ग्नाथंग : सीमा के सिल्क रूट पर भारत का प्रथम गाँव
पूर्वोत्तर का अनमोल रत्न और हिमालय की गोद में खिला पहाड़ों का फूल सिक्किम के पूर्वी छोर पर, 13,500 फीट की विराट ऊँचाई पर अवस्थित सीमांत ग्राम ग्नाथंग भारत का वह प्रथम घर है, जहाँ सूर्यदेव अपनी स्वर्णिम रश्मियों से सबसे पहले धरती का अभिनंदन करते हैं। यहीं से तिब्बत की सीमा सबसे निकट आती है और यहीं से राष्ट्र की भोर आरम्भ होती है। ग्नाथंग नाम भर ही नहीं है, यह पर्यटकों के लिए एक मधुर अनुभूति है। वस्तुतः ग्नाथंग मात्र एक भौगोलिक बिंदु नहीं है। यह भारतीय चेतना का एक ऊर्ध्वगामी पर्वतीय मंदिर है, जहाँ इतिहास की स्मृतियाँ, संस्कृति की धड़कन, राष्ट्रीयता की अटूट भावना और प्रकृति की निःशब्द भव्यता एक साथ परमात्मा के चरणों में समर्पित प्रतीत होती हैं। यह कोई संयोगवश चुना गया स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्र-नियति द्वारा रचा गया वह शिखर है, जहाँ भारत की सीमा-सुरक्षा की प्रथम पंक्ति अडिग प्रहरी बनकर खड़ी है – शांत, सजग और संकल्पबद्ध।
क्या आप जानते हैं कि ग्नाथंग केवल एक गाँव नहीं, इतिहास की धड़कन है? 13वीं-14वीं शताब्दी से लेकर आज तक यह स्थल प्राचीन सिल्क रूट का एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र रहा है, जहाँ भारत और तिब्बत के बीच वस्तुओं के साथ-साथ विचारों, आस्थाओं और संस्कृतियों का भी आदान-प्रदान होता रहा। समय बदला, मार्ग बदले, पर ग्नाथंग की केंद्रीयता अक्षुण्ण रही। यहाँ बौद्ध मठों की घंटियों की मधुर निनाद, हिंदू मंदिरों की आरती की सुगंध और वनस्पतियों की मौन साधना – तीनों एक अद्भुत आध्यात्मिक सामंजस्य में गुंथे हुए प्रतीत होते हैं। इस ग्राम की स्त्रियाँ, बुज़ुर्ग और बच्चे – सब अदम्य साहस और सहज गरिमा से भरे हैं। उनके साथ सीमा पर सजग खड़े भारतीय सैनिक न केवल रक्षक, बल्कि परिवार के सदस्य-से पूरे परिवेश को अपनत्व और विश्वास के एक दुर्लभ भाव से भर देते हैं। जब कंचनजंघा की हिमाच्छादित चोटियों पर सूर्य स्वर्णाभिषेक करता है, कुपूप झील मौन प्रार्थना में लीन प्रतीत होती है, और ईगल्स नेस्ट बंकर के योद्धाओं की तपस्या आत्मा को स्पर्श कर जाती है, तब मन, दृष्टि और हृदय तीनों एक साथ रोमांच से स्पंदित हो उठते हैं। यह दृश्य केवल देखा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार द्वारा ‘अंतिम गाँव’ की अवधारणा को ‘प्रथम गाँव’ में रूपांतरित करना एक ऐतिहासिक दृष्टि-परिवर्तन है। ग्नाथंग इसी राष्ट्रीय संकल्प का सजीव प्रतीक है। वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के अंतर्गत 6,839 करोड़ रुपये का विशाल निवेश केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा खड़ा करने का प्रयास नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का व्यापक अभियान है।
आज प्रथम गाँव ग्नाथंग वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम का एक सक्रिय अंग है। यह सीमा-चेतना का वह बिंदु है, जहाँ तकनीक और परंपरा, सैनिक और संत, सीमा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक बनकर साथ चलते हैं। यहाँ सुदृढ़ सड़क संपर्क और डिजिटल नेटवर्क आकार ले रहे हैं, पर्यटन सर्किट स्थानीय आय को सशक्त कर रहे हैं, कृषि सहकारिताएँ और स्थानीय उद्योग नई ऊर्जा पा रहे हैं, तथा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ जन-जीवन तक प्रभावी रूप से पहुँच रही हैं।
ग्नाथंग आज केवल सीमा पर बसा गाँव नहीं, यह भारत के आत्मविश्वास, दूरदृष्टि और राष्ट्र-चेतना का हिमालयी उद्घोष है। यह है भारत माता के खूबसूरत आँचल का एक कोना – जहाँ भारत के सीमावर्ती संतानों को सुरक्षा भी मिलती है और समृद्धि का आशीर्वाद भी। ग्नाथंग न केवल एक गाँव है; यह भारत के आत्मसम्मान, सीमा-सतर्कता और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत साक्षी है।








