चिकन नेक की छाया में भारत के पूर्वोत्तर का भविष्य
भारत राष्ट्र की सीमा केवल भौगोलिक सीमा नहीं, वह सभ्यता की भी सीमा है, क्योंकि भारतीय सीमाओं के भीतर और भारतीय सीमाओं के बाहर पाकिस्तान और बांग्लादेश में सभायता-संस्कृति का आमूल विभेद व्याप्त है। । जब सीमांत-सुरक्षा शिथिल होती है, जब विश्वास टूटता है, जब इन नापाक देशों में अल्पसंख्यक समुदाय नरसंहार के शिकार होते हैं, तो यह केवल पड़ोसी देश की विफलता नहीं – यह भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता की ही परिभाषा का प्रश्न बन जाता है।
पिछले सोलह महीनों में, बांग्लादेश में हिंदू और अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध एक संरचनागत उत्पीड़न की विभीषिकाएँ घटित हुई हैं। बांग्लादेश हिंदू, बौद्ध, ईसाई एकता परिषद् के अभिलेखों के अनुसार, अगस्त 2024 से जून 2025 तक 2,442 हिंसक घटनाएँ रिकॉर्ड की गई हैं। खुल्ना क्षेत्र में 295 घरों को नष्ट किया गया, 152 से अधिक मंदिरों पर आक्रमण हुए, और 1,705 परिवार विस्थापित हुए। भारतीय गृह मंत्रालय 23 हिंदुओं की हत्या का सत्यापन करते हैं। यह केवल सांप्रदायिक दंगा नहीं है – यह एक जनांकिकीय विलोपन है, एक सभ्यतागत अपराध है। 1971 में, बांग्लादेश की हिंदू जनसंख्या 22 प्रतिशत थी। आज, यह 8 प्रतिशत से कम है। यह संख्या किसी भी विद्वान् को स्तब्ध कर देगी – एक पूरी पीढ़ी का विलोपन, एक सांस्कृतिक विरासत का क्षरण, भारतीय सभ्यता की एक शाखा का पतन।
चीन का रणनीतिक खेल
शेख हसीना की सरकार के पतन के तत्काल बाद बांग्लादेश की नई सरकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक सूक्ष्म किंतु निर्णायक भू-राजनीतिक पुनर्निर्धारण करने लगी। मार्च 2025 में बीजिंग की यात्रा के दौरान यूनुस ने चीन के साथ आर्थिक सहयोग के नौ समझौते किए, जिनमें 2.1 अरब डॉलर का निवेश प्रस्ताव शामिल है। भारतीय सीमा से मात्र कुछ किलोमीटर दूर लालमोनिरहाट में एक वायु सेना अड्डे का निर्माण भारत के पूर्वी वायु कमान के लिए एक सीधी चुनौती प्रस्तुत करता है।
यह केवल अर्थशास्त्र नहीं, यह राजनीति का सबसे गहरा खेल है। चीन, सिलीगुड़ी कॉरिडोर (भारत की ‘चिकन नेक’) को घेरने का एक दीर्घकालीन रणनीति क्रियान्वित कर रहा है। यह 20-22 किलोमीटर की संकरी भूमि पट्टी जो भारत के पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र (असम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश) को मुख्य भारत से जोड़ती है, भारत की सबसे महत्वपूर्ण, किंतु सबसे असुरक्षित सीमा है।

सीमांत सुरक्षा का संकट
भारत की प्रतिक्रिया आज तक सैन्य दृढ़ीकरण के माध्यम से व्यक्त हुई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर में तीन नई सैन्य छावनियाँ स्थापित की हैं। भारत की सेना ने 100,000 से 150,000 कर्मियों को तैनात किया है। सेला सुरंग और चिकन नेक सुरंग परियोजनाएँ, अवसंरचना का आधुनिकीकरण – ये सब भारत की रणनीतिक दृढ़ता के प्रतीक हैं। किंतु सेना और अवसंरचना अकेले पर्याप्त नहीं हैं। सीमांत गाँवों में जब नागरिक असुरक्षित महसूस करते हैं, जब वे अपने धार्मिक विश्वास के लिए भयभीत होते हैं, जब वे अपने घर-व्यवसाय की रक्षा नहीं कर सकते, तो सीमा ही आंतरिक रूप से कमजोर हो जाती है। अभी भी 864 किलोमीटर सीमा बिना बाड़े की है। यह तस्करी, घुसपैठ, और अराजकता के लिए खुले द्वार हैं।
भारतीय विदेश नीति का कठोर संकल्प
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने संसद प्रवचन में सुस्पष्ट किया है कि यह केवल हिंसा का प्रश्न नहीं है – यह हिंदू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध एक व्यवस्थागत उत्पीड़न है। फरवरी 2025 में, उन्होंने बांग्लादेश के विदेश सलाहकार से कहा था कि बांग्लादेश को अपना मन बना लेना चाहिए कि क्या वह भारत के साथ सराहनीय संबंध चाहता है? यदि हाँ, तो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा अपरिहार्य है। यह कूटनीति का एक नया, कठोर, किंतु न्यायसंगत रूप है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद् में भारत के द्वारा इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। व्यापार-संबंध पुनर्परीक्षित हो रहे हैं। ट्रांसशिपमेंट सुविधाएँ वापस ली गई हैं। यह एक रणनीतिक दबाव है – आर्थिक, राजनयिक, और सामरिक।
सीमा-जागरण की दूरदृष्टि
सीमा की सुरक्षा केवल सैन्य दृढ़ता से नहीं होती। वह सीमांत नागरिकों की समृद्धि, सुरक्षा, और सांस्कृतिक सम्मान से अभिन्न है। यदि भारत अपने पूर्वोत्तर को आर्थिक केंद्र में रूपांतरित करे, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करे, सीमांत गाँवों को विकास दे, तो कोई बाहरी शक्ति सफल नहीं हो सकती। बांग्लादेश में हिंदुओं का उत्पीड़न भारत की विदेश नीति की विफलता नहीं है – यह भारत को अपनी आंतरिक शक्ति को पुनः खोजने, अपनी सभ्यता को पुनः परिभाषित करने का अवसर है। सीमांत ही राष्ट्र की आत्मा है। जब तक सीमा सुरक्षित है, जब तक सीमांत समाज सशक्त है, जब तक वह अपनी संस्कृति को गर्व से धारण करता है, तब तक भारत अजेय रहेगा।








