विजय दिवस: भारत के पौरुष का महानुष्ठान
16 दिसंबर केवल तिथि नहीं है, यह भारत के पौरुष की प्रतिज्ञा का उदय-दिवस है। यह वह क्षण है जब इतिहास ने भारतमाता के मस्तक पर विजय का रक्ताभ तिलक अंकित होते देखा। उस दिन सूर्य पश्चिम से नहीं, सीमाओं से उग रहा था – जहाँ भारतीय सैनिकों के हृदय में हौसले की अग्नि दहक रही थी। यह वह दिवस है जब रावलपिंडी का गर्व हिमालय की प्रतिध्वनि में गल गया। जब राष्ट्र ने इतिहास की क़लम छीनकर भूगोल की रेखाएँ बदल दीं। धरती ने देखा कि संवेदना जब शस्त्र धारण करती है, तब अत्याचार का अंत अवश्यंभावी होता है।
1971 – यह केवल एक वर्ष नहीं, वह कालखंड था जब पूर्वी पाकिस्तान आर्तनाद कर रहा था। निर्दोष बंगाली जनता पर अत्याचार के पहाड़ टूट रहे थे और तब भारत, केवल राजनैतिक शक्ति नहीं, बल्कि धर्म, करुणा और कर्तव्य का जीवित प्रतीक बनकर खड़ा हुआ। जब 3 दिसंबर को पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत के नभ-मंडल को चुनौती दी, तब उसने यह नहीं जाना कि वह अपने ही विनाश को आमंत्रण दे रही है। केवल तेरह दिन और सामर्थ्य, संकल्प व रणनीति के इस महासमर में भारत ने विश्व को बताया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और मानवता की त्रिवेणी से जीते जाते हैं।
ढाका का रेसकोर्स मैदान उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना जब जनरल नियाज़ी के काँपते हाथों ने आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए। वह स्याही नहीं, पाकिस्तान के गाल पर अंकित पराजय की कालिख थी। 93 हज़ार सैनिकों का आत्मसमर्पण मानव इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य समर्पण! भारत की सेना ने पृथ्वी पर वह अद्भुत दृश्य रचा, जब विजय के सामने भी करुणा का झरना बह निकला। भारत ने किसी भूमि को नहीं लिया; उसने स्वाधीनता का वरदान दिया। इस विजय के साथ केवल एक सेना पराजित नहीं हुई, बल्कि उत्पीड़न, अन्याय और दमन की संहिता ढह गई। यह विजय राजनीतिक दृष्टि से भी भारत के स्वाभिमान की निर्णायक घोषणा थी। विश्व राजनीति के मंच पर भारत अब एक नीति-निर्धारक शक्ति के रूप में उभरा, जिसने महासत्ताओं के बीच संतुलन बनाया, शीतयुद्ध की ध्रुवीय राजनीति को मानवीय दिशा दी। इस युद्ध में भारत ने न तो किसी साम्राज्य की लिप्सा दिखाई और न ही किसी मज़हबी द्वेष को स्थान दिया। यह कारुण्य की विजय थी।
सामरिक दृष्टि से 1971 का भारत-पाक युद्ध भारतीय सेनाओं की रणनीतिक निपुणता और दक्ष नेतृत्व का विराट उदाहरण है। वायुसेना की गति, थलसेना की योजना और नौसेना की घेराबंदी – इन तीनों ने मिलकर आधुनिक युद्धकला का ऐसा अद्भुत संगम प्रस्तुत किया, जिसे विश्व की सैन्य अकादमियाँ आज भी अध्ययन करती हैं। ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ और ‘ऑपरेशन मेघना हेलिड्रॉप’ जैसे अदम्य अभियानों ने यह सिद्ध कर दिया कि अनुशासन, दूरदृष्टि और तकनीकी सूझबूझ के आगे संख्याबल का अहंकार व्यर्थ है।
आर्थिक दृष्टि से इस युद्ध ने भारत की आत्मनिर्भरता के सूत्र को भी जन्म दिया। सीमित संसाधनों में भारत ने जिस क्षमता से युद्ध लड़ा, उसने भावी दशकों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन की प्रेरणा दी। यह वही काल था जिसने भारत की औद्योगिक व वित्तीय आकांक्षाओं को नई दिशा दी और आत्मविश्वास का दीप जलाया, क्योंकि आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।
सांस्कृतिक दृष्टि से यह विजय भारत की उस सनातन आत्मा की पुकार थी, जो कभी अन्याय को स्थायी नहीं रहने देती। पूर्वी पाकिस्तान की भूमि पर जब स्वतंत्रता का नवदीप प्रज्वलित हुआ, तब वहाँ के लोकगीत, कविता और संस्कृति ने भारत की मातृभावना को पुनः गूँजाया। 1971 की यह विजय केवल भारतीय सीमाओं की नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के नैतिक आयामों की पुनःस्थापना थी।
साम्प्रदायिक दृष्टि से यह विजय स्पष्ट करती है कि भारत का युद्ध मज़हब से नहीं, अन्याय से होता है। हमने कभी किसी धर्म को नहीं, बल्कि दमन को पराजित किया। भारत ने यह संदेश दिया कि धर्म का सच्चा अर्थ है—‘धारण करने योग्य सत्य’। और यही कारण है कि इस विजयी अभियान के बाद भी भारत ने बांग्लादेश में लोकतंत्र, शांति और पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। ऐतिहासिक-भौगोलिक स्तर पर यह मानचित्र परिवर्तन केवल भू-राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की स्थायी स्थिरता की नींव था। भारत ने यह सिद्ध किया कि उसकी सीमाएँ केवल भौतिक बाड़ नहीं, बल्कि संवेदना की मर्यादाएँ हैं। 1971 के बाद इस क्षेत्र का संतुलन, जनसंख्या, और आर्थिक संबंधों का ताना-बाना पुनर्जीवित हुआ।
अतः 16 दिसंबर, 1971 का यह दिन केवल एक युद्ध की समाप्ति नहीं, भारत की आत्मा के उद्घोष का दिवस है। जब-जब तिरंगा आकाश में फहरता है, तब-तब दिशाएँ कह उठती हैं – “जय जवान, जय हिन्द!” यह उद्घोष केवल नारा नहीं, शौर्य-स्मृति का शंखनाद है; यह सीमा-जागरण का मंत्र है। विजय दिवस केवल इतिहास की स्मृति नहीं, वह भविष्य का संकल्प है कि भारत जब भी उठेगा, तो मानवता की रक्षा और धर्म के पक्ष में उठेगा।








