सैम बहादुर: जिनके निर्णयों ने बदल दिया इतिहास का भूगोल
शस्त्र उठा, शौर्य जगा, जयघोष गगन में छाया,
जहाँ डटे सैम बहादुर, वहाँ विजयी ध्वज लहराया!”
आज हम उस महानायक का स्मरण कर रहे हैं, जिसकी मुस्कान में आत्मविश्वास का वसंत था, और वाणी में तर्क का वज्र। जिसके नेत्रों में रण-चंडी का तेज था, जिसके निर्णयों में इतिहास को पलटने का सामर्थ्य था! जो फैसला लेता था, तो इतिहास बदल जाता था। वह नाम है – फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ। फील्ड मार्शल सैम बहादुर!
1971 के महासमर के आदि-शिल्पी, वास्तविक सूत्रधार, जिनके बिना भारत का विजय-स्वप्न शायद केवल स्वप्न ही रह जाता। 1971 के समर की रीढ़ वही थे। वह केवल सेनापति नहीं, वह विजय के साक्षात् विधाता थे। “अपनी शर्तों पर लड़ो” – मानेकशॉ की अटूट दृढ़ता का किस्सा मशहूर है। जब राष्ट्र-नायकों ने व्यग्रता से पूछा – “क्या हम हमले के लिए तैयार हैं? क्या हम अभी युद्ध शुरू कर सकते हैं?”, तब सैम मानेकशॉ ने साफ, निर्भीक आवाज़ में मना कर दिया। उन्होंने कहा – “नहीं। अभी नहीं। हम अपनी शर्तों पर लड़ेंगे। अपनी टाइमिंग पर लड़ेंगे।” यह वह क्षण था, जब एक सेनापति ने राजनेताओं के आगे अपनी सैन्य बुद्धिमत्ता को खड़ा कर दिया। उन्होंने जल्दबाजी में नहीं, पूरी तैयारी, पूरी सावधानी, पूरी रणनीति के साथ युद्ध का नक्शा खींचा। पश्चिमी मोर्चा मजबूत करो। पूर्वी मोर्चे को प्रशिक्षित करो। बांग्लादेशी मुक्तिसेनानियों को रणनीति सिखाओ। लॉजिस्टिक्स तैयार करो। आपूर्ति-लाइनें सुनिश्चित करो। यह वही मानेकशॉ थे, जिनके पास बंदूक से अधिक तीक्ष्ण उनकी प्रखर बुद्धि थी। उन्होंने युद्ध लड़ा नहीं, उन्होंने युद्ध को ‘डिजाइन’ किया और उसे जीता।

फील्म मार्शल सैम मानेकशॉ
रणनीति के महारथी
3 दिसंबर 1971 को जब पाकिस्तान ने आकाश पर बमबारी की, तब मानेकशॉ की पूर्व-तैयारी ने भारत को तुरंत जवाबी हमला करने की क्षमता दी। परंतु यह केवल सैन्य शक्ति नहीं थी। यह थी रणनीति की परिपक्वता, सामरिक दूरदर्शिता की प्रतिमूर्ति। 9 दिसंबर 1971 की रात, जब ऑपरेशन मेघना हेलिड्रॉप की शुरुआत हुई, तब वह मानेकशॉ की ही सैन्य कल्पना का प्रतिफल था। उन्होंने सेना को एक साथ तीन ओर से (पश्चिम, पूर्व, और आकाश से) भीषण हमला करने की रणनीति दी। लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह उनके आदेश पर पूर्व में अग्रसर होते थे। ग्रुप कैप्टन चंदन सिंह उनके निर्देश पर आकाश पर वर्चस्व बनाते थे। एडमिरल एस. एम. नंदा उनके सामरिक योजना के अनुसार समुद्र पर नियंत्रण करते थे। परंतु सभी की स्ट्रिंग सैम मानेकशॉ के हाथ में थी।
मात्र 13 दिनों का महासमर
3 दिसंबर 1971 को युद्ध शुरू हुआ। 16 दिसंबर 1971 को समाप्त। मात्र 13 दिन! और शत्रु नतमस्तक!
93,000 पाकिस्तानी सैनिकों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण ढाका के रेसकोर्स मैदान पर हुआ। यह संख्या विश्व-इतिहास में सर्वाधिक विशाल सैन्य आत्मसमर्पण बनी। परंतु इसे संभव बनाने वाली वास्तविक शक्ति, प्रखर बुद्धि, असाधारण दूरदर्शिता के महानायक थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ। सैम मानेकशॉ केवल सेनानायक नहीं थे। वह एक योद्धा-दार्शनिक थे, जिन्होंने समझा कि सच्ची जीत तलवार से नहीं, रणनीति से मिलती है। जिन्होंने जाना कि सशक्त सेना वह नहीं, जो केवल लड़ता है, बल्कि जो समझता है कि कब, कहाँ, किस तरह लड़ना चाहिए। उनका प्रसिद्ध वाक्य था – “शांति का समय सैनिकों को तैयार करने का होता है, युद्ध करने का नहीं।” इसीलिए जब देश आग में धधक रहा था, जब पूर्वी बांग्ला की धरती पर 3 मिलियन लोग मारे जा रहे थे, जब 10 मिलियन शरणार्थी भारत की ओर दौड़े आ रहे थे, तब भी मानेकशॉ ने जल्दबाजी में हमला नहीं किया। उन्होंने सही समय, सही तरीका, सही रणनीति चुनी। जब हमला हुआ, तो वह इतना तीव्र, इतना सुनियोजित, इतना विजयोन्मुख था कि 13 दिन में ही दुश्मन का सपना टूट गया। 16 दिसंबर 1971 की शाम जब ढाका के रेसकोर्स मैदान पर पाकिस्तानी कमांडर जनरल नियाज़ी की तलवार भारतीय सेना के हाथ में आई, तब वह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी। वह थी भारत के सम्मान की विजय, भारतीय आत्मनिर्भरता की विजय, भारतीय सैन्य कौशल की विश्व को चेतावनी। इसका मुख्य कर्ता-धर्ता, वास्तविक सूत्रधार, आत्मा और बुद्धि थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ।








