डेटा सुरक्षा, डार्क वेब और अवैध वित्तीय प्रवाह
लेफ्टिनेंट जनरल आशीष रंजन प्रसाद (सेवानिवृत्त)
वर्तमान युग में किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल भूमि, समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष तक सीमित नहीं रही है। अब यह डिजिटल डोमेन में भी विस्तारित हो गई है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और उभरती हुई तकनीकी महाशक्ति है। भारत कई क्षेत्रों में बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है – जिनमें भूमि, समुद्र, आकाश, अंतरिक्ष और साइबर डोमेन शामिल हैं। ये चुनौतियाँ भारत की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और स्थायित्व के लिए खतरा बन रही हैं। उसी संदर्भ में यह अध्ययन साइबर स्पेस में उभरते खतरे का विश्लेषण करता है और डेटा सुरक्षा की कमजोरियाँ, डार्क वेब का दुरुपयोग, और अवैध वित्तीय प्रवाह जैसी त्रि-आयामी चुनौतियों का मूल्यांकन करता है। यह लेख साइबर डोमेन की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करता है जिसमें डेटा सुरक्षा, डार्क वेब से उभरता खतरा, और अवैध वित्तीय प्रवाह शामिल हैं तथा सभी संबंधित पक्षों के लिए रणनीतिक सैन्य सिफारिशें शामिल हैं। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अब पारंपरिक खतरों से हटकर असामान्य और असीमित क्षेत्रों – जैसे, साइबर, आर्थिक और सूचना युद्ध – तक विस्तारित हो चुकी है। सैन्य, बैंकिंग, शासन और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के एकीकरण से भारत साइबर हमलों, डेटा चोरी और अवैध वित्तीय प्रवाह (IFFs) के लिए संवेदनशील हो गया है।
डार्क वेब अवैध लेनदेन और संचार को बढ़ावा देता है, जबकि अवैध वित्तीय प्रवाह (IFFs) का उपयोग आतंकवाद, विद्रोह और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग में किया जाता है – विशेष रूप से भारत के पश्चिमी और उत्तरी पड़ोसी देशों से। ये साइबर-सक्षम खतरे न केवल भारत की रक्षा तैयारी को कमजोर करते हैं, बल्कि आंतरिक स्थिरता, वित्तीय प्रगति और भूराजनीतिक स्थिति को भी प्रभावित करते हैं।
डेटा सुरक्षा: भारत की डिजिटल संप्रभुता की रक्षा
भारत की सशस्त्र सेनाएँ तीव्र डिजिटलीकरण के दौर से गुजर रही हैं। ऐसे में डेटा सुरक्षा रणनीतिक प्राथमिकता बन गई है।

भारत की डिजिटल चुनौती
- एकीकृत थिएटर कमान एवं साइबर जोखिम – थिएटर कमांड मॉडल संचालन लाभ तो देता है लेकिन इसके साथ साइबर हमलों का खतरा भी जुड़ा होता है। एक थिएटर कमांड में हुआ साइबर उल्लंघन तीनों सेनाओं के संयुक्त अभियानों को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण: फ्रंटलाइन और मुख्यालय के बीच लाइव ट्रूप मूवमेंट या ड्रोन फुटेज यदि लीक हो जाए तो दुश्मन हमारी सैन्य रणनीति और पोजिशन जान सकता है।
- परमाणु संचार प्रणाली की साइबर सुरक्षा – भारत की परमाणु कमान प्रणाली सुरक्षित संचार प्रणाली पर निर्भर करती है। यदि इसमें कोई साइबर अटैक हुआ तो यह भयानक परिणामों का कारण बन सकता है – जैसे, गलत निर्णय या लॉन्च कोड में छेड़छाड़।
- सैन्य और नागरिक संरचनाओं की साइबर संवेदनशीलता – 2019 का कुडनकुलम् परमाणु संयंत्र साइबर हमला (उत्तर कोरियाई समूह द्वारा) दिखाता है कि कैसे डिजिटल ढांचे को निशाना बनाकर सुरक्षा जोखिम पैदा किए जा सकते हैं।
- 2021 मुंबई पावर ग्रिड अटैक (चीन समर्थित) – यह दिखाता है कि नागरिक ढांचा भी समान रूप से असुरक्षित है।
- DRDO और HAL पर साइबर जासूसी – अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों की चोरी से भारत की सामरिक बढ़त खतरे में पड़ सकती है।
- मनोवैज्ञानिक युद्ध और डेटा हेरफेर – गलत सूचनाएँ (पुलवामा, 2019 और गलवान, 2020 के दौरान) – सोशल मीडिया पर गलत वीडियो/तथ्यों के माध्यम से जनता की राय को गुमराह करना, लीक हुई खुफिया जानकारियाँ को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना और सैन्य निर्णयों को प्रभावित करना। साथ ही, संचार प्रणाली में सेंध लगाकर झूठी सूचनाएँ भेजना, जैसे गलत टारगेट को निर्देशित करना – जिससे मिशन विफल हो सकता है।
डार्क वेब: अदृश्य युद्धक्षेत्र
डार्क वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है जो पारंपरिक सर्च इंजनों द्वारा इंडेक्स नहीं होता और Tor जैसे एन्क्रिप्टेड नेटवर्क पर काम करता है। यह उपयोगकर्ताओं को गुमनाम ब्राउज़िंग और संचार की सुविधा देता है, जिससे यह अवैध गतिविधियों जैसे कि ड्रग्स तस्करी, हथियारों की बिक्री, साइबर अपराध आदि का अड्डा बन चुका है।
(i) भारतीय परिप्रेक्ष्य में डार्क वेब: भारत में डार्क वेब का उपयोग नकली दस्तावेज, हथियारों की डिज़ाइन, क्रिप्टो पेमेंट से जुड़ा अपराध, और आतंकी मॉड्यूल्स के संचालन के लिए किया जा रहा है। कई मामलों में NIA और राज्य पुलिस ने ऐसे मॉड्यूल्स को बेनकाब किया है।
(ii) राष्ट्रीय और सैन्य सुरक्षा को खतरे: आधार, वोटर आईडी और रक्षा कार्मिकों का डेटा डार्क वेब पर बेचा जा रहा है। कट्टरपंथी संगठन गुप्त प्लेटफॉर्म्स पर युवाओं की भर्ती कर रहे हैं और जिहादी प्रचार सामग्री फैला रहे हैं।
(iii) हथियारीकरण एवं सेवा-आधारित जासूसी: इसे अंगरेजी में कहते हैं Weaponization & Espionage-as-a-Service. डार्क वेब पर आक्रामक साइबर उपकरण (offensive cyber tools) खुले बाजार में उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग गैर-राज्य तत्वों (non-state actors) द्वारा भी किया जा सकता है। डीपफेक (Deepfake) एवं कृत्रिम पहचान (synthetic identity) के चलते भारत की खुफिया एजेंसियाँ एक नए खतरे से जूझ रही हैं।
(iv) राष्ट्रीय स्तर पर डार्क वेब को रोकने के उपाय:
- National Firewall: डार्क वेब गेटवे और Tor ट्रैफिक को ब्लॉक करने के लिए ISPs को प्रतिबंधित करना।
- Global सहयोग: Google, Microsoft और CERT-IN जैसी संस्थाओं के साथ इंटेलिजेंस साझा करना।
- Cyber Intelligence Units: विशेष इकाइयाँ बनाकर डार्क वेब की निगरानी और लेनदेन पर नज़र रखना।
- सार्वजनिक जागरूकता अभियान और कानूनी बदलाव: जैसे कि जर्मनी में नए कानूनों के माध्यम से डार्क वेब अपराध पर नियंत्रण के प्रयास हुए।
अवैध वित्तीय प्रवाह (Illicit Financial Flows – IFFs): यह आंतरिक स्थिरता पर सीधा खतरा होता है जो निम्नलिखित स्वरूपों में ध्यातव्य हैं –
भारत में स्वरूप और दायरा:
- हवाला, टैक्स चोरी, व्यापारिक फर्जीवाड़ा जैसे माध्यमों से भारत से पूंजी का अवैध रूप से बाहर जाना।
- क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवादी फंडिंग में बढ़ता उपयोग।
- शेल कंपनियों के जरिए ब्लैक मनी विदेश भेजकर भारत में विरोधी गतिविधियों की फंडिंग।
आतंक फंडिंग और सीमापार हस्तक्षेप:
- पाकिस्तान स्थित संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को हवाला और क्रिप्टो चैनलों से फंडिंग मिल रही है।
- 26/11 हमलों की फंडिंग भी शेल कंपनियों के ज़रिए की गई थी।
- IFFs का उपयोग भारत के कानून तंत्र को कमजोर कर कश्मीर और उत्तर-पूर्व में अस्थिरता पैदा करने के लिए किया जाता है।
राजनीतिक और आर्थिक जासूसी:
- विदेशी एजेंसियाँ IFFs का उपयोग लॉबिंग, मीडिया हेरफेर और कॉर्पोरेट जासूसी में कर रही हैं।
- टेलीकॉम, फार्मा, रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में शेल निवेश के माध्यम से विदेशी हस्तक्षेप।
- साइबर-अक्षम वित्तीय अपराधों के जरिए बैंकिंग ढाँचे पर हमले करके देश की आर्थिक विकास दर को बाधित करना।
परस्पर जुड़े हुए खतरों का त्रिकोण: डेटा, डार्क वेब और IFFs
- डेटा उल्लंघन → डार्क वेब पर बिक्री → उससे प्राप्त धन से आतंक फंडिंग या साइबर अपराध।
- ISIS जैसे संगठन डार्क वेब का उपयोग गुमनाम लेनदेन, हथियार खरीद और भर्ती के लिए करते हैं।
- Digital India जैसे कार्यक्रमों से साइबर अपराधियों को अवसंरचना को निशाना बनाने के और अवसर मिले हैं।
- सामान्य नागरिकों की साइबर साक्षरता की कमी भी एक बड़ी कमजोरी है।
हाइब्रिड युद्ध और ग्रे ज़ोन संघर्ष
चीन का “Unrestricted Warfare” मॉडल:
- 2020 में भारतीय रक्षा ठेकेदारों पर साइबर जासूसी।
- राज्य प्रायोजित हैकर्स द्वारा रणनीतिक जानकारी की चोरी – बिना किसी खुले युद्ध के।
पाकिस्तान का “Low-Intensity Conflict” मॉडल:
- साइबर प्रचार के माध्यम से जनमत को प्रभावित करना और आंतरिक तनाव पैदा करना।
- 2019 पुलवामा हमले के समय गलत सूचनाओं का प्रसार।
- डार्क वेब के जरिए हथियारों की तस्करी और आतंकी फंडिंग।
भारत की चुनौतियाँ:
- DDoS अटैक (जैसे 2016 में पाकिस्तानी हैकर्स द्वारा बैंकिंग सेक्टर पर अटैक हुआ था) के जवाब में सीमित विकल्प।
- इससे सार्वजनिक भरोसा, आर्थिक नुकसान और रणनीतिक असमर्थता पैदा होती है।
- भारत के लिए रणनीतिक सिफारिशें
सैन्य साइबर क्षमता सुदृढ़ करना:
- Defence Cyber Agency (DCyA) को स्वतंत्र Cyber Command के रूप में विकसित करना।
- सभी सैन्य रैंकों में साइबर प्रशिक्षण अनिवार्य बनाना।
डार्क वेब निगरानी:
- RAW, IB, NTRO, मिलिट्री इंटेलिजेंस के बीच एकीकृत साइबर इंटेलिजेंस फ्यूजन सेल स्थापित करना।
- AI और Machine Learning का उपयोग करके डार्क वेब गतिविधियों की निगरानी करना।
IFFs और क्रिप्टो निगरानी:
- FIU को सशक्त बनाना।
- सभी एक्सचेंजों पर सख्त KYC / AML लागू करना।
- FATF और INTERPOL से सहयोग।
सभी नेटवर्क/पोर्टल/डेटा भारत में ही होस्ट किया जाए – इसके लिए पर्याप्त डेटा सेंटर बनाए जाएँ।
भारत को अपनी स्वयं की चिप्स, AI चिप्स विकसित करनी चाहिए – ताकि डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित हो।
Whole-of-Government अप्रोच और अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
- NCCC (National Cyber Coordination Centre) को वास्तविक समय में खतरों की निगरानी की क्षमता दी जाए।
- QUAD, BIMSTEC जैसे संगठनों के साथ कानूनी संधियाँ हों।
- निजी साइबर कंपनियाँ, CERT-IN और शिक्षाविदों को शामिल करना।
भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ पारंपरिक सुरक्षा खतरों में साइबर डोमेन का एक नया और घातक आयाम जुड़ गया है। डेटा उल्लंघन, डार्क वेब ऑपरेशन, और IFFs – ये केवल अपराध नहीं, बल्कि आज के आधुनिक युद्ध के उपकरण हैं। भारत का विशाल डिजिटल पदचिह्न, जटिल सीमाएँ, और रणनीतिक प्रतिस्पर्धी इसे हाइब्रिड युद्ध का प्राथमिक लक्ष्य बनाते हैं। आज राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि Bytes, Blockchain और Bandwidth की रक्षा है। भारत को अपनी साइबर क्षमताएँ सैन्यीकृत करनी होंगी। साथ ही, डार्क वेब की निगरानी और आतंकवाद एवं जासूसी की वित्तीय जड़ों को समाप्त करना होगा।








