मलारी: हिमालयी सीमांत पर भारत का अडिग प्रहरी
उत्तराखंड के चमोली जिले में, धौली गंगा घाटी के कंधे पर जहाँ बर्फीली चोटियाँ तिब्बत सीमा पर निरंतर पहरेदारी करती हैं, वहाँ दस हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित मलारी गाँव अविचल सूरमा की तरह खड़ा है। यह गाँव न केवल एक एक महत्वपूर्ण भौगोलिक गाँव है, बल्कि हिमालय की तपस्या का साक्षी, सीमा–चेतना का मूर्त रूप भी है। भारत की समग्र सीमा-प्रबंधन नीति का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण जीवंत केस-स्टडी है।
जोशीमठ से लगभग 61 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मलारी, नंदा देवी जैव-मंडल संरक्षण क्षेत्र के भीतर स्थित एक विरासत-स्थल है। यहाँ की जनसंख्या 300 से 350 परिवारों तक सीमित रह गई है। यहाँ रहने वाले भोटिया जनजाति का योद्धा-समाज इस सीमांत को राष्ट्र-रक्षा का अभेद्य गढ़ मानता आया है। विशेष रूप से मार्छा और तोलछा समुदाय। ये लोग तिब्बत-गढ़वाली की मिश्रित भाषा बोलते हैं। यहाँ के ग्रामवासी 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से निरंतर 60 से अधिक वर्षों से सीमा-रक्षा का कर्तव्य-निर्वहन कर रहे हैं।

फोटो: मलारी,उत्तराखंड
इनकी यह अविच्छिन्न सीमा-चेतना आधुनिक राष्ट्र-सुरक्षा का एक अमूल्य, आंतरिक-शक्ति है। स्लेट की छतों वाले अपने पहाड़ी मकान ये देवदार और भोजपत्र के वनों से निर्मित करते हैं। इनके आवास सरलता में छएटे-छोटे दुर्ग–सदृश लगते हैं। यहाँ हर ईंट एक शक्ति-प्रतीक है, हर दीवार एक सीमा–रक्षक और हर छत एक पहरेदार के समान। यह जलवायु-अनुकूल टिकाऊ निर्माण-शैली दर्शाती है कि कैसे इन समुदायों ने हजारों वर्षों से कठोर हिमालयी पर्यावरण में अनुकूल परिस्थिति बनाकर रहना सीखा है। मलारी की पवित्र मिट्टी को संपूर्ण गढ़वाल में सबसे पवित्र माना जाता है। सभी धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ-कर्मकांड में इसे विशेष तौर पर मंगवाया जाता है। यह पवित्रता भोटिया योद्धाओं के संघर्ष और उनकी आत्मार्पण-भावना से आई है।
मलारी के सम्यक विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य-सेवा, टिकाऊ कृषि-सुधार, और महिला-सशक्तीकरण आवश्यक हैं। यहाँ पर्यटन की विशाल संभावनाएँ हैं – नीति-वैली ट्रेकिंग, नंदा-देवी-सेंक्चुअरी तक पहुँचने का यह एक महत्वपूर्ण बेस-पॉइंट है। यहाँ से आगे बढ़ने के लिए विशेष परमिट की आवश्यकता है, क्योंकि यह नीति घाटी का रणनीतिक प्रवेशद्वार है। बर्फीली चोटियों के मध्य, तिब्बत-सीमा के निकट, जहाँ धौली गंगा की गर्जना सदा सीमा-रक्षा की अवाज़ बनी रहती है, वहाँ मलारी गाँव न केवल एक भौगोलिक स्थल है, बल्कि भारत की अदम्य वीरता का अजेय अग्निमंदिर और शाश्वत दुर्ग भी है।








