सोमनाथ: सीमा, सभ्यता और स्वाभिमान की सहस्राब्दी
– भोगेन्द्र पाठक
सोमनाथ भारतीय सभ्यता की वह चेतना-धुरी है जिसके चारों ओर इतिहास की आँधियाँ घूमती रहीं, किंतु जिसकी ज्वाला कभी मंद नहीं पड़ी। सोमनाथ का नाम लेते ही भारतीय चेतना के अतल-पृष्ठों पर एक दीर्घ स्मृति-ज्योति प्रज्वलित हो उठती है, जैसे आदिगुरु शिव की ध्यान–निमीलित दृष्टि स्वयं सागर–तट पर खड़ी होने का आह्वान कर रही हो। यह केवल एक शिवालय नहीं, यह उस आत्मबल का प्रतीक है, जिसने विध्वंस के प्रत्येक प्रहार को पुनर्निर्माण के संकल्प में बदल दिया। जहाँ एक ओर आततायियों की शक्ति थी, वहीं दूसरी ओर समाज की सामूहिक श्रद्धा – ग्रामजन, साधु, शासक और शिल्पी। ये सब सहस्रों साल से एक ही भाव में जुड़े रहे हैं। इसी सतत प्रतिरोध और पुनर्स्थापन की परंपरा से ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का उद्भव हुआ है, जो सहस्राब्दि से प्रवहमान आस्था का आधुनिक उद्घोष है।

फोटो:सोमनाथ मंदिर
समुद्र–तट पर प्रथम ज्योतिर्लिंग
सनातन शास्त्र कहते हैं कि चन्द्रदेव ने दक्ष–शाप से मुक्ति पाने के लिए जहाँ तप किया, वहीं सोमनाथ का आदि-ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। इसलिए यह मंदिर केवल शिव–आराधना नहीं, चन्द्र–किरणों और सागर–लहरों के मिलन से जन्मी एक पार्थिव–अलौकिक अनुभूति है। पश्चिमी तट के प्रभास–पाटन पर स्थित यह देवालय प्राचीन भारत के समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक संपर्क और आध्यात्मिक सामर्थ्य का केन्द्र था। यहाँ से भारतीय जहाज संसार के दूरस्थ तटों तक केवल वस्तुएँ नहीं, भारतीय दर्शन की मृदु आभा भी ले जाते थे। सोमनाथ की प्रतिष्ठा केवल धार्मिक न रहकर राजनीतिक और आर्थिक भी रही; यही कारण था कि जो भी भारत की आत्मा को तोड़ना चाहता, वह पहले इस मंदिर के शिखर को निशाना बनाता, यह सोचकर कि यदि इस दीप–स्तम्भ को बुझा दिया गया, तो समूची सभ्यता का हृदय निर्बल हो जाएगी। परन्तु इतिहास ने बार–बार सिद्ध किया कि यह आकलन कितना कपोल–कल्पित था। इतिहास का सत्य यह है कि हर बार यह केन्द्र और अधिक प्रबल होकर पुनर्स्थापित हुआ, मानो स्वयं सभ्यता ने यहाँ अपने अमरत्व की घोषणा कर दी हो।
विध्वंस की आग, स्मृति की दृढ़ता
जनवरी, 1026 में महमूद गज़नी का आक्रमण सोमनाथ पर केवल एक आक्रामक लूट-अभियान नहीं, भारतीय स्वाभिमान पर सुनियोजित प्रहार था। मन्दिर की स्वर्ण–मण्डित प्रतिमाएँ और रत्नजटित द्वारों को लूट कर वह लौट गया, पर जिस ज्योति को वह बुझा समझ बैठा था, वह तो भारतीय जन–मन में और भी अधिक गहन दीप्ति से जलने लगी। तत्कालीन समाज को कंपा देने वाला यह विध्वंस आगे चलकर एक दीर्घकालीन सामूहिक संकल्प का बीज बन गया। भारत के मन ने यह सिद्ध कर दिया कि देवालय गिर सकता है, देवत्व नहीं; शिखर टूट सकता है, पर श्रद्धा की रेखा को कोई तलवार नहीं काट सकती। इसीलिए इतिहास में बार–बार सोमनाथ का पुनर्निर्माण हुआ। कभी स्थानीक राजाओं ने, कभी दूर बैठे पराक्रमी शासकों ने, कभी धर्मप्राण जन–समुदाय ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद इस तेज–पीठ को पुनः प्रतिष्ठित किया। मराठा काल और विशेषतः अहिल्याबाई होल्कर के प्रयासों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय समाज अपनी स्मृति–रेखा को जितनी बार मिटाने की चेष्टा देखता है, उतनी ही दृढ़ता से उसे पुनः अंकित कर डालता है।
टूटीं सीमाएँ, तो टूटे मंदिर
मंदिरों पर आक्रमण केवल धार्मिक असहिष्णुता का प्रश्न नहीं, वह सीमा–भंग, सभ्यता–भंग और राष्ट्र–भंग का प्रतीक भी है। सीमाएँ जब तक सुरक्षित रहीं, सोमनाथ जैसे मंदिर व्यापार–मार्गों की तरह ही सुरक्षित रहे; किन्तु जैसे ही सीमाओं पर राजनीतिक दुर्बलता ने जन्म लिया, बाहरी आक्रांताओं के लिए प्रथम लक्ष्य वही मंदिर बने, जो समुद्र–किनारे राष्ट्र की चेतना के प्रहरी की भाँति खड़े थे। इसलिए मंदिर–विध्वंस का इतिहास दरअसल सीमा–विध्वंस का ही दूसरा नाम है; जहाँ भी सीमाएँ ढहीं, वहाँ–वहाँ भारतीयता के प्रतीक–स्तम्भ तोड़े गए, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ अपने गौरव–स्मारकों से वंचित हो जाएँ और आत्म–संदेह की गर्त में धँसती चली जाएँ। परन्तु यही वह क्षण था, जहाँ भारतीय समाज ने, ग्रामों–कस्बों के अनाम नायकों ने, यह प्रण लिया कि पत्थरों को तोड़ा जा सकता है, पर स्मृति की इस अंतर्धारा को कोई हाथ स्पर्श तक नहीं कर सकता।
आज सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक कहा जाता है, वह वस्तुतः इसी अंतर्धारा की स्वीकारोक्ति है। एक सहस्राब्दी से अधिक समय तक बार–बार झंझावात झेलकर भी यह स्थल यह उद्घोष करता रहा कि भारत की असली शक्ति तलवार या ताज में नहीं, बल्कि उस अदृश्य श्रद्धा-सूत्र में है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी जन–मानस को जोड़ता चला आ रहा है। यह यात्रा भारत की निष्ठा और आत्मविश्वास की सद्यः गाथा है। यहाँ धार्मिक विध्वंस के अनंत सत्य हैं, पर भारत ने उसका केन्द्र भय नहीं, पुनरुत्थान कर दिया है। जैसे समुद्र की लहरें शिला–तट से टकराकर भी थमती नहीं, वैसे ही सोमनाथ के कटु सत्य में हर आक्रमण के बाद श्रद्धा की नयी लहर उठी, जिसने टूटे शिखरों को फिर श्वेत–धवल आकाश की ओर बढ़ा दिया। इसलिए कहते हैं कि सोमनाथ केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, सामूहिक स्मृति का केन्द्र है, जहाँ भौतिक संरचना भले कई बार बदली, पर उस पर अंकित भाव–रेखा कभी नहीं मिट सकी। यही वह बिन्दु है जहाँ सोमनाथ एक मंदिर से आगे बढ़कर स्मृति-गर्व–तीर्थ बन गया – एक ऐसा तीर्थ, जो हमें याद दिलाता है कि सभ्यताएँ केवल निर्माण–कला से नहीं, स्मरण–संस्कृति और जीवन-कला से भी जिया करती हैं।
स्वतंत्रता के बाद पुनर्स्थापन
स्वतंत्रता के पश्चात जब राष्ट्र के सामने अपने बिखरे आत्मविश्वास को समेटकर उसे नये स्वरूप में गढ़ने का प्रश्न था, तब सोमनाथ के पुनर्निर्माण का विचार एक सामान्य धार्मिक परियोजना नहीं, राष्ट्रीय पुनर्जागरण की घोषणा बना। सरदार वल्लभभाई पटेल ने, के.एम. मुंशी जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साधकों के साथ मिलकर, सोमनाथ को पुनः खड़ा करने का जो संकल्प लिया, वह भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष रूपरेखा के भीतर रहकर भी सांस्कृतिक पुनर्स्मरण का आदर्श उदाहरण बना। यह पुनर्निर्माण दूसरे के प्रति घृणा से प्रेरित नहीं था; यह अपने भीतर सोई हुई शक्ति को पुनः पहचानने का प्रयास था – एक ऐसा यज्ञ, जिसमें राजनीति और अध्यात्म, दोनों की आहुति लगी, पर हवि के रूप में निकला राष्ट्रीय स्वाभिमान। आधुनिक सोमनाथ, नागर शैली और मारु–गुर्जर सौन्दर्य के सम्मिलन से निर्मित, केवल स्थापत्य-कौशल नहीं, यह घोषणा भी है कि नई भारतीयता अपनी परम्परा को आधुनिक संवैधानिकता के साथ जोड़े बिना पूर्ण नहीं हो सकती।
सोमनाथ की कथा गिरने की नहीं, उठने की कथा है। भारत की मूल–शक्ति उसके उठ–खड़े हो जाने में है; यह भूमि गिरना जानती है, पर पड़ा रहना नहीं जानती। मंदिर ध्वंस हुए, पर संकल्प नहीं टूटा। सोमनाथ का इतिहास संहार की पुनरावृत्ति नहीं, पुनर्निर्माण की निरंतरता का इतिहास है। यह निरंतरता बताती है कि भारतीय सभ्यता संकट को अंत नहीं, आत्म-पुनरुत्थान का अवसर मानती है। यह गाथा इतिहास की राख से आशा के दीप चुन लेती है। कितने ही देवालय गिरे, पर आस्था नहीं गिरी – वह हर बार और ऊँची उठी, और मंदिर फिर खड़े हो गए। मंदिरों का विध्वंस हुआ, किंतु उससे सभ्यता विनष्ट नहीं हुई। अयोध्या में राममंदिर का पुनर्स्थापन इसी दीर्घ सांस्कृतिक संकल्प का प्रतिफल है। आक्रमणकारी स्मृति के कोनों में सिमट गए, पर सभ्यता के प्रतीक आज भी चेतना के केंद्र में आलोकित हैं। जो सभ्यता गिरकर भी उठ खड़ी हो, वही अमर होती है। सोमनाथ उसी अमरता का नाम है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि सोमनाथ की स्मृति को हम केवल रोष के साथ नहीं, नव–निर्माण के संकल्प के साथ जोड़ें; यदि यह मंदिर लगातार गिरकर उठ सकता है, तो हमारा राष्ट्र भी अपने खोये हुए वैभव को पुनः प्राप्त कर सकता है। जैसे वे गीता के “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि…” का स्मरण कराते हैं, वैसे ही सोमनाथ की लहरों का उदाहरण देकर कहते हैं कि घृणा की शक्ति क्षणिक है, पर सद्गुण और श्रद्धा की शक्ति सहस्राब्दियों तक समाजों को खड़ा रख सकती है।
सभ्यतागत सामूहिक पुरुषार्थ
जब ध्वस्त मंदिर का शिखर उठता, तब केवल पत्थर नहीं, समाज की रीढ़ भी सीधी हो जाती है। सोमनाथ-संदर्भ को ही देखें – भक्ति, पराक्रम और श्रम–दान के संगम ने सोमनाथ की महिमा को नये–नये रूपों में पुनर्सृजित किया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि विरासत केवल विरासत में नहीं मिलती, उसे पुनः अर्जित भी करना पड़ता है। ऋषियों ने ऐसे भारतवर्ष के भविष्य की स्थापना की जो अपने भूतकाल से न तो भागता है, न अटकता है; वह उसे स्मरण कर आगे बढ़ने की शक्ति ग्रहण करता है। सोमनाथ इस कल्पना में एक केन्द्र–बिन्दु की तरह है – जहाँ धर्म, संस्कृति, भूगोल और अर्थनीति का संगम होता है; एक तीर्थ, जो साथ ही साथ बन्दरगाह भी है, स्मृति भी है और स्वप्न भी। यहाँ भारत केवल सीमा–रेखाओं में बँधा राजनीतिक राष्ट्र नहीं, एक दीर्घ–जीवी सभ्यता के रूप में उपस्थित है, जिसकी पहचान उसके मंदिरों, तीर्थों, नदियों, महाकाव्यों और जन–चेतना की सलिला से होती है। सोमनाथ इसी सभ्यतागत भारत का मूर्त प्रतीक है, जहाँ सहिष्णुता दुर्बलता नहीं, आत्म–विश्वास से उपजी उदारता है; और स्मरण प्रतिशोध नहीं, आत्म–बोध का साधन है।

सोमनाथ मंदिर.
भारत वैभव
सोमनाथ की मूल गाथा यह बताती है कि यहाँ शिखर कई बार टूटा, पर आत्मा कभी नहीं टूटी। देहरी कई बार उजड़ी, पर देवलोक की उस आभा को कोई छू भी न सका, जो भारतीय जन–मन के भीतर सोमनाथ को एक अनश्वर मंत्र की तरह प्रतिष्ठित कर चुकी थी। आज भी जब समुद्र की लहरें सोमनाथ के चरणों को स्पर्श करती हैं, तो लगता है मानो वे युगों–युगों से एक ही संदेश दोहरा रही हों कि जो स्वयं को बार–बार रचने की क्षमता रखता है, उसे इतिहास मिटा नहीं सकता।
सीमा चेतना
सोमनाथ केवल एक आध्यात्मिक प्रतीक नहीं; यह गुजरात की समुद्री सीमा का सर्वोच्च प्रहरी भी है। अरब सागर की लहरों के बीच, भारत के सबसे पश्चिमी तट पर खड़ा यह मंदिर सदियों से भारतीय सीमा-सुरक्षा का प्रतीक रहा है। महमूद गज़नी का आक्रमण केवल एक धार्मिक हमला नहीं था; यह सीमा-भंग का संकेत था। इसलिए सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ को पुनः खड़ा करने का जो संकल्प लिया, वह सनातन सभ्यता और भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष रूपरेखा के भीतर रहकर भी सांस्कृतिक पुनर्स्मरण का आदर्श उदाहरण बना। सरदार पटेल को यह समझ थी कि भारत की जल-सीमा पर खड़ा यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि राष्ट्र की सीमांत चेतना का प्रतीक है। 1947 में विभाजन के तुरंत बाद, जब पश्चिमी सीमा नई राजनीति का शिकार हो गई थी, तब सोमनाथ का पुनर्निर्माण नए भारत की सीमा-चेतना को जाग्रत करने में समर्थ सिद्ध हुआ था।
अरब सागर इस क्षेत्र की प्राकृतिक समुद्री सीमा है, और सोमनाथ इसी सीमा पर खड़ा भारत का अडिग आध्यात्मिक प्रहरी। यहीं से भारतीय नाविक अफ्रीका, अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपनी व्यापारिक और सांस्कृतिक पहुँच बनाते थे। जो भी भारत की आत्मा को तोड़ना चाहता, वह पहले इस मंदिर के शिखर को निशाना बनाता, यह सोचकर कि यदि इस दीप–स्तम्भ को बुझा दिया गया, तो समूची हिन्द-सभ्यता का हृदय निर्बल हो जाएगा, और सीमांत रक्षा की निर्बलता भी प्रकट हो जाएगी।
वस्तुतः सोमनाथ केवल गुजरात के प्रभास–पाटन में स्थित एक ज्योतिर्लिंग न रहकर सम्पूर्ण भारत के लिए यह सन्देश बन जाता है कि जो राष्ट्र अपनी स्मृति, श्रद्धा और स्वाभिमान की रक्षा करता है, वही समय के कालखण्ड में अनवरत बना रहता है। यही सोमनाथ की अमर वाणी है, यही भारतीयता के सहस्राब्दी–दीप की अविच्छिन्न लौ है। यही कारण है कि युगों के विध्वंस भी मंदिरों को समाप्त नहीं कर सके। यही उसकी अमर वाणी है, और यही भारतीयता की वह अविराम दीपशिखा है, जो इतिहास नहीं, भविष्य का भी मार्ग आलोकित करती है।








