सीमांत पर स्वर्ण दुर्ग: जैसलमेर का सोनार किला
डॉ. ममता भाटी
गढ़ दिल्ली, गढ आगरो, गढ़ बीकानेर।
भलो चुणायो भाटीये, सिरे तो जैसलमेर।।
जैसलमेर ऐतिहासिक दृष्टि से विशिष्ट महत्त्व रखता है और अपनी गौरवशाली संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इस नगर की स्थापत्य कला सचमुच अद्वितीय है। जैसलमेर नगर एवं दुर्ग का निर्माण महाराणा जैसल ने किया था। दूसरे शब्दों में, रावल जैसल के काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि जैसलमेर दुर्ग का निर्माण तथा जैसलमेर नगर की स्थापना है। इस समय तक भाटियों की राजधानी लोद्रवा ही थी। जैसल की दृष्टि में यह स्थान राजधानी की दृष्टि से उपयुक्त नहीं था। अतः उसने दृढ़ दुर्ग-निर्माण के उद्देश्य से नवीन स्थल की खोज आरम्भ की। नैणसी की ख्यात के अनुसार, 140 वर्षीय वृद्ध एवं विद्वान ब्राह्मण ईसा (ईश्वर तथा ईसर) ने जैसलदेव को लोद्रवा से 17 किलोमीटर (5 कोस) पूर्व में गोड़हारे पर्वत पर दुर्ग बनाने का स्थान बताया, जहां पर पीने का पानी का ऐतिहासिक कूप (कोहिर) भी था। इस मत को तवारीख जैसलमेर के पृष्ठ 29 मे भी लिखा गया है। पर इसमें वृद्ध ब्राह्मण की उम्र 120 वर्ष बतायी गयी है।

फोटो: जैसलमेर का किला
जैसलमेर के इतिहासकार लक्ष्मीचंद सेवक, अजीतसिंह तथा उमजी और राजस्थान के इतिहासकार नैणसी, गहलोत एवं टॉड आदि ने अपनी पुस्तकों में जैसलमेर की स्थापना का समय वि.सं. 1212, श्रावण सुदी 12 (नैणसी के अनुसार श्रावण बदी 12), रविवार, मूल नक्षत्र बताया है।

इस प्रकार त्रिकुटांचल मेरु (तीन कोनो वाला पर्वत) पर इस अभेद्य दुर्ग की नींव वि. सं.1212 में रखी गई। इस दुर्ग के निर्माण का कार्य संवत 1235 से वि.सं. 1244 के मध्य हुआ होगा, ऐसा माना जाता है।

किले का यह मॉडल सेन्डस्टोन यानि बालुई पत्थर के एक ही शिलाखण्ड पर की गई नक्काशी का नमूना है। सबसे ऊंची इमारत राजमहल है। जैसलमेर किले की तुलना एक जगमगाते रेतीले महल से की गई है। दूर से यह एक अभेद्य किला कम और किसी परिकथा की वस्तु ज्यादा दिखाई देता है परंतु जैसे-जैसे इसके समीप जाते हैं इसकी वास्तविकता मजबूत और अजेय दुर्ग के रूप में मिलती है। यह किला जैसलमेर के मध्य 250 फीट (76 मीटर) त्रिकोण पहाड़ी पर जैसलमेर पर स्थित है।99 गोलाकार बुर्ज हैं। प्रत्येक बुर्ज की ऊँचाई 30 फीट आंकी गई है। बुर्जाकार दीवारों के ऊपर विशाल बेलनाकार व गोल-गोल पत्थर रखे हैं। जो उस युग में दुर्ग की रक्षा हेतु हथियार के रूप में काम आते थे। जैसलमेर का किला विशाल पीत पाषाणों से बना है। यह पत्थर सूर्य की किरणें पड़ने से स्वर्णाभूषण की तरह चमक उठता है। किले की इस आभा से इसे ‘सोनार किला’ के नाम से पुकारा जाता है। चतुर्दिक मरुस्थल होने से वास्तु शास्त्र के अनुसार इसे धान्व दुर्ग की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें कहीं भी चूने या सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया है। पत्थर के ऊपर पत्थर को एक दूसरे के अंदर खोंचा लगाकर फिर जोड़ दिया है। पत्थरों की जोड़ाई नीचे से ऊपर तक सीधी धार मिलाती है।
किले में अक्षयपोल, सूरजपोल, गणेशपोल और हवापोल नाम के चार मुख्य द्वार बने हुए हैं। शिकार की टोह में लेटे हुए शेर की आकृति का यह किला सुरक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। दुर्ग का मुख्य द्वार अक्षयपोल है। इसके आगे की चढ़ाई का रास्ता घुमावदार और संकरा है। सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करना नितान्त आवश्यक था। किले के ऊपर तक पहुंचने में सूरजपोल, गणेशपोल और हवापोल को पार करना पड़ता है। इन सभी पोलों को सुदृढ़ दीवारों से इस प्रकार जोड़ दिया गया है कि विशाल किवाड़ों को, तोड़े बिना शत्रु किले पर अधिकार नहीं कर सकता था। दुर्ग का निर्माण इस तरह से किया गया है कि दूर से आने वाले शत्रु को उसका प्रवेश द्वार दिखाई नहीं दे। सूरज पोल उसका उदाहरण है। सूरज पोल के आगे बैरीशाल बुर्ज के बन जाने से दुर्ग का प्रवेश द्वार दिखाई नहीं देता है। सूरजपोल के पास राजमहल की एक दीवार पर वि.सं.1512 का लेख उत्कीर्ण है, जिससे ज्ञात होता है कि महाराव देवीदास के शासन काल में अमरकोट को तोड़ कर वहां से लाई गई ईटों द्वारा दीवार का निर्माण करवाया गया था। पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ आर्ट आर्किटेक्चर ऑफ़ जैसलमेर’ के लेखक आर ए अग्रवाल के अनुसार, इसी पोल की दाहिनी तरफ एक भव्य व आकर्षक मीनार है, जिसके शीर्ष पर अठपहलू ढोलाकार छत्री बनी हुई है। यहां से पहरेदार शत्रुओं की हलचल का बहुत दूर से ही पता लगा सकता था। सूरजपोल के मूल उत्तरंग पर तोरण के ठीक बीच में सूर्य की आकृति अंकित है। इसी प्रकार गणेशपोल पर गणेश की प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

फोटो: जैसलमेर का किला
हवापोल को पार करने के बाद विशाल राजमहल दिखाई देते हैं। सर्वोत्तम विलास एक भव्य इमारत है। इसका निर्माण महारावल अखैसिंह (1722-1762 ई) के शासन काल में हुआ था। इसमें नीली चौकियां व कांच का जड़ाऊ काम बड़ा सुन्दर व कलात्मक है। इसे शीशमहल की संज्ञा दी जाती है। हवा पोल के ऊपर रंगमहल का निर्माण महारावल मूलराज द्वितीय (1762-1820 ई) के द्वारा करवाया गया था। इसका दालान कला की दृष्टि से अति उत्तम है। इस दालान की दीवारों पर अंकित वृत्ताकार एवं घुमावदार रेखाएँ अलंकरण कला के उत्कर्ष के नमूने कहे जा सकते हैं। पूर्व और उत्तर में स्थित प्रसादिकाओं के फलस्वरूप इस महल में पर्याप्त प्रकाश रहता है। एक अन्य मोती महल का निर्माण भी मूलराज द्वारा 1813 ई. में करवाया गया था। यह महल तीन-मंजिला है। इसके मुखपट पर विशेषकर इसके प्रस्तर के दरवाजों पर फूल-पत्तियों की खुदाई का बड़ा सुन्दर व कलात्मक काम किया गया है। वास्तुशिल्पी के आलंकारिक स्वरूप के अलावा ये भवन एक शुष्क रेतीले वातावरण के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है। प्रत्येक कोण और नक्शे को इस तरह से बनाया गया है कि गर्मी को कम किया जा सके और ज्यादा हवा आ सके, धूल बाहर रहे और जितना भी पानी वहां है उसे सुरक्षित किया जा सके।
यह दुर्ग भाटी राजाओं के पुरुषार्थ एवं आन-मान के गौरवमय इतिहास का प्रतीक है। प्रातः काल सूर्योदय के समय की लालिमा से प्रतिबिम्बित यह किला अपनी स्वर्णिम आभा से दर्शकों के मन को मोह लेता है। जैसलमेर दुर्ग मुगलकालीन किलों के स्थापत्य से पृथक् रहा है। यहां मुगलकालीन किलों की तड़क-भड़क तथा उनसे संलग्न बाग-बगीचे, फौवारे व अन्य साज-सामानों का पूर्ण रूपेण अभाव है। यह एक ऐसा गढ़ है जिस पर बस्ती, मन्दिर, राजमहल, प्रशासकों के मकान, कुए आदि हैं।
जैसलमेर के किले की प्रसिद्धि का मुख्य कारण यह है कि यहां के क्षत्रियों व सैनिकों ने अपने देश के मान की रक्षा हेतु अपने जीवन का बलिदान किया था। यहां की वीरांगनाओं ने जीते-जी अग्नि में प्रवेश (जौहर) कर अपने प्राणों की आहुति दे डाली थी। वीरता के क्षेत्र में जैसलमेर के ढाई साके विख्यात हैं। भाटी राजपूत शासक अपने वीरोचित प्रकृति, अदम्य साहस व युद्ध कौशल के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध थे। उन्हें ‘उत्तर भड़ किवाड़’ कह कर सम्बोधित किया जाता था।
पूज्य मुनि श्री प्रकाश विजय जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘जैसलमेर पंचतीर्थीनों इतिहास’ के पृ. 21, पर कुछ इस प्रकार वर्णन प्राप्त होता है –
स्वर्ण प्रस्तर से जड़ा यह दुर्ग दृढ़ जैसाण का ।
दे रहा परिचय सदा से भाटियों की आण का।








