समुद्री सुरक्षा और भारत की आर्थिक प्रगति
वाइस एडमिरल अजेंद्र बहादुर सिंह (सेवानिवृत्त)
भारत एक ऐसा देश है जिसकी समुद्री संस्कृति 4000 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। भारतीय लोककथाओं और प्राचीन ग्रंथों से यह स्पष्ट होता है कि मोहनजोदड़ो, लोथल और हड़प्पा की सिंधु घाटी सभ्यता ने अफ्रीका, अरब, मेसोपोटामिया और भूमध्यसागरीय देशों से व्यापार और समुद्री गतिविधियों के माध्यम से समृद्धि प्राप्त की। बाद में, चोल साम्राज्य के शासनकाल में हिंदू और बौद्ध यात्रियों ने समुद्री माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक क्षेत्रों में प्रभाव फैलाया और व्यापार को बढ़ावा दिया। आज भी कम्बोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम जैसे देशों में इसके प्रमाण देखे जा सकते हैं। समुद्री माध्यम को प्रभाव फैलाने और संपन्नता अर्जित करने का सबसे शांतिपूर्ण तरीका माना गया है। हमारे समुद्री इतिहास से स्पष्ट होता है कि लगभग एक हजार वर्ष पूर्व ‘चोलों’ ने ही बड़े पैमाने पर इस समृद्धि-चक्र और संबंध की संकल्पना की थी। उन्होंने अपने व्यापार और सांस्कृतिक विस्तार की संपूर्ण रणनीति समुद्री अवधारणा पर आधारित रखी। उनका विश्वास था कि समुद्री व्यापार की सुरक्षा से संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। अधिक संसाधनों से समुद्री शक्ति का विकास होता है। एक सक्षम नौसेना समुद्री प्रभुत्व स्थापित करती है; जो आगे चलकर व्यापार और हितों की रक्षा करती है – और यह चक्र निरंतर चलता रहता है। 1498 में वास्को डि गामा के कालीकट पहुंचने के साथ ही भारत में पुर्तगाली समुद्री शक्ति का प्रवेश हुआ। इसके तुरंत बाद डच, ब्रिटिश और फ्रांसीसी समुद्री शक्तियाँ आईं। इनमें से कई देशों ने चोल मॉडल का अनुसरण कर अपने प्रभाव का विस्तार किया। यद्यपि भारत में ज़मोरिन्स और मराठों जैसी कुछ समुद्री शक्तियों ने विरोध किया, फिर भी यूरोपीय नौसेनाओं की विशाल Blue Water क्षमताओं के सामने वे टिक नहीं सके। इतिहास साक्षी है कि जब-जब भारत के समुद्री मार्ग और तट असुरक्षित हुए, इसका गहरा आर्थिक प्रभाव पड़ा।

स्वतंत्रता के बाद का समुद्री विकास
स्वतंत्रता के समय भारत के पास 32 छोटे जहाजों वाली सीमित नौसेना थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद से ही समुद्री क्षेत्र को सशक्त करने हेतु कई पहलों की शुरुआत की गई, जिसमें 1978 में कोस्ट गार्ड की स्थापना भी शामिल है। आज एक स्पष्ट समझ बनी है कि समुद्री क्षेत्र का दोहन आर्थिक समृद्धि और जनकल्याण के लिए आवश्यक है। समग्र राष्ट्रीय शक्ति के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में समुद्री शक्ति को पहचाना गया है और इसे विकास का एक प्रमुख आधार माना गया है। इससे “राष्ट्रीय समुद्री हित” और “समुद्री सुरक्षा के उद्देश्य” स्पष्ट रूप से परिभाषित किए गए हैं – ताकि भारत को “विकसित भारत 2047” तक ले जाने में समुद्री क्षेत्र का योगदान सुनिश्चित किया जा सके। भारत की 7-8% की वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर को देखते हुए – समुद्री व्यापार, समुद्र-आधारित अर्थव्यवस्था, बंदरगाह, तटीय अवसंरचना, मत्स्य पालन, शिपिंग, समुद्री व्यापार, अपतटीय ऊर्जा संसाधन, अंडरसी पाइपलाइन, इंटरनेट केबल्स और समुद्र की सतह के नीचे के संसाधनों का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। वर्तमान में भारत की 80% ऊर्जा आयात समुद्री मार्ग से होती है और लगभग 11% जीवाश्म ईंधन उत्पादन अपतटीय क्षेत्रों से आता है। भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 90% वॉल्यूम और 70% वैल्यू समुद्र के माध्यम से होता है। भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड जीडीपी का 45% है, और USD 25 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में यह और बढ़ेगा। अंडरसी इंटरनेट केबल्स हमारी अर्थव्यवस्था और आधुनिक जीवनशैली के लिए रीढ़ हैं। हाल के वर्षों में शिपिंग, पोर्ट्स और समुद्र-आधारित अर्थव्यवस्था में तेजी आई है जिससे समुद्री प्रभाव भी बढ़ेगा।
रणनीतिक दृष्टिकोण
आज की वैश्विक व्यवस्था उथल-पुथल की स्थिति में है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में गहरे संरचनात्मक संकटों से ग्रस्त है। संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार युद्ध और तकनीकी नियंत्रण को दमन के उपकरण के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। कुछ राष्ट्र अपनी आर्थिक शक्ति और सैन्य शक्ति दोनों का उपयोग और प्रभाव बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं। इसलिए भी हिंद महासागर क्षेत्र अब प्रतिस्पर्धा, टकराव और संघर्ष की अशांत लहरों से गुजर रहा है।
- इज़राइल संघर्ष: हमास द्वारा शुरू किया गया यह संघर्ष अब हिज़बुल्ला और यमन के हूती गुट तक फैल चुका है। बाब-एल-मंडेब के बंद होने से स्वेज नहर/लाल सागर मार्ग से होने वाला व्यापार प्रभावित हुआ है।
- इज़राइल–ईरान संघर्षः इज़राइल-ईरान संघर्ष और अमेरिका की संलिप्तता से पश्चिम एशिया की स्थिति अस्थिर हो गई है। यदि तनाव लंबा चला, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ईरान द्वारा होर्मुज जलसंधि को बंद करने की धमकी से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति को गंभीर झटका लग सकता है।
- रूस–यूक्रेन युद्ध: 1000 दिनों से अधिक समय से जारी यह युद्ध भारत की तेल, खाद और रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है।
- चीन से समुद्री क्षेत्र में तनाव: सीमा विवाद अनसुलझा है और चीनी नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में BRI और MSR के माध्यम से सैन्य ठिकाने बना रही है।
- विघटनकारी प्रौद्योगिकियाँ: अतिध्वनिक एवं बैलिस्टिक मिसाइलें, मानवरहित प्रणालियाँ, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, क्वांटम संगणना, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा मशीन लर्निंग – ये सभी समुद्री सुरक्षा के समक्ष नई और जटिल चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं।
समुद्री खतरों और चुनौतियों का मूल्यांकन
भारत के व्यापक समुद्री हितों के सामने पारंपरिक और अपारंपरिक दोनों प्रकार के खतरों से लगातार सतर्क रहना आवश्यक है।
पारंपरिक खतरे
ये मुख्यतः शत्रु राष्ट्रों से आते हैं जो सैन्य क्षमता और संसाधनों का उपयोग कर शत्रुतापूर्ण कार्रवाई कर सकते हैं। इनसे खतरे व्यापक स्तर पर होते हैं और ये बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं। उदाहरण: 1971 का भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर। इन खतरों का मुकाबला करना भारतीय नौसेना का प्रमुख उद्देश्य है।
अपारंपरिक खतरे
हाल के वर्षों में अपारंपरिक स्रोतों से समुद्री सुरक्षा को खतरा तेजी से बढ़ा है – विशेषकर जब इन्हें राज्य-प्रायोजित समर्थन प्राप्त होता है।
- समुद्री आतंकवाद: 26/11 के हमले ने समुद्री सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर किया। आधुनिक समुद्री आतंकवाद में COTS हथियारों, खुले समुद्री क्षेत्रों और राज्य-प्रायोजित कट्टरपंथी ताकतों की भूमिका है।
- समुद्र में डकैती और लूटपाट: 1980-90 के दशक में मलक्का जलडमरूमध्य में, और फिर 2000 के दशक में रेड सी वेस्टर्न हिंद महासागर तक फैला इसका जाल। भारतीय नौसेना ने 2008 से चार हजार से अधिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान की है।
- अनियमित समुद्री गतिविधियाँ: उच्च समुद्री क्षेत्र (High Seas) पर राष्ट्रों का नियंत्रण सीमित है, जिससे नशीले पदार्थों, हथियारों, मानव तस्करी जैसी गतिविधियाँ होती हैं। अवैध फिशिंग भी एक गंभीर चुनौती बन रही है।
- जलवायु परिवर्तन और आपदाएँ: बढ़ते समुद्री व्यापार से आग, टक्कर और तेल रिसाव जैसी घटनाओं में वृद्धि हुई है। भारतीय नौसेना ने सुनामी 2004 के दौरान जिस मानवतावादी भूमिका का निर्वहन किया था, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई थी।
भारतीय नौसेना और समुद्री सुरक्षा
भारतीय नौसेना भारत की राष्ट्रीय समुद्री शक्ति की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, जो लगभग 11,098.81 किमी तटीय क्षेत्र की सुरक्षा करती है। यह एक आधुनिक, संतुलित, बहुआयामी और नेटवर्क-सक्षम बल है, जो लंबी दूरी तक अपने प्रभाव डाल सकता है। भारतीय नौसेना की प्रमुख क्षमताएँ:
(a) समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता (Maritime Domain Awareness – MDA): उपग्रह-आधारित संचार, निगरानी एवं खुफिया प्रणालियों का उपयोग। गुरुग्राम स्थित IMAC / NC3I केंद्र से 24×7 सतत निगरानी।
(b) वायु संसाधन (Air Assets): मानवरहित निगरानी प्रणालियाँ, तटीय-आधारित विमान, हेलीकॉप्टर तथा विमानवाहक पोत-आधारित लड़ाकू जेट – समुद्री अभियानों के लिए।
(c) गहरे समुद्री संचालन क्षमता (Blue Water Capability): विमानवाहक पोत, विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर), फ्रिगेट, कोरवेट, मिसाइल/गश्ती पोत आदि – हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मिशन तैनाती हेतु।
(d) पनडुब्बी प्रतिरोधक क्षमता (Sub-Surface Deterrence):
कुल 20 पनडुब्बियाँ – डीज़ल-इलेक्ट्रिक एवं परमाणु ऊर्जा चालित, जिनमें मिसाइलें तथा अंडरवॉटर हथियार प्रणालियाँ सुसज्जित हैं।
यह विश्वास किया जाता है कि भारत को समुद्री राष्ट्र बनने के लिए नियति ने चुना है, और उसकी वर्तमान प्रगति समुद्र से अटूट रूप से जुड़ी हुई है। शायद यही कारण है कि पूरी दुनिया में केवल भारत ही ऐसा देश है जिसके नाम पर एक महासागर का नाम रखा गया है – हिन्द महासागर (Indian Ocean)। इसलिए, एक मजबूत, आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत, जिसकी वैश्विक आर्थिक पहचान हो, केवल तब संभव है जब हम आर्थिक विकास के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह के शब्दों में – “हमें यह याद दिलाना चाहिए कि हम कभी समुद्र-तट वाले एक स्थल-आवृत्त देश थे, लेकिन अब हम एक द्वीपवत् देश हैं जिसकी भूमि सीमाएँ हैं।”








