सीमाओं के पार: आतंकवाद, मानव तस्करी
और सुरक्षा की खोज
के. के. शर्मा (पूर्व महानिदेशक, सीमा सुरक्षा बल (BSF)
कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में उल्लेख किया है कि किसी राष्ट्र के पड़ोसी स्वाभाविक रूप से उसके शत्रु होते हैं। अतः उनके साथ अत्यंत सावधानीपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए। सीमाओं का प्रबंधन एक जटिल एवं बहुआयामी कार्य है। अतिक्रमी सदैव स्थल, तटीय क्षेत्रों अथवा वायु-पथ से प्रवेश के किसी सुलभ मार्ग की तलाश में रहता है। इसलिए सीमा प्रबंधन की कठिनाइयाँ विविध कारणों से उत्पन्न होती हैं, क्योंकि कुछ समुद्री सीमाएँ आज भी स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हैं, स्थल सीमाएँ पूर्णतः चिह्नित नहीं हैं, तथा कुछ सीमाएँ भौगोलिक नहीं अपितु कृत्रिम रूप से निर्धारित की गई हैं। अब हम भारत की सीमाओं को पड़ोसी देशों के साथ विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं:
भारत–पाकिस्तान सीमा
भारत-पाक सीमा को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है:
रैडक्लिफ रेखा: 2308 किमी, गुजरात से जम्मू (जम्मू-कश्मीर) तक।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LOC): 776 किमी, जम्मू, राजौरी, पुंछ, बारामुला, कुपवाड़ा, कारगिल व लेह के कुछ भागों से होकर।
एक्चुअल ग्राउंड पोजिशन लाइन (AGPL): 110 किमी, NJ 9842 से इंदिरा कॉल तक।
LOC और AGPL पर निरंतर तनाव, गोलीबारी, और आतंकवादियों की घुसपैठ की घटनाएँ सामने आती रही हैं, विशेषतः शीतकाल में। LOC की भौगोलिक रचना विविध प्रकार की है – रेगिस्तान, दलदल, समतल क्षेत्र, पर्वतीय क्षेत्र आदि। यह ऐसे इलाकों में फैली हुई है जो घुसपैठ के लिए अत्यंत सुलभ एवं छिद्रपूर्ण हैं। इस सीमा की छिद्रता के कारण हथियार, मादक पदार्थों, नकली मुद्रा (FICN) तथा मानव तस्करी जैसी आपराधिक गतिविधियाँ संभव हो पाती हैं। पंजाब सीमा पर हेरोइन और FICN का प्रवेश विशेष रूप से चिंताजनक है। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित दुष्प्रचार, धनशोधन, हवाला नेटवर्क एवं धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं।1947, 1965 और 1971 के तीन पूर्ण युद्धों के अतिरिक्त 1999 (कारगिल) एवं 2025 (ऑपरेशन सिन्दूर) के सीमित युद्धों तथा पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर एवं पंजाब में अलगाववादियों को सैन्य समर्थन दिए जाने के चलते भारत ने पाकिस्तान के प्रति कठोर नीति अपनाई है। पाकिस्तान की सैन्य-नियंत्रित शासन प्रणाली, भारत-विरोधी भावनाओं पर आधारित उसकी रणनीति, और “हजार घावों द्वारा भारत का रक्तस्राव कराना” वाली नीति (Zia Doctrine) क्षेत्र में दीर्घकालिक अस्थिरता को जन्म देती है।

भारत पाक सीमा
वर्तमान में ड्रोन के माध्यम से सीमाओं पर मादक पदार्थों एवं हथियारों की तस्करी की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी को सघनता से बसने की मुहिम, अवैध मस्जिदों व मदरसों की स्थापना, और प्रशासनिक उदासीनता इन प्रवृत्तियों को और बल देती हैं। इसे ISI के रणनीतिक प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। चीन, पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के रणनीतिक गठबंधन ने भारत के विरुद्ध त्रिकोणीय खतरे की आशंका को बढ़ा दिया है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को समर्थन भी स्थिति को और जटिल बनाता है।
भारत–चीन सीमा
भारत-चीन सीमा (3488 किमी) को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- पश्चिमी क्षेत्र: लद्दाख
- मध्य क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के जिले
- पूर्वी क्षेत्र: सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश

भारत चीन सीमा
चीन जम्मू-कश्मीर में 38,000 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्र पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा किए हुए है, जबकि पाकिस्तान ने POK का 5,180 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को सौंप दिया है। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताते हुए पूरा दावा करता है। चीन सीमा पर लगातार आधारभूत संरचनाओं का निर्माण कर रहा है और ‘स्लाइसिंग टेक्निक’ अपनाकर धीरे-धीरे भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करता है। डोकलाम, गलवान जैसी घटनाएँ इसकी विस्तारवादी मानसिकता को उजागर करती हैं। चीन की ‘String of Pearls’ रणनीति, UNSC और NSG में भारत का विरोध, तथा CPEC जैसी परियोजनाएँ चीन की भारत-विरोधी मंशा को स्पष्ट करती हैं। भारत द्वारा 2020 के बाद चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध, चीन की कंपनियों पर निगरानी, और सीमावर्ती अवसंरचना विकास जैसे उपाय उठाए गए हैं। हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक संकेत भी देखे गए हैं – मांसरोवर यात्रा की बहाली, वीज़ा जारी करना, और सीमित व्यापार सहयोग। परंतु चीन की प्रतिबद्धता पर सतर्क रहना आवश्यक है।
भारत–बांग्लादेश सीमा
भारत-बांग्लादेश सीमा (4096 किमी) भारत की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। यह पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा व मिज़ोरम से होकर गुजरती है। इस सीमा की सीमा-रेखा प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है, जो गाँवों, खेतों और नदियों से होकर गुजरती है, जिससे यह अत्यंत छिद्रपूर्ण बनती है। अवैध प्रव्रजन, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, और गौ-तस्करी जैसी समस्याएँ यहाँ प्रमुख हैं। मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड आदि का आसानी से मिल जाना इस संकट को और बढ़ाता है। 2015 का 119वां संविधान संशोधन भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से चले आ रहे ‘एनक्लेव’ विवाद को सुलझाने में सहायक रहा। हाल में यह देखा गया है कि सीमा क्षेत्रों में बाहरी मौलवियों के साथ मदरसों एवं मस्जिदों की संख्या बढ़ रही है, विशेषतः पश्चिम बंगाल एवं असम में। साथ ही, कुछ क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या का विस्थापन भी चिन्ताजनक है।

भारत- बांग्लादेश सीमा
भारत–नेपाल सीमा
भारत-नेपाल सीमा (1850 किमी) ऐतिहासिक रूप से खुली रही है और दोनों देशों के मध्य घनिष्ठ सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध विद्यमान हैं। भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि (1950) इस विशेष संबंध की आधारशिला है। हालांकि, कालापानी, लिपुलेख एवं सुस्ता जैसे कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर विवाद विद्यमान हैं। चीन द्वारा नेपाल में प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं। नेपाल की राजनीतिक वर्ग द्वारा भारत-विरोधी राष्ट्रवाद को हवा देना चिंताजनक है।
भारत–म्यांमार सीमा
यह सीमा (1643 किमी) 1967 में समझौते के अंतर्गत तय की गई थी। दुर्गम भू-भाग, जातीय टकराव, सीमापार जनजातीय संबंध और ‘गोल्डन ट्राएंगल’ के समीपवर्ती होने के कारण यह क्षेत्र नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए संवेदनशील है। मुफ़्त आवाजाही व्यवस्था (Free Movement Regime – FMR) को हाल में मणिपुर संकट के कारण समाप्त कर दिया गया है।
भारत–भूटान सीमा
699 किमी लंबी यह सीमा अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रही है। कुछ भारतीय विद्रोही समूहों द्वारा भूटान में शिविर स्थापित करने की घटनाओं के बावजूद भारत–भूटान संबंध मित्रवत बने हुए हैं।
तटीय सुरक्षा एवं द्वीप क्षेत्र
भारत की समुद्री सीमा (7516 किमी) विविधतापूर्ण है। समुद्र के रास्ते आतंकवादी गतिविधियाँ (1993 व 2008 की मुंबई घटनाएँ) तथा नशीले पदार्थों की तस्करी ने इस क्षेत्र को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।
वर्तमान में राज्य सरकारों द्वारा तटीय पुलिसिंग की उपेक्षा, स्टाफ की कमी एवं समन्वय की समस्याएँ चिंता का विषय हैं। एक केंद्रीकृत विशेषीकृत तटीय सुरक्षा बल की आवश्यकता है। बीएसएफ की जल इकाई का प्रयोग एक प्रभावी विकल्प हो सकता है। किसी भी राष्ट्र की शांति एवं समृद्धि उसकी भूमि और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा पर निर्भर करती है। भारत को चीन, पाकिस्तान और अब बांग्लादेश से भी सजग रहने की आवश्यकता है। सीमाओं की निगरानी हेतु वास्तविक समय में सूचना प्रेषण प्रणाली, विश्लेषणात्मक टूल्स, और भविष्यवाणी क्षमता को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। सीमा बाड़बंदी, प्रकाश व्यवस्था और प्रौद्योगिकी का उन्नयन आवश्यक है। एक सतर्क, निर्णायक और आधुनिक सीमा प्रबंधन प्रणाली ही भारत को सुरक्षित एवं समृद्ध बना सकती है।








