ऑपरेशन मेघना हेलिड्रॉप : भारत की सीमाओं को अजेय बनानेवाली विजय
9 दिसंबर 1971, रात 23:30 बजे – जब पूर्वी पाकिस्तान की भूमि पाकिस्तान से आजादी के लिए कराह रही थी, आर्तनाद कर रही थी, तब भारत का आकाश गर्जन कर उठा। यह न तो मंद गूँज थी, न ही सामान्य युद्ध-घोष। यह था भारत का पौरुष, जो विमान के नभ-निनाद के साथ मानवता का संदेश ले जा रहा था। इतिहास के पन्नों में स्वर्ण-अक्षरों से लिखी जानेवाली यह वही रात थी जब भारत ने सीमा की सुरक्षा की एक नई परिभाषा रचि दी।
संकट का क्षण : 3 दिसंबर से लेकर 9 दिसंबर तक
3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर वायु-आक्रमण किया। यह वह क्षण था जब युद्ध के सर्वोच्च शिखर पर दोनों राष्ट्र आमने-सामने खड़े हो गए। परंतु भारतीय वायुसेना ने जो प्रदर्शन किया, वह विश्व-इतिहास का एक अविस्मरणीय अध्याय बन गया। पाकिस्तानी एफ-86 सैबर विमानों के सामने, भारतीय हंटर और गनैट विमानों ने आकाश पर अपना वर्तस्व बना लिया। 3-6 दिसंबर, तीन दिनों में, भारतीय सेना पूर्वी मोर्चे पर तेजी से ढाका की ओर बढ़ रही थी। लेकिन 6-7 दिसंबर तक आते-आते एक विराट समस्या उत्पन्न हो गई – मेघना नदी। यह नदी जिसकी चौड़ाई सबसे संकीर्ण स्थान पर भी साढ़े तीन हजार मीटर थी – भारतीय सेना के रास्ते में एक दुर्लंघ्य बाधा के रूप में खड़ी हो गई। पाकिस्तानी सेना ने अशुगंज पुल को आंशिक रूप से विस्फोट से ध्वस्त कर दिया था। तब 57 माउंटेन डिवीजन और अन्य भारतीय इकाइयाँ मेघना के दक्षिणी किनारे पर अवरुद्ध रह गईं। ढाका, जो मात्र 60 किलोमीटर दूर था, वह भी असीम दूरी बन गया था।

AI इमेज: ऑपरेशन मेघना हेलीपैड
असंभव को संभव बनाने का संकल्प : लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह का महानिर्णय
9 दिसंबर की दोपहर, 4 कॉर्प्स के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह थे। वे एक सैन्य रणनीतिज्ञ थे जिनके हृदय में साहस की अग्नि और दिमाग में युद्ध-कला की प्रज्ञा प्रज्ज्वलित थी। उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया – “धरती पर आ सकते नहीं, तो आकाश से आओ।” यह निर्णय बाद में सैन्य इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। यह कोई साधारण सैन्य आदेश नहीं था। यह था असंभव को संभव बनाने का संकल्प, वह संकल्प जिसने भारत को और महान राष्ट्र बना दिया। इसी घोषणा के साथ ऑपरेशन मेघना हेलिड्रॉप का जन्म हुआ। इसे ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ भी कहा जाता है।
आकाश से धरती पर उतरी विजय
9 दिसंबर 1971, रात 23:30 बजे, राइपुरा हेलिपैड (मेघना नदी के दक्षिणी किनारे) से Mi-4 हेलिकॉप्टरों का एक बेड़ा उड़ान भरा। ये हेलिकॉप्टर जिन्हें मूलतः वरिष्ठ कमांडरों और घायलों को ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था उन्हें सशस्त्र सैनिकों, बारूद-खाद्य और राष्ट्र की आशा को मेघना के उत्तरी किनारे नारसिंदी तक पहुँचाना था।

फोटो : हेली लैंडिंग मेघना ऑपरेशन
ऑपरेशन के पहले चरण में 7-8 दिसंबर को सिलेट में रक्षणात्मक लिफ्ट ली गई। लगभग 800 सैनिकों को सिलेट में हेलिलिफ्ट किया गया, ताकि पाकिस्तानी सेना के उत्तरी अग्रभाग को रोका जा सके। दूसरे चरण में 9-13 दिसंबर को मेघना नदी पार करने का महान अभियान चलाया गया। यह ऑपरेशन का मुख्य और सर्वाधिक साहसिक चरण था। 9 दिसंबर की रात 23:30 से शुरू होकर 13 दिसंबर की सुबह तक, 110 हेलिकॉप्टर सॉर्टीज में 4/5 गोरखा राइफल्स और 311 माउंटेन ब्रिगेड के सैनिकों को मेघना नदी के उत्तरी किनारे स्थित नारसिंदी तक ले जाया गया। 36 घंटों का यह निरंतर अभियान एक ऐसी उपलब्धि थी, जिसका कोई तुलनीय उदाहरण विश्व के सैन्य इतिहास में दुर्लभ है। तीसरे और अंतिम प्रहार के सहारे 14 दिसम्बर को ढाका को पूर्ण रूप से घेर लिया गया। 14 दिसंबर को, दौदकांडी हेलिपैड से बैद्य बाज़ार (नारायणगंज के पास) तक एक पूरी बटालियन को तेजी से तैनात किया गया। हर सॉर्टी यानी उड़ान में 40-50 सैनिक होते थे। 150 से अधिक उड़ानें भरी गईं। 5,000 सैनिक। 680 टन सामान और गोला-बारूद । अंधेरी रात, पाकिस्तानी आर्टिलरी की बौछार … फिर भी एक भी हेलिकॉप्टर नहीं खोया। यह था भारतीय सैन्य कौशल, तकनीकी दक्षता और मानवीय साहस का त्रिगुणात्मक संयोजन। साथ ही, भारतीय वायुसेना के हंटर और ग्लैट विमान एमआई-4 हेलिकॉप्टरों के लिए आकाशीय छतरी का काम कर रहे थे। पाकिस्तानी आर्टिलरी, मशीन गन – कोई भी हमला इन शूरवीरों को लक्ष्य भेद नहीं सके। कलकत्ता से लाई गई सैकड़ों टॉर्च को मेघना के किनारे सजाया गया, ताकि रात के अंधकार में भी पायलटों को लैंडिंग का सटीक निशान दिखाई दे। एमआई-4 हेलिकॉप्टर अप्रस्तुत, अनियमित जमीन पर उतरने के लिए प्रशिक्षित थे। पीटी-76 उभयचर टैंक मेघना के किनारे तैनात किए गए, जो हेलिलिफ्ट किए गए सैनिकों को तुरंत युद्ध के लिए अग्रसर कर देते थे।

AI इमेज: भारत पाक युद्ध (पूर्वी पाकिस्तान)
इस तैनाती से ढाका पूर्ण रूप से घिर गया। पाकिस्तानी सेना अब तीनों ओर से भारतीय सेना के पराक्रम की जद में आ गई थी। स्क्वाड्रन लीडर पुष्प वैद अपनी हेलिकॉप्टर यूनिट के कमांडर थे। 3 दिसंबर से 16 दिसंबर तक भारत के सैनिक योद्धा 24 घंटे काम करते रहे। सोना, खाना सब कुछ के लिए समय सिर्फ हेलिकॉप्टर को ईंधन भरवाते समय ही मिलता था। 10-15 मिनट की नींद, फिर अगली उड़ान। तीनों सेनाओं का अद्भुत समन्वय से पाकिस्तान के अहंकार और अत्याचार को परास्त किया गया। वायुसेना ने आकाश को नियंत्रित किया, थलसेना ने जमीन पर आक्रमण किया, और जलसेना ने खासकर पूर्वी समुद्री क्षेत्र में पाकिस्तानी नौसेना को निष्क्रिय रखा।
भारत की सीमाओं का सुदृढ़ीकरण और राष्ट्र की शक्ति
ढाका का तेजी से पतन
12 दिसंबर को, ऑपरेशन मेघना के महज 3 दिन बाद, भारतीय सैनिक ढाका के मात्र 12 किलोमीटर पास पहुँच गए। पाकिस्तानी सेना की पीठ पर जो रक्षा-ढाल थी, वह टूट गई। 16 दिसंबर 1971 को, ढाका के रेसकोर्स मैदान पर 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण हुआ। यह विश्व के इतिहास में सर्वाधिक विशाल सैन्य आत्मसमर्पण था। इससे बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म लिया।
भारत के लिए लाभ और सीमा-सुदृढ़ता
सीमांतीय शक्ति-संतुलन में परिवर्तन हुआ। पूर्व में दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा खतरा पूर्वी पाकिस्तान समाप्त हो गया। अब भारत-बांग्लादेश सीमा एक मैत्रीपूर्ण सीमा बन गई, न कि युद्ध-क्षेत्र। इससे भारत की पूर्वी सीमा काफी सुरक्षित हुई। बांग्लादेश की 4,096.7 किलोमीटर की पश्चिमी सीमा अब भारत की सीमा बन गई। परंतु यह सीमा किसी शत्रु की नहीं, बल्कि एक भाईचारे की सीमा के रूप में स्थापित हुई थी। इससे भारत को नई दिल्ली से लेकर सुदूर पूर्व तक एक विस्तृत, सुरक्षित भू-भाग मिल गया। साथ ही, भारत का भू-राजनीतिक आयतन का विस्तार हुआ। 1971 के बाद, भारत दक्षिण एशिया की सर्वप्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित हुआ। चीन, पाकिस्तान और अन्य प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र भी भारत की सैन्य क्षमता को स्वीकार करने लगे।
इससे भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए लाभ हुआ। असम, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा की सुरक्षा सरल हो गई। ये सीमावर्ती राज्य अब पाकिस्तानी सेना के सीधे खतरे से मुक्त हो गए। इससे इन राज्यों में आर्थिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश संभव हुआ। सीमांतजनों की सुरक्षा और कल्याण के मार्ग खुले। 1971 के बाद से, पूर्वी सीमा पर पाकिस्तानी घुसपैठ और सीमापार आतंकवाद में भारी कमी आई। सीमा के गाँवों में अब किसानों और व्यापारियों को व्यापार करने की स्वतंत्रता मिल गई। साथ ही, बांग्लादेश-भारत सीमा पर, विशेषकर बंगाल के क्षेत्र में, अब साहित्य, संगीत, धर्म और परंपरा का द्विमुखी आदान-प्रदान संभव हुआ। 2 मिलियन से अधिक सांस्कृतिक यात्राएँ वर्ष में होने लगीं। इतना ही नहीं, भारत-बांग्लादेश व्यापार जो 1971 में शून्य था, वह अब 2024 में 18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया है। सीमावर्ती गाँवों में व्यापारियों के लिए नई आजीविका के अवसर खुल गए।
एक विश्व महानायक के स्वरूप में भारत ने एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म कराया, वहाँ की पीड़ित जनता को आजादी दिलाई, अपनी पूर्वी सीमाओं को सुरक्षित किया, विश्व को दिखा दिया कि राष्ट्र केवल शक्ति से नहीं, नैतिकता से बनते हैं, और सीमा जागरण की परिभाषा को भी स्थापित किया।
जय हिन्द! जय सीमा! जय भारत!








