा एक अत्यंत जटिल, अंतर्संबंधित और बहुआयामी अवधारणा के रूप में उभरी है, जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, स्वास्थ्य-संबंधी, पर्यावरणीय तथा सुरक्षा संबंधी विविध पहलू समाहित हैं।
जैव सुरक्षा का वैश्विक विमर्श और भारत की स्थिति
महामारी के उपरांत भारत सहित समूचे विश्व में जैव-सुरक्षा को सार्वजनिक स्वास्थ्य और विज्ञान-नीति के एक अनिवार्य भाग के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। जैव-सुरक्षा की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है, फिर भी जैव विविधता पर सम्मेलन (CBD), कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जैविक और विषैली हथियार सम्मेलन (BTWC) तथा नागोया प्रोटोकॉल जैसे बहुपक्षीय संधि-ढांचे इस क्षेत्र में वैश्विक नीति निर्धारण को आकार दे रहे हैं। वर्तमान समय में जैव सुरक्षा संबंधी विमर्श केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह जैव प्रौद्योगिकी, जैव आतंकवाद, जैव निर्माण, सिंथेटिक जीवविज्ञान, आनुवंशिक इंजीनियरिंग और जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के संभावित दुरुपयोग जैसे गहन जोखिमों को भी संबोधित करता है।

प्रमुख वैश्विक प्रयास
संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूरोपीय संघ तथा नाटो जैव सुरक्षा रणनीतियों के प्रमुख वैश्विक सूत्रधार बनकर उभरे हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम, 2022 के अंतर्गत उदीयमान जैव प्रौद्योगिकी पर राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (NSCEB) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य जैव प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्संधान में नीति-निर्धारण हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करना है। इसी प्रकार, अप्रैल 2024 में NATO ने अपनी पहली जैव प्रौद्योगिकी एवं मानव संवर्धन प्रौद्योगिकी रणनीति अंगीकृत की, जिसमें आनुवंशिक अभियांत्रिकी, सिंथेटिक बायोलॉजी एवं न्यूरो-प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा रक्षा-सामर्थ्य संवर्धन और सदस्य राष्ट्रों की सामूहिक सुरक्षा हेतु आत्मविश्वास निर्माण तंत्रों पर बल दिया गया।
ऑस्ट्रेलिया द्वारा प्रस्तुत कॉमनवेल्थ बायोसिक्योरिटी 2030 रणनीति भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने हेतु कृषि, मत्स्य और वानिकी जैसे क्षेत्रों से अंतर-संस्थागत सहयोग का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके अतिरिक्त, 1985 में प्रारंभ ऑस्ट्रेलिया समूह जैविक और रासायनिक हथियारों पर निर्यात नियंत्रण के संदर्भ में एक अनौपचारिक किन्तु प्रभावशाली वैश्विक मंच रहा है। यूनाइटेड किंगडम ने यूके जैविक रणनीति के अंतर्गत बायोसिक्योरिटी लीडरशिप काउंसिल (BLC) की स्थापना की है, जो महामारी तैयारी, जैव सुरक्षा और नवाचार की निगरानी करता है। यूरोपीय संघ स्तर पर CBRN (रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर) कार्य योजना 2013–14 के अंतर्गत यूरोपीय जैव सुरक्षा मंच की स्थापना की गई। यद्यपि यह मंच 2014 के बाद अपेक्षाकृत निष्क्रिय रहा है, फिर भी जैव आतंकवाद पुस्तिका और जैव जोखिमों से निपटने के लिए तैयार टूलकिट जैसे प्रयासों से जैव सुरक्षा को संस्थागत रूप प्रदान किया गया है।
भारत का दृष्टिकोण और आवश्यक सुधार
भारत में जैव सुरक्षा संबंधी ढाँचा अभी भी विकासशील अवस्था में है। हालाँकि जैव सुरक्षा स्तर (BSL) प्रयोगशालाओं के माध्यम से जैविक कारकों के सुरक्षित उपयोग और नियंत्रण के लिए नियामक व्यवस्था विद्यमान है, परन्तु जैव युद्ध और जैविक हथियारों से निपटने की दृष्टि से भारत की क्षमता सीमित रही है। राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विकास रणनीति (2021-2025) में कोविड-19 के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रित अनुसंधान को प्राथमिकता दी गई है, जो कैंसर, तपेदिक और मलेरिया जैसी बीमारियों पर केंद्रित है। तथापि, जैव रक्षा और प्रतिरोधात्मक क्षमताओं की कमी इस बात का संकेत देती है कि वैज्ञानिक विशेषज्ञता और नीति-निर्माण के मध्य आवश्यक समन्वय अभी भी अधूरा है।
आगे की राह वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए भारत को एक समग्र जैव सुरक्षा नीति ढाँचे की आवश्यकता है। इसके लिए एक समर्पित नोडल संस्था की स्थापना आवश्यक है, जो जैव प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा के संगम पर कार्य कर सके। NATO और अमेरिका के मॉडल से सीख लेते हुए भारत को अनुसंधान, जोखिम मूल्यांकन और बहु-एजेंसी समन्वय को संस्थागत रूप देने की दिशा में पहल करनी चाहिए। QUAD जैसे बहुपक्षीय मंचों का उपयोग जैव सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श हेतु किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जनरेटिव AI के बढ़ते उपयोग से उत्पन्न नई चुनौतियों से निपटने हेतु भी एक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
जैव सुरक्षा अब केवल एक वैज्ञानिक अवधारणा न होकर, राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा का एक अपरिहार्य घटक बन चुकी है। भारत को इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु तत्पर होना चाहिए।








