चुनाव से आगे की सोच: क्यों बंगाल भारत के लिए निर्णायक है
अश्वनी कुमार च्रोंगू
बीते वर्ष 2025 के अंतिम सप्ताह में भाजपा के राष्ट्रीय संगठनात्मक मामलों के प्रमुख और पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष ने नई दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका पाञ्चजन्य को एक विशेष साक्षात्कार दिया, जिसे मीडिया में व्यापक रूप से प्रसारित किया गया। प्रिंट मीडिया ने भी इस साक्षात्कार को प्रमुखता से प्रकाशित किया। यह पहली बार था जब भाजपा के इतने महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर आसीन नेता ने सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का विस्तृत साक्षात्कार दिया। परंपरागत रूप से, चूँकि भाजपा एक कैडर-आधारित राजनीतिक दल है, इसलिए महासचिव (संगठन) का पद पार्टी में अध्यक्ष के बाद अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ये महासचिव राष्ट्रीय और राज्य – दोनों स्तरों पर पार्टी की संगठनात्मक दिशा, नीति और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के प्रमुख सूत्रधार होते हैं। महासचिव (संगठन) की भूमिका भारतीय जनसंघ के समय के ‘ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी’ की आधुनिक कड़ी है।

बी एल संतोष, राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीजेपी
प्रायः इन पदों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रतिनियुक्त जीवनपर्यंत ‘प्रचारक’ नियुक्त किए जाते हैं। संगठनात्मक मामलों में पार्टी इन्हें अंतिम और सबसे विश्वसनीय स्तंभ के रूप में देखती है। बी.एल. संतोष कर्नाटक से आए एक पूर्णकालिक प्रचारक हैं और राष्ट्रीय दायित्व संभालने से पहले वे कर्नाटक में भी यही जिम्मेदारी निभा चुके हैं। संगठनात्मक मामलों में उन्हें एक अनुभवी और प्रभावशाली नेतृत्वकर्ता माना जाता है।
यह साक्षात्कार ऐसे समय में आया जब चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में चार माह के भीतर चुनाव होने वाले हैं। असम और पुडुचेरी में भाजपा-एनडीए की सरकार है, जबकि तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में ‘इंडिया’ गठबंधन से जुड़े दल सत्ता में हैं। भाजपा इन तीनों राज्यों में मजबूती से उभरती दिखाई दे रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल में पार्टी ने बीते एक दशक में विशेष रूप से भारी राजनीतिक निवेश किया है। लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद अब पार्टी को लग रहा है कि वह निर्णायक मोड़ के निकट है। बी.एल. संतोष ने सबसे पहले पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र के प्रश्न पर बात की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भाजपा में परामर्श और आंतरिक संवाद की परंपरा अन्य दलों की तुलना में कहीं अधिक सुदृढ़ और सक्रिय है। जनसंघ के दौर से ही – जब दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और गोविंदाचार्य जैसे नेता संगठन के प्रभारी रहे – पार्टी संविधान और परंपराओं के अनुसार समय पर आंतरिक चुनाव कराती रही है। 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद भी इस परंपरा में कोई विचलन नहीं आया। हाल ही में पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर उन्होंने बताया कि यह निर्णय लंबी परामर्श प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी जानकारी आम लोगों को औपचारिक घोषणा के समय मिलती है। राष्ट्रीय स्तर पर नितिन नबीन की कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति, भविष्य में उनके पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने की भूमिका का संकेत है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भाजपा में वंशवाद या सामंती मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी में अनुशासन के साथ स्वतंत्र विचार और संवाद को पूरा सम्मान दिया जाता है। आरएसएस और भाजपा के संबंधों पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में संतोष ने कहा कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति जैसे मूल वैचारिक मुद्दों पर आरएसएस प्रेरणा का प्रमुख स्रोत है, किंतु भाजपा एक स्वतंत्र संगठन है और अपने निर्णय स्वयं लेती है। दोनों संगठनों का संबंध मूल्यों और संस्कारों पर आधारित है, इसलिए उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से गहरा है। समाज और राष्ट्र से जुड़े विषयों पर परामर्श की प्रक्रिया में आरएसएस की भूमिका विशेष मानी जाती है।

साक्षात्कार का सबसे अधिक राजनीतिक महत्व रखने वाला वक्तव्य पश्चिम बंगाल को लेकर था। बी.एल. संतोष ने कहा, “बंगाल हमारे लिए केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं है, यह सभ्यतागत संघर्ष है। भारत को बचाने के लिए हमें बंगाल जीतना होगा। यह केवल हमारा 19वाँ या 20वाँ राज्य नहीं होगा, बल्कि देश को गंभीर जनसांख्यिकीय चुनौती से बचाने का माध्यम बनेगा।”
यह कथन भाजपा की रणनीति और वैचारिक दृष्टि दोनों को स्पष्ट करता है। इतिहास की ओर देखें तो बंगाल 1857 के बाद सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पुनर्जागरण का केंद्र रहा। लेकिन 1905 में बंगाल विभाजन ने 1947 में देश के सांप्रदायिक विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया। इसके प्रभाव आज भी पश्चिम बंगाल और असम में दिखाई देते हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ ने कई राज्यों में राजनीतिक, चुनावी और सामाजिक संतुलन को प्रभावित किया है। 1971 के बाद पश्चिम बंगाल की सरकारों पर इस समस्या को अनदेखा करने के आरोप लगते रहे हैं।
लेखक का मानना है कि अब समय आ गया है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बढ़ते जनसांख्यिकीय संकट से निपटने के लिए ठोस सरकारी कदम उठाए जाएँ। बांग्लादेश समर्थित अवैध घुसपैठ और देश के भीतर सक्रिय राजनीतिक तत्वों की भूमिका को सरकारी तंत्र के माध्यम से नियंत्रित करना आवश्यक है, लेकिन वर्तमान पश्चिम बंगाल सरकार ने इसमें सहयोग नहीं किया है। इसलिए राज्य में सत्ता-परिवर्तन को राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है। बी.एल. संतोष ने कहा कि चुनाव जीतना हर राजनीतिक दल का लक्ष्य होता है, भाजपा भी इससे अलग नहीं है। लेकिन भाजपा सत्ता का आनंद लेने के लिए सत्ता में नहीं आना चाहती, बल्कि समाज और राष्ट्र में आवश्यक परिवर्तन लाने के लिए सत्ता को साधन मानती है। अनुच्छेद 370 और 35कैपिटलए की समाप्ति जैसे निर्णय राजनीतिक शक्ति के बिना संभव नहीं थे। नीति और विचारधारा को धरातल पर उतारने के लिए प्रशासनिक और राजनीतिक शक्ति अनिवार्य है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्ता का उपयोग राष्ट्रहित के विषयों को सामने लाने और जन-जागरण के लिए किया जा सकता है। ‘औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति’ की वर्तमान चर्चा इसी दिशा का उदाहरण है। एक अन्य प्रश्न पर संतोष ने कहा कि राजनीति हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती। कभी-कभी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए घुमावदार रास्ता अपनाना पड़ता है। जैसे नदी कई बार दो धाराओं में बँटकर आगे फिर मिल जाती है। भाजपा अपने मूल आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध है, भले ही रणनीति में लचीलापन दिखे। उन्होंने कहा कि भाजपा प्रक्रियाओं का केंद्रीयकरण नहीं करती, बल्कि अवधारणाएँ केंद्रीय होती हैं। जमीनी स्तर से नेतृत्व को उभरने दिया जाता है और युवा पीढ़ी को अवसर दिए जाते हैं। यह विकेंद्रीकृत प्रक्रिया यथास्थिति और हितबद्ध समूहों को हावी नहीं होने देती तथा पार्टी को निरंतर गतिशील बनाए रखती है।
लेखक का मानना है कि इस प्रकार के साक्षात्कार भविष्य में भी होने चाहिए, ताकि पार्टी के विरुद्ध फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का पर्दाफाश हो सके और कार्यकर्ताओं व आम जनता तक तथ्यात्मक तथा सकारात्मक विमर्श पहुँच सके।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं। संपर्क: ashwanikc2012@gmail.com)








