भूमि सीमाएँ और आर्थिक सुरक्षा: पूर्वोत्तर भारत में सीमा व्यापार और विकास
कावेरी जैन
भारत सात देशों के साथ कुल 15,106.7 किलोमीटर की भूमि सीमा साझा करता है। इसमें से 5,182 किलोमीटर, लगभग एक-तिहाई, पूर्वोत्तर क्षेत्र में है, जो बांग्लादेश, चीन, भूटान और म्यांमार के साथ सीमाएं साझा करता है। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र को न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी। जैसे-जैसे भारत अपनी आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास पर अपने दृष्टिकोण का पुनरावलोकन कर रहा है, वैसे-वैसे पता चल रहा है कि सीमा व्यापार पूर्वोत्तर भारत के लिए उसके नीतिगत ढाँचे के मुख्य बिन्दुओं में से एक होना चाहिए। । यह सीधे भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ से संबंधित है। इसका उद्देश्य सीमावर्ती बुनियादी ढांचे और संपर्क में सुधार करके आसियान और अन्य पूर्वी एशियाई देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाना है।
यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि ऐतिहासिक रूप से पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा की आर्थिक और रणनीतिक योजना में प्राथमिकता नहीं दी गई है। इस क्षेत्र को मुख्यतः खराब कनेक्टिविटी, जातीय तनाव और सुरक्षा चिंताओं के कारण, भौतिक और राजनीतिक दोनों रूप से एक भू-राजनीतिक परिधि के रूप में देखा जाता था। हालाँकि, भारत की एक्ट ईस्ट नीति इस क्षेत्र को दक्षिण पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में पुनर्स्थापित करने और विस्तारित पड़ोस के देशों के साथ सार्थक साझेदारी स्थापित करने का एक नया प्रयास है। भूमि सीमा व्यापार को बढ़ाना इस परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है, न केवल इसके आर्थिक पहलू के संदर्भ में, बल्कि व्यापक मानव सुरक्षा, सामाजिक समावेश और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी।
उत्तरपूर्व में सीमा व्यापार निश्चित रूप से कोई नई बात नहीं है और औपनिवेशिक युग के हस्तक्षेपों द्वारा इन संबंधों को बाधित करने से पहले सदियों से पारंपरिक सीमा पार आदान-प्रदान होता रहा है। आज, भारत के पास इस क्षेत्र में, विशेष रूप से बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार के साथ अपनी सीमाओं पर औपचारिक भूमि सीमा शुल्क स्टेशन (LCS) और एकीकृत चेक पोस्ट (ICP) हैं। इनके अलावा, कई महत्वपूर्ण व्यापार बिंदु हैं, जैसे मोरेह (मणिपुर) – तामू (म्यांमार), ज़ोखावथर (मिजोरम) – रिखावदार (म्यांमार) और दावकी (मेघालय) – तमाबिल (बांग्लादेश)। हालाँकि, इस व्यापार का अधिकांश भाग या तो सीमित मात्रा में है या अनौपचारिक प्रकृति का है और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे, प्रतिबंधात्मक नीतियों और सीमावर्ती समुदायों के बीच विश्वास की कमी जैसे कारकों से बाधित है।
सीमावर्ती हाट सीमा पर ‘तैयार और कच्चे’ ग्रामीण बाजारों को संदर्भित करते हैं। इनकी क्षमता को अक्सर पूर्वोत्तर भारत में, विशेष रूप से मेघालय और त्रिपुरा में भारत-बांग्लादेश सीमा पर, एक सफलता की कहानी के रूप में उद्धृत किया जाता है। इन हाटों ने स्थानीय आर्थिक जुड़ाव का मार्ग प्रशस्त किया है। इस प्रकार ये लोगों के बीच बेहतर संबंधों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन गए हैं और दूरदराज के क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका भी प्रदान करते हैं। हालाँकि, ये अभी बहुत छोटे हैं और आर्थिक रूप से परिवर्तनकारी बनने के लिए इनके उच्च स्तर के विस्तार की आवश्यकता है। यदि सीमावर्ती हाटों को बेहतर रसद, डिजिटलीकरण और द्विपक्षीय समन्वय के रूप में समर्थन प्राप्त हो, तो ये व्यापार एकीकरण के बड़े मंच बन सकते हैं।
ऐसी पहलें होने के बावजूद पूर्वोत्तर में सबसे तत्काल समस्याओं में से एक अविकसित सीमा अवसंरचना है। जो सड़कें मोरेह और ज़ोखावथर जैसे व्यापार बिंदुओं की ओर जाती हैं, वे अक्सर खराब स्थिति में रहती हैं, कस्टम सुविधाओं में पर्याप्त कर्मचारी नहीं होते हैं और व्यापार नीति अस्पष्ट या असंगत होती है। उदाहरण के लिए, भारत-म्यांमार सीमा पर व्यापार योग्य वस्तुओं के बारे में अस्पष्टता बनी रहती है और मोरेह पर आईसीपी जैसे परियोजनाओं के कार्यान्वयन में देरी होती है। इसके अलावा, उग्रवाद संबंधित चिंताएँ और जातीय तनाव स्थिति को और भी खराब बनाते हैं। इससे मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्यों में सुचारू व्यापार में बाधा आती है। इसलिए सीमा-व्यापार को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहचान और विश्वास-निर्माण के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
ऐसे परिदृश्य में आर्थिक सुरक्षा की धारणा बहुआयामी हो जाती है। यह केवल बाजारों पर पकड़ बनाने और निर्यात तक सीमित नहीं रह जाता और सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को स्थिर करने, क्षेत्रीय अंतर को कम करने और जीवनयापन के साधनों के नवीनीकरण का प्रश्न बन जाता है। पूर्वोत्तर, अपनी जैव विविधता, सांस्कृतिक समृद्धि, स्थानीय कारीगर समुदाय और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों के निकटता के साथ, हस्तकला, औषधीय जड़ी-बूटियों, जैविक उत्पादों और वस्त्रों जैसे सामानों के लिए व्यापार का क्षेत्रीय केंद्र बनने की क्षमता रखता है। इस क्षमता को साकार करने के लिए, क्षेत्र के राज्यों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, लॉजिस्टिकल समर्थन और सीमा पार मजबूत संस्थागत व्यवस्थाएं प्रदान किए जाने की आवश्यकता है।

पूर्वोतर भारत का विकास
इस संबंध में जापान इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकासात्मक भागीदार का प्रतिनिधित्व करता है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड (IMT) त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना में जापान की भागीदारी और असम एवं मणिपुर में कनेक्टिविटी का उन्नयन एक समृद्ध और स्थिर हिंद-प्रशांत के लिए एक साझा दृष्टिकोण के अच्छे उदाहरण हैं। गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे, सामुदायिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता पर जापान का ध्यान पूर्वोत्तर की आवश्यकताओं के बिल्कुल अनुरूप है। जापान की साझेदारी का उपयोग एक्ट ईस्ट फ़ोरम जैसे मंचों के माध्यम से अधिक नवीन और टिकाऊ सीमा व्यापार मॉडल शुरू करने के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। यह आर्थिक विकास को सामाजिक विकास के साथ मिलाने में भूमिका अदा कर सकता है।
इसके लिए नीति नवाचार सबसे अधिक आवश्यक है। समाधानों में से एक है – सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से विकास-नेतृत्व वाले सीमा प्रबंधन दृष्टिकोण में बदलाव करना। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर अत्यधिक सैन्यीकरण और प्रतिबंधात्मक पहुंच की स्थिति सामान्यतः वैध व्यापार को हतोत्साहित करने और स्थानीय जनसंख्या से अलगाव की ओर ले जाती है। नए आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण, जैसे कि विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZs), व्यापार गलियारे और प्रमुख सीमा शुल्क स्थलों (LCSs) के निकट संयुक्त सीमा-पार निवेश क्षेत्र, आर्थिक गतिविधियों को आकर्षित कर सकते हैं और साथ ही, संप्रभुता को अक्षुण्ण रख सकते हैं। इसके अलावा, सीमा व्यापार नीति स्थानीय संदर्भ पर निर्भर करती है। नागालैंड-मानवीर सीमा के आस-पास के लोगों की ज़रूरतें और सपने असम-भूटान या मेघालय-बांग्लादेश सीमाओं के लोगों की तुलना में काफी अलग हैं। एक विकेन्द्रीकृत संरचना वाला नीतिगत ढाँचा, जिसमें राज्य सरकारें, जनजातीय परिषदें और स्थानीय उद्यमी इनपुट प्रदान करें, निश्चित रूप से आवश्यक है। यह दृष्टिकोण न केवल भागीदारी के द्वार खोलेगा, बल्कि कम प्रतिरोध और प्रभावी कार्यान्वयन का स्रोत भी होगा।
क्षमता निर्माण एक और महत्वपूर्ण आधार है। सीमा शुल्क अधिकारियों से लेकर स्थानीय व्यापारियों तक, सभी हितधारकों को डिजिटल व्यापार सुविधा, जीएसटी प्रक्रियाओं, भाषा कौशल और अनुपालन मानकों में प्रशिक्षण की आवश्यकता है ताकि वे कुशलतापूर्वक व्यापार कर सकें। सीमा व्यापार में महिलाओं की भागीदारी और युवा उद्यमिता को प्रोत्साहित करने से इसकी समावेशिता और सामाजिक प्रभाव में और वृद्धि होगी।
वस्तुतः, पूर्वोत्तर में सीमा व्यापार की पुनर्व्याख्या सिर्फ एक व्यापारिक प्रयास नहीं है बल्कि राष्ट्र-निर्माण का एक अभ्यास है। यह भारत को दशकों की अनदेखी को सुधारने, अपनी सीमावर्ती जनसंख्या को सशक्त बनाने और इस क्षेत्र को अपनी आर्थिक कूटनीति में एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। भारत एक तेजी से विखंडित होते पड़ोस में आर्थिक सुरक्षा की तलाश कर रहा है। इसलिए पूर्वोत्तर को अब केवल रक्षा के लिए एक सीमा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सेतु के रूप में देखा जाना चाहिए जो न केवल दक्षिण पूर्व एशिया और उसके आगे के क्षेत्र से सीमा-व्यापार को बुलंद करेगा, बल्कि एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य के साथ भी भारत को जुड़ेगा।








