सरहद पर सतर्कता: राष्ट्र-रक्षा की संरचना
भारत की सीमा आज वह नहीं है जो महाभारत के समय में थी। तब सेनापति सीमा पर सतर्क रहते थे – सशस्त्र, सजग, अपराध के आने के बाद प्रतिक्रिया करने के लिए तैयार। परंतु आज, राष्ट्रीय सुरक्षा और सुरक्षा दर्शन रूपांतरित हो गए हैं। यह न केवल प्रतिक्रिया का दर्शन है, बल्कि ‘रक्षा को उसी स्थान पर पहुँचाने का’ दर्शन है जहाँ अपराध की जड़ है, क्योंकि रक्षा तब प्रभावकारी होती है जब हम उसी स्थान पर वार करते हैं जहाँ से आक्रमण की शृंखला शुरू होती है। यह दृष्टि न तो आक्रामकता है, न ही आत्मरक्षा की परंपरागत समझ। यह संरक्षणात्मक आक्रमण की एक दार्शनिक स्थिति है। भारत आज अपनी सीमा की रक्षा के लिए न केवल सीमा पर खड़ा है, बल्कि अपराध की जड़ तक पहुँचने के लिए प्रतिबद्ध है। यह दृष्टि 2016 के उरी सर्जिकल स्ट्राइक्स से लेकर 2019 के बालाकोट वायु प्रहार तक, और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर तक विकसित हुई है।
बांग्लादेश में जो घटित हो रहा है, वह भारत को गहराई से स्पर्श करता है। अगस्त 2024 से लेकर जून 2025 तक, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन एकता परिषद् ने 2,442 साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं दर्ज की हैं। 69 मंदिरों पर हमले हुए, 157 परिवारों की संपत्तियाँ जलाई गईं, ऐर महिलाओं पर अनगिनत अत्याचार हुए हैं। ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं। ये राष्ट्रीय चेतना के सवाल हैं।
सुरक्षा केवल सीमा की ही नहीं, बल्कि सभ्यता के मूल्यों की भी करनी है। आज जब सीमा के पार अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हमलों का तूफान बह रहा है, तब भारत के भीतर एक विशेष सतर्कता जाग्रत हुई है। जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन और पाकिस्तान से जुड़ी इन-जैसी शक्तियाँ सीमा पार कर भारत को अस्थिर करने का लक्ष्य रखती हैं। इन सब के विरुद्ध भारत की सतर्कता न केवल सुरक्षा का विषय है, बल्कि राष्ट्र धर्म का भी विषय है। नवंबर 2025 में, जब डोवल ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान से गोपनीय बातचीत की, तो भारत ने तीन बातें स्पष्ट कीं: पहली, आतंकवादियों की समय से पहले रिहाई की चिंता। दूसरी, सीमावर्ती इलाकों में चरमपंथी ठिकानों की मौजूदगी। तीसरी, बांग्लादेश में इस्लामवादी प्रभाव की बढ़ती प्रवृत्ति। यह केवल राजनीतिक चिंता नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना पर होने वाले प्रभाव की भी चिंता है।
वस्तुतः यह एक विचार मात्र है कि आतंकवाद किसी भी धर्म से नहीं जुड़ा है। फिर भी, यह वह दिशा है जिस पर भारत अपनी सीमावर्ती नीति निर्मित कर रहा है – न कि धार्मिक विद्वेष के आधार पर, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय सत्य के आधार पर।
स्मार्ट सीमा, स्मार्ट राष्ट्र
भारत-बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर सीमा पर बीएसएफ की गश्तें दोगुनी कर दी गई हैं। लेकिन यह केवल संख्यात्मक बदलाव नहीं है। यह तकनीकी क्रांति है। ड्रोन निगरानी, रीयल-टाइम खुफिया साझेदारी, साइबर सुरक्षा, उपग्रह निगरानी – ये सभी अब एक समन्वित तंत्र का हिस्सा हैं। अक्टूबर 2025 में भारतीय सैन्य बुद्धिमत्ता विभाग ने बांग्लादेश का दौरा किया और आतंकवादियों व नेटवर्कों की विस्तृत जानकारी साझी की। यह वह प्रकार की सहयोगिता है जो दोनों देशों के बीच एक नई समझ का संकेत देती है – शून्य सहिष्णुता का संकेत। नवंबर 2025 में कोलंबो सुरक्षा संगठन की बैठक हुई, जहाँ भारत के प्रमुख सुरक्षा सलाहकार और बांग्लादेश के सुरक्षा सलाहकार दोनों अपने-अपने हितों की रक्षा करने के लिए आए थे। परंतु इसके पहले, नवंबर 19 को, भारत की गोपनीय बातचीत ने जो संदेश दिया, वह यह था कि भारत आपस में मित्रता की चाहत रखता है, परंतु अपनी सीमा और अपनी सभ्यता की रक्षा में कोई समझौता नहीं करेगा। मालदा में बांग्लादेशी नागरिकों के लिए होटलों के दरवाजे बंद करना – यह कोई प्रशासनिक उत्पीड़न नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रकटीकरण है। इससे स्पष्ट है कि हम देख रहे हैं, हम समझ रहे हैं, और हम सतर्क हैं।

फोटो: सीमा सुरक्षा बल, भारत
राष्ट्र सुरक्षा रणनीति
भारत अपनी प्रथम व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा पर विचार कर रहा है। इसके स्तंभ होंगे – रक्षा आधुनिकीकरण, तकनीकी उन्नति, साइबर सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, हाइब्रिड खतरों से निपटना, आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक कूटनीति। यह स्पष्ट करता है कि भारत की सुरक्षा दृष्टि कितनी व्यापक है। भारत के प्रमुख सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल ने अक्टूबर 2025 में सरदार पटेल स्मृति व्याख्यान में घोषणा की थी कि भारत में आतंकवाद को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा चुका है, और 12 साल हो गए बिना किसी बड़े आतंकवादी हमले के। यह सफलता की घोषणा नहीं है, बल्कि यह सतर्कता की साधना का फल है।
सीमा, संरक्षण, संकल्प
भारत-बांग्लादेश सीमा पर जो सुरक्षा कवच खड़ा किया गया है – बाहर से सशस्त्र सतर्कता, भीतर से सांस्कृतिक चेतना – यह शक्ति और संवेदनशीलता का दुर्लभ संयोजन है। बीएसएफ के जवान, गुप्तचर एजेंसियों के अधिकारी, प्रशासनिक व्यवस्था, और सबसे ऊपर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की दूरदर्शी नीति – सभी मिलकर यह संदेश दे रहे हैं कि भारत सतर्क है, सीमा दृढ़ है, व्यवस्था अडिग है, और सबसे महत्वपूर्ण – भारत का धर्म जाग्रत है। यह केवल भारत-बांग्लादेश के बीच का मामला नहीं है। यह दक्षिण एशिया में राष्ट्रीय सुरक्षा, धार्मिक सद्भावना, और सीमान्त विकास के नए आयाम को परिभाषित करता है।








