कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित पुनर्वापसी: इतिहास की सीख और वर्तमान की रणनीति
अश्विनी कुमार च्रोंगू
(37वीं होलोकॉस्ट दिवस (19 जनवरी, 2026) पर)
उन्नीस जनवरी 1990 को, आज से छत्तीस वर्ष पहले कश्मीर की धरती पर अपने ही घर में रहने वाले मूलनिवासी कश्मीरी पंडितों ने अपने इतिहास का सबसे काला अध्याय देखा था। दस हज़ार वर्षों से कश्मीर में निवास करने वाले इस समुदाय की लिपिबद्ध सांस्कृतिक यात्रा पाँच हज़ार वर्षों से अधिक की है। इस तारीख को एक बार फिर “रालिव, गालिव, चालिव – इस्लाम स्वीकार करो, मारे जाओ या भागो” – जैसे नारे सुनने को मजबूर हुआ। यह पहली बार नहीं था। सुल्तानों, शेहों, मुगलों, पठानों, 1931 और 1947 के दौर में भी यह त्रासदी दोहराई गई थी। परंतु इस बार यह अत्याचार तब हुआ जब भारत में संविधान, लोकतांत्रिक सरकारें, कानून का राज और मानवाधिकार विद्यमान थे। 1989-90 में हुए इस नरसंहार और जबरन पलायन के बाद विस्थापित समुदाय ने जम्मू में एक सम्मेलन आयोजित कर अपनी स्थिति पर मंथन किया। जुलाई 1990 की भीषण गर्मी में हुई दो दिवसीय ‘कश्मीरी हिंदू कन्वेंशन-1990’ में लगभग 500 प्रतिनिधियों ने कई प्रस्ताव पारित किए। इनमें से सर्वाधिक ऐतिहासिक था प्रस्ताव संख्या-4, जिसमें कश्मीरी हिंदुओं के लिए संवैधानिक सुरक्षा के साथ घाटी में एक सुरक्षित क्षेत्र बनाने की मांग की गई। यही प्रस्ताव आगे चलकर समुदाय के अस्तित्व-संघर्ष की आधारशिला बना।
सम्मेलन के बाद युवाओं ने इस संघर्ष को संगठित रूप देने का निर्णय लिया और 31 दिसंबर 1990 को ‘पनुन कश्मीर’ संगठन का जन्म हुआ। दिसंबर 1991 में आयोजित ‘मार्गदर्शन सम्मेलन’ में लगभग एक हजार प्रतिनिधियों ने मार्गदर्शन – 1991 प्रस्ताव को सर्वसम्मति से अपनाया। इस प्रस्ताव ने पहली बार स्पष्ट रूप से कश्मीरी हिंदुओं के लिए झेलम (वितस्ता) के उत्तर और पूर्व में स्वशासित क्षेत्र – होमलैंड – स्थापित करने का आह्वान किया। इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देने और भारतीय संविधान की पूर्ण एवं निर्बाध लागू सुनिश्चित करने की मांग की गई। मूलतः यह प्रस्ताव अनुच्छेद 370 व 35A समाप्त करने और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को समाप्त करने की अवधारणा का प्रस्थान बिंदु था।

कश्मीरी पंडितों का प्रदर्शन
1990 के दशक में देशभर में हुई अनेक सभाओं में इस प्रस्ताव का समर्थन हुआ। 13 जुलाई 2000 को ‘कश्मीरी पंडित प्रतिनिधि सभा’ ने इसी भावना में कश्मीर में हिंदुओं के अलग राज्य की मांग दोहराई। 2013 में भाजपा की ‘कश्मीर विस्थापित जिला इकाई’ ने भी घाटी में एक ही स्थान पर समुदाय की पुनर्वास नीति का प्रस्ताव पारित किया। मार्च 1994 में लेखक द्वारा दर्ज याचिका पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने जून 1999 में अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि “कश्मीरी पंडित समुदाय के साथ ऐसे कार्य हुए जो नरसंहार की श्रेणी में आते हैं।” दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस विस्थापन को “एथनिक क्लीनसिंग” अर्थात् जातीय शुद्धिकरण माना। यह मानव सभ्यता पर एक कलंक था। लेखक इस बात पर बल देते हैं कि इस त्रासदी की जिम्मेदारी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, इस्लामी कट्टरता और घाटी के उन सियासी तत्वों पर है जिन्होंने इन शक्तियों से हाथ मिलाया। तत्कालीन राज्य सरकारें और भारत सरकार, दोनों ही समुदाय की रक्षा के अपने दायित्व में विफल रहे।
तीन दशकों से अधिक समय से यह संघर्ष जारी है। पीढ़ियाँ बदल गईं, पर संकल्प नहीं टूटा। इसी क्रम में विधानसभा में निर्वासन भोग रहे कश्मीरी पंडितों के नामित प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया गया। लेखक ने साथियों संग यह प्रस्ताव सीमा-निर्धारण आयोग के समक्ष रखा, जिसने इसे उचित ठहराते हुए दो सीटें नामित करने की अनुशंसा की। दिसंबर 2023 में संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन संशोधन अधिनियम, 2019 में संशोधन कर कुल पाँच नामित सदस्यों में दो पंडित प्रतिनिधियों के लिए प्रावधान पारित किया। किंतु अब तक उन नामांकनों पर कार्यवाही लंबित है, जिससे समुदाय की पीड़ा और गहराई है। 5 अगस्त 2019 का ऐतिहासिक संविधान-संशोधन, जिसमें अनुच्छेद 370 और 35A हटा दिए गए, मार्गदर्शन प्रस्ताव के अधिकतर भाग को साकार करता है। परंतु उस नीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष – कश्मीरी हिंदुओं का वास्तविक पुनर्वास – अब भी अधूरा है। केवल सांवैधानिक बदलाव पर्याप्त नहीं हैं, जब तक सामाजिक-सांस्कृतिक और जनसंख्यिकीय संतुलन बहाल न हो। कश्मीरी हिंदुओं के बार-बार हुए पलायन का मूल कारण मुस्लिम बहुलता की असहिष्णु प्रवृत्ति रही, जिसने सहअस्तित्व को कभी स्वीकार नहीं किया। 1931, 1947 और 1986 की घटनाएँ इसकी गवाही देती हैं।
प्रधानमंत्री पैकेज के तहत रोजगार प्राप्त युवाओं का घाटी में रहना भी ‘समाधान’ नहीं, बल्कि सीमित आर्थिक राहत भर है। असल प्रश्न – सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी पुनर्स्थापन – अभी अनुत्तरित है।
आज, जब कश्मीरी पंडितों का समुदाय अपने 37वें होलोकॉस्ट दिवस पर अपने शोक और संघर्ष को याद कर रहा है, तो यह निर्णायक तथ्य उभरता है – या तो “होमलैंड” या सम्पूर्ण घाटी में “जनसांख्यिकीय संतुलन” – यही दो विकल्प उस न्यायपूर्ण पुनर्वास के हैं, जिसकी प्रतीक्षा यह समुदाय तीन दशकों से अधिक समय से कर रहा है। समय आ गया है कि राष्ट्र इस ऐतिहासिक न्याय को पूर्ण करे। विस्थापित समुदाय दृढ़ निश्चय के साथ दोहराता है – ना हम भूलेंगे, ना क्षमा करेंगे; हम लौटेंगे, अपने अस्तित्व और सम्मान के साथ।








