सीमाओं पर जीवन की लौ: वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (VVP) का पुनरावलोकन
लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि.), राज्यपाल, उत्तराखण्ड
“सीमा पर सूरज सबसे पहले उगता है, और वहीं से भारत हर रोज़ नया स्वप्न देखता है।” सीमाएँ किसी भी राष्ट्र की आँखें होती हैं – सजग, संघर्षशील और सर्द हवाओं में भी प्राणवान। एक सैनिक के रूप में चार दशक बिताने के बाद मैंने जाना कि सीमा कोई निर्जीव रेखा नहीं है, वह साँस लेती है, और उसकी साँसें सीमांत गाँवों में बसने वाले लोग हैं। एक सैनिक रहते हुए मैंने सीमाओं की भुरभुरी बर्फ के नीचे छुपी अडिग इच्छाशक्ति देखी, अब उत्तराखण्ड का राज्यपाल होने के नाते मैं उन्हीं सीमाओं के गाँवों में जीवन की लौ जलते देख रहा हूँ। यह आलेख वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के पुनरावलोकन के बहाने सीमाओं की आत्मा को छूने का प्रयास है, उस भारत को समझने का प्रयास, जो सीमांत गाँवों में बसता है।
भारत की सीमाएँ: इतिहास और सामरिक चेतना
हमारी सीमाएँ दुनिया की सबसे दुर्गम, ऊँची और मौसम की दृष्टि से कठोर सीमाएँ हैं। हिमालय की हिम-चादर से लिपटी, वीरानियों में खड़ी हमारी चौकियाँ केवल सैनिकों के भरोसे नहीं – सीमांत गाँवों के लोगों की उपस्थिति से सुरक्षित रहती हैं। भारत की लगभग 15,106 किलोमीटर लंबी स्थलीय सीमा है, जो 17 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से होकर गुज़रती है। इनमें से कई हिस्से – जैसे जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल, उत्तराखण्ड, सिक्किम दुर्गम पर्वतीय भूभाग हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी सीमाएँ निर्जन हुईं, दुश्मनों ने भीतर आने का रास्ता तलाशा। 1962 के भारत-चीन युद्ध ने हमें यह सिखाया कि सीमा चौकियों के साथ-साथ सीमांत गाँवों में भी जीवन टिकाना ज़रूरी है। 1965, 1971 और कारगिल ने भी यही पाठ दोहराया। तब से सीमांत इलाकों को आबाद रखना हमारी सामरिक रणनीति का हिस्सा बन गया। सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP) ने सीमावर्ती इलाकों के विकास का बीड़ा उठाया, परंतु पहाड़ के जटिल भूगोल और मौसम ने कई बार उसे अधूरा ही रखा।
सीमांत गाँव: सैनिक के बाद दूसरी रक्षा पंक्ति
जब बर्फीली चोटियों पर चौकियाँ बनती हैं तो सैनिकों के पीछे सबसे बड़ा सहारा सीमांत गाँव होते हैं। ये गाँव सैनिकों के लिए जानकारी के स्रोत हैं, रसद पहुँचाने वाले हैं और आपसी भरोसे की कड़ी हैं। अपने कश्मीर के कार्यकाल के दौरान मैंने कई बार स्थानीय चरवाहों से दुश्मन की गतिविधियों की सूचनाएँ सुनीं। सीमांत लोग जानते हैं कि कौन कहाँ से भीतर आ सकता है, उनका ज्ञान किसी भी उपग्रह से तेज़ है।
सीमाओं पर पलायन: एक नासूर
उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए पलायन वर्षों तक एक पीड़ा रही है। अनुमान है कि पिछले तीन दशकों में उत्तराखण्ड के 1,000 से अधिक गाँव या तो आंशिक रूप से खाली हुए या पूरी तरह वीरान हो चुके हैं। खाली गाँव सामरिक दृष्टि से बड़ा ख़तरा हैं; जब कोई नहीं होता, तो केवल बर्फ नहीं गिरती, भीतर सेंध लगाने की मंशाएँ भी पनपती हैं। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम इसी दर्द का इलाज करने आया है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम: राष्ट्र की नई सीमा नीति
साल 2022 में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम का ऐलान किया। इस कार्यक्रम के तहत पहले चरण में 4 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश – अरुणाचल, हिमाचल, सिक्किम, उत्तराखण्ड और लद्दाख के 2,967 सीमांत गाँवों को चुना गया। 2022–2026 की अवधि में 4,800 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से यह पहल सीमाओं को निर्जनता से जीवन की ओर ले जा रही है। इसका मक़सद केवल सड़क, बिजली, पानी देना नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य यह भी है कि सीमांत लोग पलायन न करें, बल्कि वहीँ रहकर सीमा की रक्षा में भागीदार बनें। सामरिक दृष्टि से यह ग्रामीणों को ‘मानवीय प्रहरी’ के रूप में सशक्त करता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की इस दूरदर्शी पहल ने सीमांत गाँवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का भरोसा दिया है। यह केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार नहीं, यह राष्ट्र सुरक्षा का मानवीय कवच है।
उत्तराखण्ड की सीमाओं का चित्र
उत्तराखण्ड की लगभग 625 किलोमीटर सीमा चीन (तिब्बत) और नेपाल से जुड़ती है। नीति-माणा घाटी, धारचूला, मुनस्यारी, गूंजी, लिपुलेख जैसे गाँव उत्तराखण्ड के सीमांत मोर्चे हैं। नीति गाँव, जिसे शीतकाल में अक्सर ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता था, अब वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत 12 महीनों तक जुड़ा रहे, इसके प्रयास शुरू हो चुके हैं। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, BRO बर्फ हटाने के लिए उन्नत मशीनरी ला रहा है, और सामुदायिक पर्यटन के लिए लोग होम-स्टे बना रहे हैं। नीति गाँव भारत के “अंतिम गाँव” से भारत का प्रथम गाँव बन चुका है और वो दिन भी दूर नहीं जब ये गाँव “घोस्ट विलेज” से “होस्ट विलेज” बन जाएगा।
मेरे अनुभव: सीमाओं पर यात्रा
मेरी सीमांत यात्राएँ केवल निरीक्षण नहीं, एक सैनिक की पुनः घर वापसी हैं। धारचूला के गाँवों में जब मैंने जवान युवाओं से बात की, तो उनकी आँखों में आत्मनिर्भरता का सपना था। वे चाहते हैं कि उनके गाँव में रोजगार के अवसर आएँ ताकि उन्हें मैदानी शहरों की ओर न भागना पड़े। मुनस्यारी में मैंने महिलाओं के समूहों को देखा जो ऊनी वस्त्र और जड़ी-बूटियाँ तैयार कर रही हैं। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम ने उनकी मेहनत को बाजार से जोड़ने का काम किया है। यही विकास का सही अर्थ है गाँव की आत्मा को जीवित रखना। राज्यपाल बनने के बाद मैंने जब नीति घाटी के अंतिम गाँवों में जाकर ग्रामीणों से बात की तो देखा कि उनके भीतर आज भी वही जज़्बा है जो मैंने सैनिक रहते देखा था। माणा गाँव में एक वृद्ध महिला ने मुझे कहा – “हमारे यहाँ गाँव खाली नहीं होंगे साहब, हम ही सीमा हैं और हम ही प्रहरी।” यह वाक्य किसी दस्तावेज़ से अधिक शक्तिशाली है।
सीमांत गाँवों में हो रहे परिवर्तन
आज धारचूला में महिलाएँ बकरी पालन और ऊनी वस्त्रों का क्लस्टर चला रही हैं। मुनस्यारी के युवा डिजिटल इंडिया की बदौलत अपने हस्तशिल्प को अमेजन (ऑनलाइन खरीद-बिक्री) तक पहुँचा रहे हैं। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम ने सीमांत पर्यटन को भी नया जीवन दिया है। ‘लास्ट विलेज’ को ‘फर्स्ट विलेज’ कहकर विपणन हो रहा है, जिससे स्थानीय लोगों को आय हो रही है और पर्यटक सीमा का महत्व समझ रहे हैं।
सीमाओं के प्रहरी: कुछ अनसुने उदाहरण
गूंजी गाँव – 3,220 मीटर की ऊँचाई पर बसा है। यहाँ पर BRO और ग्रामीण मिलकर सड़क को सालभर चालू रखने के लिए दिन-रात जुटे हैं। बर्फीली आँधियों में मशीनें रुकती नहीं, क्योंकि गाँव खाली नहीं होना चाहिए। नीति-माणा में अब स्थानीय स्कूलों में स्मार्ट क्लास रूम हैं। सीमांत बच्चों को अब अपने गाँव छोड़कर 50-60 किमी नीचे नहीं उतरना पड़ता। यही असली वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम का मर्म है। यह सब किसी चमत्कार से नहीं बल्कि समर्पित योजना, दृढ़ इच्छाशक्ति और ग्रामवासियों की जिद से संभव हुआ है।
चुनौतियाँ: सच को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते
किसी भी योजना की सफलता उसका निस्वार्थ पुनरावलोकन माँगती है। इस योजना की सफलता के साथ-साथ कुछ सच्चाइयाँ हैं। कई गाँवों में अभी भी मौसम के कारण 4-5 महीनों का अलगाव बना रहता है। बिजली आपूर्ति में बाधाएँ हैं। सोलर पावर प्रोजेक्ट्स को ऊँचाई वाले इलाकों में टिकाऊ बनाना एक चुनौती है। भूमि-अधिग्रहण के मसलों को ग्रामसभाओं के साथ अधिक संवाद से सुलझाना होगा। युवाओं को अगर स्थानीय स्तर पर रोज़गार नहीं मिला तो योजनाएँ सिर्फ आँकड़े बन जाएँगी। इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। स्थानीय उत्पादों को वैश्विक मंच प्रदान करने के लिए बनाए गए “हाउस ऑफ हिमालयास” ब्रांड भी यहाँ के युवाओं, शिल्पकारों और महिला स्वयं सहायता समूहों की सहायता कर रहा है।
राजनीति से परे – नीति की ज़रूरत
मेरा स्पष्ट मानना है कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को राजनीति से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय नीति के रूप में देखा जाए। यह केवल ‘योजना’ नहीं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सामाजिक कवच है। इसके लिए ज़रूरी है कि इसमें आईटी, कृषि, उद्योग, पर्यावरण जैसे विभाग तालमेल से काम करें। साथ ही हमें ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को केवल सरकारी योजना न रहने दिया जाए। यह ग्रामवासियों का अपना अभियान बने, तभी यह सफल होगा। सामुदायिक भागीदारी के बिना सीमांत नीति अधूरी है।
कुछ सुझाव: एक सैनिक की दृष्टि से
- सीमांत स्कूलों में NCC, स्काउट्स जैसे कार्यक्रमों को मज़बूत करें ताकि बचपन से बच्चों में सीमा-प्रहरी भावना जगे।
- सीमा पर्यटन का ‘अति-संवेदनशील क्षेत्र पर्यटन’ के रूप में ब्रांडिंग करें – ऐसे टूरिस्ट आएँ जो प्राकृतिक सौंदर्य के साथ सुरक्षा दृष्टिकोण को भी समझें।
- सीमांत महिला समूहों को जीआई (GI) टैग और ई-कॉमर्स (E-commerce) का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर दिया जा सकता है।
- BRO और ग्रामसभा मिलकर ‘सड़क रखरखाव समिति’ बनाएँ – बर्फ साफ़ रखने के नवाचार गाँवों से ही निकलें।
- सरकार द्वारा सड़कों और इंटरनेट के अलावा हेलिपैड और मोबाइल मेडिकल यूनिट्स का विस्तार करने की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
- आधुनिक तकनीक से सीमाओं की निगरानी करने की व्यवस्था बनाते हुए हमें स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षित करना चाहिए।
सीमा पर कविता: मेरे सैनिक मन से
“जहाँ सुबह बर्फ़ में सूरज हँसता,
जहाँ रात को तारों संग गाँव बसता,
वहीं से भारत अपनी सीमा खींचता,
वहीं से भारत खुद को जाँचता।”
सीमाएँ सुरक्षित, भारत सुरक्षित
मेरा अनुभव कहता है – वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम कोई चुनावी वादा नहीं – यह सीमा पर जीवन की लौ है। सीमा पर दीपक तभी तक जलता है जब गाँव में चूल्हा जलता रहे। गाँव में बच्चे हँसते रहें, महिलाएँ स्वरोजगार पाएं, जवान सीमाओं पर डटे रहें – तभी भारत सुरक्षित रहेगा। जब सैनिक सीमा पर खड़ा होता है तो वह अकेला नहीं होता। उसके पीछे गाँव खड़ा होता है, जिसके लोग बताते हैं कि कौन रास्ता दिखा सकता है, कहाँ खतरा छुपा है। उत्तराखण्ड के सीमांत गाँव इस दृष्टि से पूरे देश के लिए उदाहरण हैं, जहाँ सीमाएँ सिर्फ सुरक्षा नहीं, संस्कृति भी हैं। यहाँ लोकगीत, लोकनृत्य, पांडव नृत्य और बग्वाल पर्व – सब सीमाओं को जीवित रखते हैं।








