एक वैज्ञानिक, व्यवहारिक और सभ्यतागत रूपांतरण की परिकल्पना
भोगेन्द्र पाठक
संघ का शताब्दी वर्ष उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का उद्घोष है। ‘पंच परिवर्तन’ इसी उद्घोष का मूर्त रूप है। यह एक ऐसा अभियान है जो भारत की आत्मा, सामाजिक ढाँचे और नागरिक संस्कारों को समग्र रूप से पुनर्गठित करने का संकल्प करता है। भारतीय दर्शन का अमर सूत्र “यत् पिण्डे तत् ब्रह्मांडे” – यही इसकी आधारशिला है, अर्थात् व्यक्ति का परिष्कार ही समाज और विश्व का परिष्कार है। पंच परिवर्तन इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब तक व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और वैश्विक चेतना एक ही दिशा में प्रवाहित नहीं होंगी, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा। आज भारत आर्थिक शक्ति बन रहा है, किंतु सामाजिक विभाजन, परिवारों का विघटन, पर्यावरणीय असंतुलन, अनुशासनहीनता और सांस्कृतिक संकोच जैसी चुनौतियाँ गहराती जा रही हैं। इनका समाधान केवल शासन से नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और चेतना-जागरण से संभव है।
2047 का भारत समरस, संस्कारित, पर्यावरण-संवेदी, आत्मनिर्भर और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों वाला राष्ट्र बने – पंच परिवर्तन इसी स्वप्न को साकार करने का मार्ग प्रशस्त करता है। पंच परिवर्तन का तात्पर्य है कि 2047 तक भारत आजादी की 100वीं वर्षगाँठ मनाएगा – तबतक भारत को एक ऐसी स्थिति में होना चाहिए, जहाँ:
- समाज सब प्रकार की विषमता और भेद-भाव से मुक्त हो गया हो।
- परिवार मूल्यों का संवाहक और चरित्र-निर्माण का केंद्र फिर से बन गया हो।
- राष्ट्र पर्यावरण-संवेदी और सतत् विकास के पथ पर अग्रसर हो।
- भारत आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूप से आत्मनिर्भर हो गया हो।
- नागरिक अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य-बोध से भी सजग हो।
यह अभियान न केवल आंतरिक परिवर्तन का आह्वान करता है, बल्कि विश्व को एक नई सभ्यतागत दिशा देने का भी संदर्भ रखता है। पंच परिवर्तन के पाँच स्तंभ हैं: 1. कुटुम्ब प्रबोधन, 2. सामाजिक समरसता, 3. पर्यावरण चेतना, 4. ‘स्व’ पर आग्रह, और 5. नागरिक कर्तव्य।
कुटुंब प्रबोधन : राष्ट्र-चरित्र की प्रथम पाठशाला
आरएसएस के पंच परिवर्तन का दूसरा स्तंभ कुटुंब प्रबोधन है। कुटुम्ब प्रबोधन के अंतर्गत परिवार को केवल जैविक संरचना नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद, अनुशासन और भावनात्मक सुरक्षा की जीवंत प्रयोगशाला माना जाता है। संघ की दृष्टि में परिवार वह केंद्र है जहाँ प्रेरणा जन्म लेती है और एकता संस्कारित होती है। मनोविज्ञान और समाजशास्त्र दोनों स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति का चरित्र-निर्माण परिवार में ही होता है; इसलिए पंच परिवर्तन परिवार को सभ्यता की प्राथमिक पाठशाला के रूप में पुनर्स्थापित करना चाहता है। डिजिटल युग ने साथ रहते हुए भी दूरी बढ़ा दी है – इसीलिए सामूहिक संवाद, साझा भोजन और चिंतन को फिर से जीवन का अनुशासन बनाने पर बल दिया जाता है। पीढ़ियों के बीच मूल्य-संक्रमण टूटने से समाज दिशाहीन होता है; कुटुंब प्रबोधन परिवार को विचार, अनुभव और उत्तरदायित्व का अंतरपीढ़ीय केंद्र बनाता है। वैश्विक अनुभव प्रमाणित करते हैं कि सुदृढ़ परिवार ही सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता की रीढ़ होते हैं।
संघ की अवधारणा में कुटुंब से राष्ट्र-कुटुंब तक की यात्रा स्वाभाविक है – परिवार में सीखा अनुशासन, स्वच्छता, सेवा और नागरिक कर्तव्य स्वतः राष्ट्रीय आचरण में रूपांतरित हो जाते हैं। इसका प्रतिफल सामाजिक विकृतियों में कमी और आत्मविश्वासी, जिम्मेदार मानव-पूँजी के निर्माण के रूप में सामने आता है। श्रीमद्भगवद्गीता पारिवारिक कर्तव्यों को साधना का मार्ग बताती है। इसी भाव को कहा गया है – “यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।” अर्थात् त्याग करने योग्य नहीं, बल्कि करने योग्य हैं यज्ञ, दान और तप। परिवार-कर्तव्य भी इन्हीं में आते हैं – सेवा, अनुशासन, सहनशीलता के रूप में।
कुटुंब प्रबोधन के पाँच मुख्य आयाम
परिवार: प्राथमिक विद्यालय
मनोवैज्ञानिक शोध सिद्ध करता है कि व्यक्ति का चरित्र, सहानुभूति, सहिष्णुता और नैतिक अनुशासन परिवार में ही जन्म लेते हैं। पंच परिवर्तन परिवार को इसी प्राइमरी स्कूल ऑफ़ सिविलाइज़ेशन (सभ्यता की प्राथमिक पाठशाला) के रूप में पुनर्स्थापित करता है।
स्क्रीन-युग में भौतिक संवाद
डिजिटल दुनिया ने परिवारों में “एक छत के नीचे रहना, पर भावनात्मक दूरी” की समस्या पैदा की है। पंच परिवर्तन प्रतिदिन के कुछ घंटे सामूहिक भोजन, संवाद, प्रार्थना और सांझा कार्य के लिए समर्पित करने की अपील करता है।
पीढ़ी-अंतराल का सेतु
जब दादा-दादी, माता-पिता और बच्चों के बीच मूल्य-संप्रेषण टूटता है, तो समाज दिशाहीन हो जाता है। परिवार को एक इंटरजेनरेशनल थिंक-टैंक (विचार-केंद्र) में रूपांतरित करना ही इस अंतराल को पाटने का तरीका है।
आधुनिक समय में पारिवारिक भूमिका
तलाक, अकेलापन, नशाखोरी, आत्महत्या-प्रवृत्ति और वृद्धजन-उपेक्षा का मूल कारण परिवार का विघटन है। एक सशक्त, सहायक परिवार इन सभी समस्याओं की प्राकृतिक निरोधक शक्ति बन जाता है।
राष्ट्र-कुटुंब की अवधारणा
यदि परिवार राष्ट्र की मूल इकाई है, तो परिवार में सीखा अनुशासन, स्वच्छता, सेवा-भावना, कर-चुकौती और कानून-पालन स्वतः राष्ट्रीय जिम्मेदारी में रूपांतरित होते हैं।
सामाजिक समरसता : राष्ट्र-स्थायित्व की आधारशिला
आरएसएस के पंच परिवर्तन का प्रथम और केन्द्रीय स्तंभ सामाजिक समरसता है – ऐसा समाज जहाँ जाति, भाषा, वर्ग, क्षेत्र और लिंग की विभाजक रेखाएँ संवाद, सम्मान और साझेदारी में विलीन हो जाएँ। संघ की दृष्टि में समरसता कोई नारा नहीं, बल्कि व्यवहारगत समानता, साझा जीवन और मानवीय निकटता की सतत साधना है। समरस समाज केवल कानूनी समानता तक सीमित नहीं रहता; वह सहभोज, सामाजिक सहभागिता, पारिवारिक संबंधों और कार्यस्थलों की साझेदारी के माध्यम से विश्वास और आत्मीयता का निर्माण करता है। ऐतिहासिक असमानताओं के उपचार को संघ दीर्घकालिक सामाजिक प्रायश्चित के रूप में देखता है – जहाँ मंदिर-प्रवेश, सामूहिक आयोजन और वंचित वर्गों की मुख्यधारा में सक्रिय भागीदारी केवल प्रतीक नहीं, बल्कि परिवर्तन की जीवित प्रक्रिया हैं।
पंच परिवर्तन का एक निर्णायक लक्ष्य राष्ट्रीय विमर्श की दिशा बदलना भी है – विखंडन और आक्रोश से हटाकर उसे कर्तव्य, सांस्कृतिक आत्मबोध और सामाजिक एकात्मता की ओर मोड़ना है। वैश्विक अनुभव प्रमाणित करते हैं कि स्थायी शांति तभी संभव है जब समाज अपने ऐतिहासिक घावों का साहसपूर्वक उपचार करे; भारतीय संदर्भ में पंच परिवर्तन इसी दीर्घकालिक समाधान का सार्थक संकेतक है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आंतरिक सुरक्षा की स्थायित्व-रेखा सामाजिक समरसता से होकर गुजरती है। जनसांख्यिकीय असंतुलन, घुसपैठ और सांप्रदायिक तनाव का स्थायी समाधान दमन नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समावेशी सामाजिक संरचना है, जो असंतोष को लोकतांत्रिक मार्ग प्रदान करती है, हिंसक नहीं। इसका प्रतिफल दीर्घकालिक सामाजिक स्थिरता, संघर्षों में कमी और मानव-प्रतिभा के पूर्ण उपयोग के रूप में सामने आता है – जहाँ हाशिये पर खड़ा समाज राष्ट्र की उत्पादक शक्ति में रूपांतरित हो जाता है।
सामाजिक समरसता का मूल ऋग्वेद के मंत्र में भी है –
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥
अर्थात् तुम मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन एक हो जाएँ; जैसे देवताओं ने प्राचीन काल से समरूप भाव से मिलकर यज्ञ में भाग लिया।
सामाजिक समरसता के पाँच मुख्य आयाम
ऐतिहासिक घावों का उपचार
भारत में जातीय विषमता की बहुसदियों की परंपरा को स्वीकार करते हुए पंच परिवर्तन इसे ‘दीर्घकालीन न्याय की दिशा में प्रायश्चित’ की तरह देखता है। मंदिर-प्रवेश, सहभोज, वंचित समुदायों के साथ संयुक्त कार्यक्रम और शिक्षा-सहयोग इसी दिशा के व्यावहारिक प्रयोग हैं।
बौद्धिक विमर्श में परिवर्तन
पंच परिवर्तन का घोषित लक्ष्य है ‘राष्ट्र-विमर्श को विखंडन से निकालकर समरसता, कर्तव्य और सांस्कृतिक आत्मबोध की दिशा में मोड़ना’। यह केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आह्वान है।
आंतरिक सुरक्षा का संबंध
जनसंख्या-छेड़छाड़, घुसपैठ, सांप्रदायिक तनाव और सीमा-क्षेत्र की चुनौतियाँ केवल सुरक्षा के मुद्दे नहीं हैं; वे सामाजिक समरसता की कमी से उत्पन्न होती हैं। जब एक समाज अपने भीतर न्यायपूर्ण, सम्मानपूर्ण और समावेशी होता है, तो वह बाहरी विभाजन-प्रयासों के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रतिरोधी हो जाता है।
वैश्विक उदाहरण
दक्षिण अफ्रीका के ‘ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन’, अमेरिका के ‘सिविल राइट्स मूवमेंट’, यूरोप में होलोकॉस्ट-पश्चात् सामाजिक संवाद – ये सभी दिखाते हैं कि दीर्घकालीन राष्ट्रीय शांति के लिए सामाजिक घावों का उपचार अनिवार्य है।
आर्थिक-सामाजिक गतिशीलता
समरसता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी तर्कसंगत है। जब हाशिए के समुदाय मुख्यधारा में आते हैं, तो वे मानव पूँजी, उद्यम और सृजनात्मकता के नए स्रोत बनते हैं। यह आर्थिक वृद्धि को त्वरित करता है।
पर्यावरण चेतना : सभ्यता के दीर्घ संरक्षण का प्रण
आरएसएस के पंच परिवर्तन का तीसरा स्तंभ पर्यावरण चेतना और संरक्षण है – जहाँ प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि साझा विरासत और भावी पीढ़ियों की अमानत माना जाता है। संघ इसे वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, प्लास्टिक-मुक्ति और ऊर्जा-संयम जैसे दैनिक आचरण से जोड़कर व्यवहारिक आंदोलन का स्वर देता है। भारतीय परंपरा की प्रकृति-पूजा और आधुनिक जलवायु-विज्ञान दोनों इस सत्य की पुष्टि करते हैं कि जैव-विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व असंभव है। पंच परिवर्तन इन दोनों धाराओं का समन्वय करता है। स्थानीय उत्पादों, देशज विकल्पों और कम-प्रदूषणकारी जीवनशैली को अपनाने का आग्रह वैश्विक जलवायु लक्ष्य को जन-व्यवहार की भाषा में रूपांतरित करता है।
यह अभियान अनियंत्रित उपभोग के विरुद्ध संयम और उत्तरदायित्व की संस्कृति विकसित करता है – जहाँ कम में संतोष और आवश्यक में अनुशासन जीवन-मूल्य बनते हैं। वैश्विक हरित नीतियों की तरह यह पहल स्थानीय स्तर पर गृह-स्तरीय संकट के समाधान की दिशा में सार्थक कदम है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि पर्यावरण-संवेदनशील समाज ही आपदाओं, जल-संघर्ष और खाद्य असुरक्षा से दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है। इसका प्रतिफल स्वास्थ्य, कृषि और ऊर्जा-संतुलन में सुधार के साथ भारत की वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार और दूरदर्शी सभ्यता के रूप में सुदृढ़ करता है। ध्यातव्य है –
“पेड़ कटे तो फिर छाँव कहाँ से पाएँगे,
नदियाँ रूठीं तो गीत कहाँ से गाएँगे।
धरती को केवल बाज़ार मत समझो रे मानव,
सूनी, क्षत-विक्षत मिट्टी पर बच्चे कैसे मुस्काएँगे।“
पर्यावरण संरक्षण के पाँच मुख्य आयाम
परंपरा और विज्ञान का समन्वय
भारतीय परंपरा में नदी, वृक्ष, गाय, भूमि सब पवित्र माने गए; आधुनिक क्लाइमेट-साइंस यह सिद्ध करती है कि जैव-विविधता के बिना सभ्यता अस्तित्वहीन हो सकती है। पंच परिवर्तन इन दोनों धाराओं को एकीकृत करता है।
स्थानीय जीवन-शैली में पर्यावरण-संवेदनशीलता
होली में प्राकृतिक रंग का प्रयोग और दीपावली पर देशज उत्पाद, स्थानीय मिट्टी के दीये, स्वदेशी सजावट – ये सब व्यावहारिक स्तर पर पर्यावरण-चेतना का प्रदर्शन है। यह ग्लोबल क्लाइमेट एजेंडा को लोक-भाषा में अनुवाद करना है।
उपभोग-संस्कृति के विरुद्ध संयम
जलवायु-संकट की मूल जड़ है अनियंत्रित उपभोग। पंच परिवर्तन जीवन-शैली को “कम में संतोष, आवश्यक में संयम, गलत में प्रतिरोध” की दिशा देता है।
आपदा-प्रबंधन और सीमा-सुरक्षा
बाढ़, सूखा, ग्लेशियर-पिघलना, चरम मौसम – ये राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे भी हैं। एक पर्यावरण-सचेत समाज ही जल-संघर्ष, खाद्य-संकट और विस्थापन-चुनौतियों से बच सकता है।
वैश्विक नेतृत्व और सॉफ़्ट-पावर
यूरोप का ग्रीन न्यू डील, चीन की कार्बन-न्यूट्रल नीति, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) – भारत इन सबमें अपना अनूठा योगदान दे सकता है, यदि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को जोड़े।
‘स्व’ पर आग्रह: स्वदेशी व आत्मनिर्भरता
चौथा स्तंभ ‘स्व’ पर आग्रह है – अर्थात् विचार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्कृति और जीवन-शैली में भारतीयता पर आधारित आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान। संघ इसे स्वदेशी आचरण, स्थानीय उत्पाद, भारतीय ज्ञान-परंपरा और आत्मविश्वास भरे वैश्विक संवाद से जोड़ता है। केवल पश्चिमी फ्रेमवर्क में अपने समाज को देखने की आदत से हटकर, भारतीय दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र के आधार पर नई बौद्धिक भाषा गढ़ना – आरएसएस इसे राष्ट्रीय दृष्टिकोण से बौद्धिक नैरेटिव बदलने की आवश्यकता के रूप में रखता है। पंच परिवर्तन स्वदेशी उत्पादों के उपयोग, स्थानीय उद्योग, किसान व कारीगर को प्राथमिकता देने की प्रत्यक्ष अपील करता है। यह आत्मनिर्भर भारत की धरातलीय व्युत्पत्ति है। भाषा, पोशाक, त्यौहार और कला में हीन भावना छोड़कर, वैश्विक मंच पर अपने कल्चरल सॉफ्ट पावर को सकारात्मक और संवादशील ढंग से प्रस्तुत करना – योग, आयुर्वेद, भारतीय संगीत, रामायण-महाभारत जैसी कथाएँ इसके उदाहरण हैं।
पंच परिवर्तन वैश्विक खुलेपन का विरोध नहीं, बल्कि अंधानुकरण के स्थान पर चयनात्मक स्वीकार और स्वाभिमानी संवाद की वकालत करता है, जैसे जापान ने आधुनिक तकनीक अपनाई, किंतु सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तभी सार्थक होती है जब ‘स्व’ मजबूत हो। कमजोर, हीनताग्रस्त समाज वैश्विक परिवार में भी समकक्ष भागीदार नहीं बन पाता। आरएसएस का ‘स्व’ आग्रह, विश्व-परिवार के भीतर आत्मसम्मानपूर्ण सहभागिता की पूर्वशर्त है। इसलिए द्रष्टव्य है –
“अपने खेत की मिट्टी से ही, अन्न भी पलें, स्वप्न भी उठें,
अपने श्रम के बल पर ही, पाँवों के तले आकाश भी झुकें।“
‘स्व’ पर आग्रह के पाँच मुख्य आयाम
‘स्व‘ पर आग्रह अर्थात् हीनता की क्षतिपूर्ति नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का पुनर्जागरण है। भारत आधुनिक रहे, किंतु अपनी सभ्यतागत पहचान खोए बिना। यही 2047 तक विकसित, आत्मनिर्भर और विश्व-नेतृत्व-सक्षम भारत की ओर का पथ है –
बौद्धिक आत्मनिर्भरता
पश्चिमी फ्रेमवर्क से मुक्त होकर भारतीय दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र को अपने समाज के विश्लेषण का केंद्र बनाना। जापान ने यही किया – पश्चिमी तकनीकें अपनाईं, किंतु अपनी सांस्कृतिक-दृष्टि से काम किया।
स्वदेशी आर्थिक आत्मनिर्भरता
स्थानीय उद्योग और घरेलू विनिर्माण को प्राथमिकता। आत्मनिर्भर भारत का उत्पादन स जुड़ी योजना (PLI योजना) Rs. 1.97 लाख करोड़ 14 सेक्टरों में निवेश कर रहा है – एप्पल, अमेजन ने भारत में कारखाने लगवाए हैं। चीन से 33.6 बिलियन डॉलर आयात का 25% भारत में बनाया जा सकता है।
सांस्कृतिक आत्मविश्वास
योग, आयुर्वेद, संस्कृत, भारतीय कला को विश्व-मंच पर गर्व से प्रस्तुत करना, न कि हीनता से। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अब 177 देशों में मनाया जाता है। आयुर्वेद को 21वीं सदी की मन-शरीर चिकित्सा (mind-body medicine) माना जा रहा है।
जापान का मॉडल
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन समय और विकास के लिए आवश्यक है। जापान ने पश्चिमी तकनीकें ग्रहण कीं, किंतु अपनी सांस्कृतिक पहचान कभी नहीं खोई। चाय की परंपरा, ज़ेन दर्शन आज भी जापान में जीवंत हैं। परिणाम: 1945 से विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, फिर भी ‘जापानी‘।
वैश्विक नेतृत्व
‘स्व‘ मजबूत हो, तब ही विश्व में समकक्ष भागीदार बन सकते हैं। भारत जलवायु-परिवर्तन, स्वास्थ्य-कल्याण, और आध्यात्मिक-दर्शन में विश्व-नेतृत्व दे सकता है – यदि अपनी परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़े।
नागरिक कर्तव्य : लोकतंत्र की जीवित आत्मा
आरएसएस के पंच परिवर्तन का पाँचवाँ और निर्णायक स्तंभ नागरिक कर्तव्य है – जहाँ संविधान, क़ानून, अनुशासन, कर-पालन, मतदान, स्वच्छता और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा जैसे दायित्व व्यक्ति के चरित्र का अंग बनते हैं। इसे “विकसित भारत 2047” की दिशा में आवश्यक सिविक री-इंजीनियरिंग के रूप में देखा गया है। आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती अधिकार-बोध की प्रबलता और कर्तव्य-बोध की क्षीणता है। पंच परिवर्तन इसी असंतुलन को साधने का प्रयास करता है। संघ की परंपरा संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और विधि-निष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पर आधारित रही है। दैनिक जीवन का अनुशासन है – समयपालन, कर-अनुशासन, ट्रैफिक नियमों का पालन और स्वच्छता। सूक्ष्म स्तर पर यह राष्ट्र-निर्माण की निरंतर प्रक्रिया है।
वैश्विक अनुभव बताते हैं कि उच्च नागरिक अनुशासन ही उच्च मानव विकास और आर्थिक समृद्धि की नींव है। सुरक्षा और शासन के क्षेत्र में भी जागरूक नागरिक ही प्रथम प्रहरी होता है – जो फेक न्यूज रोकता है, संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देता है और राष्ट्रीय हित में सहयोगी बनता है। पंच परिवर्तन नागरिक को केवल मतदाता नहीं, बल्कि सह-रक्षक (Co-Guardian) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इसका प्रतिफल भ्रष्टाचार और अव्यवस्था में कमी, शासन-क्षमता में वृद्धि तथा नीति-निर्माण पर राज्य के अधिक केंद्रित होने के रूप में सामने आता है – जहाँ लोकतंत्र दायित्व-बोध से शक्ति अर्जित करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के ‘कर्मयोग’ का उद्घोष है –
“तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर |
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष:||”
अर्थात् आसक्ति त्यागकर सदैव अपना कर्तव्य-कर्म करो; ऐसा करने वाला पुरुष परमावस्था को प्राप्त करता है। यह श्लोक नागरिक कर्तव्य और अनुशासन की आध्यात्मिक नींव के रूप में अत्यंत प्रभावी है।
नागरिक कर्तव्य के पाँच आयाम
अधिकार-केंद्रित से कर्तव्य-केंद्रित समाज
आधुनिक लोकतंत्रों की बड़ी चुनौती यह है कि नागरिक अधिकार के प्रति सजग हैं, किंतु कर्तव्य के प्रति उदासीन। पंच परिवर्तन इस असंतुलन को सुधारना चाहता है।
संविधान के प्रति निष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान
आरएसएस नेतृत्व ने विशेष रूप से स्पष्ट किया है कि संघ की परंपरा में संविधान-निष्ठा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान अटूट है। आपातकाल के समय संघ का प्रतिरोध इसी निष्ठा का प्रमाण है।
दैनंदिन अनुशासन से राष्ट्रीय अनुशासन
कचरा न फेंकना, समय पर कर देना, लाइन में खड़ा होना, ट्रैफिक-नियम पालन, समय की पाबंदी – ये सूक्ष्म राष्ट्र-निर्माण के दैनंदिन प्रयोग हैं। पंच परिवर्तन इन्हें नैतिक अनुशासन से जोड़ता है, न कि केवल कानूनी भय से।
वैश्विक उदाहरण
सिंगापुर में कठोर नागरिक-अनुशासन, जर्मनी में कर-भुगतान की संस्कृति, स्कैंडिनेविया में उच्च सामाजिक-विश्वास – ये सब दिखाते हैं कि उच्च नागरिक-अनुशासन ही उच्च मानव-विकास और आर्थिक समृद्धि हैं।
सीमा-सुरक्षा और नागरिक-सहभागिता
सीमा-सुरक्षा से लेकर साइबर-सुरक्षा तक, हर जगह सतर्क और जिम्मेदार नागरिक ही प्रथम पंक्ति का प्रहरी होता है। संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग, फेक न्यूज़ का विरोध, घुसपैठ और तस्करी पर लोक-सहयोग – ये सब नागरिक-कर्तव्य के मूल रूप हैं।
समेकित दृष्टि : पंच परिवर्तन का सभ्यतागत संकल्प
पंच परिवर्तन की शक्ति इस तथ्य में निहित है कि उसके पाँचों आयाम अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समेकित सामाजिक–वैज्ञानिक मॉडल के रूप में कार्य करते हैं – व्यक्ति में आत्मबोध, परिवार में मूल्य-संस्कार, समाज में समरसता, अर्थव्यवस्था में स्वदेशी चेतना और राज्य के साथ नागरिक सहभागिता। यही समन्वय 2047 तक एक विकसित, आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से जागरूक भारत की रूपरेखा गढ़ता है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह मॉडल विज्ञान और दर्शन, लोकतंत्र और अनुशासन, पर्यावरण और विकास, परंपरा और आधुनिकता के संतुलित संगम का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए पंच परिवर्तन को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सभ्यतागत रूपांतरण की दिशा कहा जा सकता है। यदि प्रत्येक आयाम के साथ एक संक्षिप्त जीवन-सूत्र जोड़ा जाए तो विचार प्रेरणा में रूपांतरित हो जाता है –
- समरसता वह साधना है जहाँ सम्मान जीवन का स्वभाव बनता है।
- परिवार का संवाद ही राष्ट्र की चेतना का पथ प्रशस्त करता है।
- पर्यावरण-विहीन विकास भविष्य की बंजरता का बीज बोता है।
- जिसका आत्मबल दृढ़ है, वही विश्व में प्रतिष्ठा पाता है।
- कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही राष्ट्र-संरचना का शिल्पकार है।
पंच परिवर्तन केवल एक अभियान नहीं है – यह भारत के आत्मा, संरचना और भविष्य का एक समग्र पुनर्जागरण है। इसमें न तो किसी का विरोध है, न कोई भेद-भाव; बल्कि यह सभी को अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप की ओर बुलाता है, चाहे वह समाज-स्तर पर हो, परिवार-स्तर पर हो, या व्यक्ति-स्तर पर।








